दिनभर की विभिन्न कृतियों में भी हम कैसे भाव रख सकते हैं ?

आज से हम जो भी कृति करेंगे वह ईश्वर का स्मरण करते हुए और जैसी ईश्वर को अच्छी लगेगी, वैसी करेंगे । फिर हम उसे ईश्वर को समर्पित करेंगे ।

हनुमानजी की सेवा और भक्ति का अद्वितीय उदाहरण

आज तक जहां राम-नाम का स्मरण होता है, जहां रामकथा होती है, वहा साधकों को मदद करने के लिए हनुमानजी सूक्ष्मरूप से उपस्थित रहते हैं ।

याचक भाव अर्थात शरणागतभाव का महत्त्व

भगवान के पास जाते समय यदि मन में गर्व लेकर जाएंगे अथवा बिना शरणागत हुए जाएंगे, तो निश्चितरूप से भगवान की कृपा नहीं मिलती । हम याचक बनकर गए, शरणागत होकर गए, बिना फल की अपेक्षा रखकर गए, तो भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं ।

भाव का महत्त्व

भगवान का अस्तित्व प्रत्येक कृति करते समय तथा प्रत्येक क्षण अनुभव करना, प्रत्येक कृति करते समय भगवान के अस्तित्व की अनुभूति लेना, अथवा ईश्‍वर के अस्तित्व का भान होना, यही है भाव !

मानसपूजा

देवता अथवा गुरु के सगुण रूप की मन से कल्पना कर मन से ही उनकी स्थूल की कृति समान पूजा करना, अर्थात मानसपूजा करना ।

गोपीभाव एवं कृष्णभाव

गोपीभाव का अर्थ है श्रीकृष्णमिलन की तडप अथवा श्रीकृष्णमिलन की आर्तता और कृष्णभाव का अर्थ है केवल शुद्ध आनंद । कलियुग में यह दोनों बातें अत्यंत ही दुर्लभ हो गई हैं ।

सनातन के सभी आश्रमों एवं प्रसारसेवा में सक्रिय साधकों को भावविश्‍व में ले जानेवाले रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में होनेवाले भावसत्संग !

भाव उत्पन्न करने के लिए किए जानेवाले ऐसे प्रयोगों से साधक अंतर्मुख बनता है । साथ ही, थोडे समय के लिए ही क्यों न हो; वह भावस्थिति का अनुभव करता है । साधक के अंतर्मन में उभरनेवाली प्रतिक्रियाएं, स्वभावदोष एवं अहं के विचार, बाहर आने लगते हैं और उसका मन निर्मल होने लगता है ।

भावुकता, को नियंत्रित करने हेतु सदगुरु (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी का मार्गदर्शन !

किसी प्रसंग में मन भावुक हो जाता है और रोना आता है । तब मन की बहुत ऊर्जा का अपव्यय होता है । इसका परिणाम सेवा पर भी होता है । सेवा की अवधि घट जाती है ।