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हिंदु धर्ममें उल्लेखित ईश्वरप्राप्तिके मूलभूत सिद्धांतोंमेंसे एक सिद्धांत ‘देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण एवं समाजऋण, इन चार ऋणोंको चुकाना है । इनमेंसे पितृऋण चुकानेके लिए ‘श्राद्ध’ करना आवश्यक है । माता-पिता तथा अन्य निकटवर्ती संबंधियोंकी मृत्योपरांत, उनकी आगेकी यात्रा सुखमय एवं क्लेशरहित हो तथा उन्हें सद्गति प्राप्त हो, इस उद्देश्यसे किया जानेवाला संस्कार है ‘श्राद्ध’ ।

हिन्दुआें के लिए धार्मिक शिक्षा की आवश्यकता बतानेवाला शासन प्रायोजित ऑनलाइन श्राद्ध !

हाल ही में एक हिन्दी मासिक में समाचार छपा था कि शासन की ओर से ऑनलाइन श्राद्ध की सुविधा दी गई है । उसे पढकर मेरी स्थिति इस पर हंसे अथवा रोएं जैसी हो गई । श्राद्ध प्रत्यक्ष किया जाता है, यह शासन की समझ में क्यों नहीं आता, इस बात का मुझे आश्‍चर्य हुआ । जब, ऑनलाइन भोजन अथवा विवाह नहीं हो सकता, तब श्राद्ध कैसे हो सकता है ? इस पर भी आश्‍चर्य की बात यह है कि यह सुविधा देनेवाला शासन हिन्दुत्वनिष्ठों का है ! मुझे आशंका है कि श्राद्ध के नाम पर हिन्दुआें से करोडों रुपए कमाने के लिए ही शासन का हिन्दूप्रेम जागृत हुआ है ।

– (परम पूज्य) डॉ. आठवले (१३.२.२०११)

क्या श्राद्ध करना आवश्यक है ?

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श्राद्ध (भाग १) (महत्त्व एवं अध्यात्मशास्त्रिय विवेचन)
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