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ईश्वर के राज्य का कल्पनातीतपन ।

”अनेक गुन्हा करके आत्महत्या करनेवाले को सरकार कैसे सजा देगी ? केवल ईश्‍वर दे सकते हैं । इससे ध्यान में आता है कि ईश्‍वर का राज्य कितना कल्पनातीत है । इसलिए ईश्वरीय राज्य की स्थापना हेतु प्रयत्नरत रहें ।

हिंदुओं की और भारत की दयनीय स्थिति होने का कारण 

‘ मंदिरों में देवता के कर्मचारी दर्शनार्थियों को दर्शन देने के अतिरिक्त और क्या करते हैं ? उन्होंने दर्शनार्थियों को धर्मशिक्षा दी होती, उन्हें साधना सिखाई होती, तो हिंदुओं की और भारत की ऐसी दयनीय स्थिति नहीं हुई होती ।’

ईश्वर की प्राप्ति के लिए जीवन समर्पण !

‘नौकरी में थोडे से वेतन के लिए ७ – ८ घंटे नौकरी करनी पड़ती है, तो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी और सर्व सामर्थ्यवान ईश्‍वर की प्राप्ति के लिए क्या जीवन नहीं देना चाहिए ?’

तन-मन-धन के त्याग का महत्त्व

‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि कालमहिमा के अनुसार वह होनेवाला ही है; परंतु इस कार्य में जो तन-मन-धन का त्याग कर सम्मिलित होंगे, उनकी साधना होगी और वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होंगे ।

सत्ययुग में सभी आनंदी थे।

‘सत्ययुग में नियतकालिक, दूरचित्रवाहिनियां, जालस्थल आदि की आवश्यकता ही नहीं थी; क्योंकि बुरे समाचार नहीं होते थे और सभी ईश्वर के आंतरिक सान्निध्य में होने के कारण आनंदी थे।’

‘भक्तीयोग का महत्त्व’

‘कर्मयोग, ज्ञानयोग, हठयोग आदि योगों में ईश्वर का विचार न होने के कारण ईश्वर से कुछ मांग नहीं पाते; परंतु भक्तियोग का साधक ईश्वर से मांग सकता है । ऐसा है तब भी अन्य योग के साधकों को ईश्वर ने सुविधा उपलब्ध करवाई है । यदि गुरु हों, तो वे गुरू से सब कुछ मांग … Read more

‘राष्ट्र-धर्म के लिए आध्यात्मिक स्तर पर भी कार्य करना अत्यावश्यक !’

शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक स्तरों पर राष्ट्र-धर्म के लिए कार्य कर कुछ साध्य नहीं होता, यह विगत ७२ वर्षों में अनेक बार सिद्ध हुआ है । अब उसके साथ ही आध्यात्मिक स्तर पर भी कार्य करना अत्यावश्यक है, यह सभी को ध्यान में रखना आवश्यक है ।

हिन्दू धर्म की सीख

‘ईश्वर सर्वत्र हैं, प्रत्येक में हैं, यह हिन्दू धर्म की सीख है । इसलिए हिन्दुओं को अन्य पंथियों से द्वेष करना नहीं सिखाया जाता ।’

कहां नोबेल पुरस्कार प्राप्तकर्ता, तो कहां ऋषि-मुनि !

‘नोबेल पुरस्कार प्राप्त करनेवालों के नाम कुछ वर्षों में ही भुला दिए जाते हैं; परंतु धर्मग्रंथ लिखनेवाले वाल्मिकी ऋषि, महर्षि व्यास, वसिष्ठ ऋषि आदि के नाम युगों तक चिरंतन रहते हैं ।’