भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं का समाप्त करने का उत्तम साधन !

‘भूतकाल के स्मरण में न रमते हुए, उससे सकारात्मक ऊर्जा लेकर हमें वर्तमानकाल में रहना है । ऐसा करने से अपनी भावना समाप्त हो जाती हैं । अन्यथा वे हमें माया में फंसा देती हैं । भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं को समाप्त करने का उत्तम साधन है ।’ – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली … Read more

ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में भक्तिमार्ग का महत्त्व

‘भक्तिभाव से ज्ञानप्राप्ति करने पर उसका अहं नहीं लगता; परंतु ज्ञानमार्ग के ज्ञानप्राप्ति में अहं निर्माण होने की अत्यधिक संभावना होती है; इसलिए नित्य भावजागृति के प्रयत्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं । भक्तिके कारण ज्ञान में मिठास निर्माण होती है, अन्यथा केवल ज्ञान की इच्छा से प्राप्त ज्ञान नीरस लगता है ।’ – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली … Read more

‘सब कुछ भगवान ही करते हैं’, यह भाव होगा, तो कुछ भी करते समय और उसे छोडते समय भी कुछ न लगना

‘भगवान की कृपा से ही हमारी प्रत्येक कृति होती है’, ऐसा भाव रखने से प्रत्येक कृति करने पर अथवा छोडते समय भी वह भावपूर्ण पद्धति से ही छोडी जाती है । ‘सब कुछ भगवान ही करते हैं’, ऐसा भाव होगा, तब हम जो भी कर रहे हों उस विषय में कुछ भी नहीं लगता और … Read more

वैराग्य क्या है ?

सेवा करते समय व्यक्ति की अपेक्षा तत्त्व देखना, यही वैराग्य है । व्यक्तिनिष्ठता छोडकर तत्त्वनिष्ठा जपना, अर्थात वैराग्य स्वयं में लाना है । प्रत्येक बात में भगवान को देखना, यही खरा वैराग्य है ! – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

सत्सेवा का महत्त्व

अ. ‘सेवा से चित्त पर संस्कार शीघ्र अल्प होते हैं और मन भी निर्विचार होता है । इसलिए नाम के परे जाना शीघ्र संभव होता है । आ. साधना करते समय प्रत्येक बात का अर्थ लगाने में समय न गंवाएं । कृति कर अनुभव से सीखकर शीघ्र आगे जाएं । इससे बुद्धि की बाधा दूर … Read more

अनेक से एक में जाना

‘अनेक से एक में जाना, यह इस अध्यात्म के सिद्धांत समान अनेक विचारों की अपेक्षा भगवान के नामजप का एक ही विचार महत्वपूर्ण है और वही हमें अद्वैत की ओर ले जाता है ।’ – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

हमें ध्यान में आई अच्छी-बुरी बातें अन्यों को बताने से हममें भी परिवर्तन होता है !

‘कोई बात मैं नहीं करता; तो उसे दूसरों को करने के लिए कैसे कहूं ?’, ऐसा विचार न करें । जब तुम कोई अच्छी बात अथवा चूक ध्यान में आनें- पर सहायता के रूप में दूसरों को तुरंत बताते हैं, तब आपकी लगन के कारण आप पर भी उसका परिणाम होता है ।’ – श्रीचित्‌शक्‍ति … Read more

केवल अध्ययन से उत्कर्ष नहीं होता, अपितु साधना से खरा उत्कर्ष होता है !

‘साधना द्वारा मनोलय एवं बुद्धि का लय हो गया तो ईश्‍वर जो भी आवश्यक है वह देता है । इसलिए अनावश्यक वाचन करने में अपना समय नहीं जाता । जगत में अनावश्यक वाचन करनेवाले अभ्यासक अनेक हैं; परंतु साधना कर ईश्‍वरप्राप्ति करनेवाले गिने-चुने हैं । केवल अभ्यास से उत्कर्ष नहीं होता, अपितु साधना से होता … Read more

मन में भावनिक विचार आने पर सनातन के ग्रंथ का कोई पृष्ठ पढें !

विचारों से ही विचारों को युद्ध करना चाहिए । मन में भावनिक विचार आने पर तुरंत ही सनातन संस्था द्वारा प्रकाशित किए गए किसी भी ग्रंथ का पृष्ठ खोलकर पढें । मन मे भावना के विचार नष्ट हो जाते हैं और मन में सत के विचार आएंगे । – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

प्रारब्ध पर मात करने पर भगवान शीघ्र मिलते हैं !

‘वर्तमान स्थिति को अपने प्रारब्ध समझकर आनंद से उसका सामना करें । प्रारब्ध में ही भगवान के दर्शन करें । जो प्रारब्ध पर मात करता है, उसे भगवान शीघ्र मिलते हैं !’ – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ