शिशू के जन्म उपरांत कौनसे संस्कार करें ? (चौथा, पांचवां, छठा एवं सातवां संस्कार)

चौथा संस्कार : जातकर्म संस्कार (जन्मविधि, पुत्रावण)

१. उद्देश्य

गर्भाशय का जल भ्रूण के मुख द्वारा उसके पेट में प्रवेश करता है । वह अभक्ष्य होता है, इसलिए उसके भक्षण को उदकप्राशनादि दोष माना जाता है । जातकर्म विधि के उद्देश्य हैं – उदकप्राशनादि से गर्भसंबंधी दोषों का निवारण हो एवं पुत्रमुख देखने से पुत्र का पिता ऋणत्रयी से (पितृऋण, ऋषिऋण, देवऋण से) तथा समाजऋण से मुक्त हो ।

 

२. पूर्व तैयारी

पुत्रजन्म होते ही पिता को उसका मुखावलोकन कर (मुख देखकर), उत्तर दिशा की ओर मुख कर स्नान करना चाहिए । तत्पश्‍चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर तिलक लगाना चाहिए तथा नालच्छेदन के पूर्व, जिसे दाई इत्यादि काम करनेवाले व्यक्ति के अतिरिक्त किसी ने भी स्पर्श नहीं किया है, जिसने माता का दूध भी नहीं पिया है और जिसे स्नान कराया गया है, ऐसे पुत्र को उसकी माता की गोद में पूर्वाभिमुख कर लिटाना चाहिए ।

 

३. संकल्प

मेरे इस पुत्र द्वारा गर्भोदकप्राशनादि से लेकर घटित सर्व दोषों का परिहार (नाश), बीजगर्भ से घटित दोषों का निरसन, उसकी आयु एवं मेधावृद्धि तथा श्री परमेश्‍वरप्रीति के लिए मैं जातकर्मसंस्कार करता हूं । उसके अंगभूत श्री गणपतिपूजन-पूर्वक पुण्याहवाचन, मातृकापूजन तथा नांदीश्राद्ध करता हूं ।

 

४. विधि

इस संस्कार के लिए जननाशौच लागू नहीं होता । श्री गणपतिपूजन से लेकर नांदीश्राद्ध हो जाने तक इस अर्थ का मंत्र पढते हैं :

हे प्रिय पुत्र ! तुम्हें मधु तथा घृत प्रथम पिलाता हूं ! विश्‍वोत्पादक परमेश्‍वर की कृपा से तुम्हें ज्ञान एवं धनधान्यादि की समृद्धि हो । सदासर्वकाल परमेश्‍वर तुम्हारी रक्षा करें तथा सौ वर्ष की आयु दें ।

मधु एवं घी चकले पर (होरसे पर अथवा चंदन घिसने के पत्थर पर) रखकर उसमें सोना घिसकर, वह मिश्रण सोने के चम्मच से शिशु को चटाएं । तत्पश्‍चात स्वर्ण खंड से वह मधु एवं घृत का मिश्रण बालक को पिलाएं एवं स्वर्ण खंड को पानी से धोकर बालक के दांए कान पर रखें । इसके उपरांत उस पुत्र के मुख के पास अपना मुख लाकर ॐ मेधां ते देवः० । ऋचा बोलें ।

उसका अर्थ है, हे प्रिय कुमार ! परमेश्‍वर तुम्हें वेदाभ्यास करने के लिए शीघ्र तीक्ष्ण बुद्धि दें । प्राणापान एवं अखिल सोमादिकों को माला समान धारण करनेवाले दो वायु, जो अश्‍विनी देव हैं, वे तुम्हें अच्छी बुद्धि दें ।

तत्पश्‍चात वही स्वर्णखंड बालक के बाएं कान पर रखकर पुनः ॐ मेधां ते देवः० । यह ऋचा बोलें । सात्त्विक तरंगें ग्रहण एवं प्रक्षेपण करने की क्षमता अन्य धातुओं की अपेक्षा स्वर्ण में अधिक होती है, इसी कारण स्वर्ण का प्रयोग करते हैं ।

तत्पश्‍चात मंत्र पढकर बालक के मस्तक को तीन बार सूंघें तथा आगे बालक का जो नाम रखना है वह नाम उसी समय मन में निश्‍चित करें । गर्भाशय में बालक का ब्रह्मरंध्र बंद रहता है । जब पिता उसका मस्तक सूंघते हैं, तो वह खुल जाता है । कभी-कभी पिता मस्तक को न सूंघकर यदि ब्रह्मरंध्रके स्थान पर तीन बार उच्छवास छोडे, तो भी वही लाभ होता है । पिता के सात्त्विक होने पर ही ऐसा संभव है । तदुपरांत शिशु को स्नान करवाएं । उसके पश्‍चात उसकी नाल काटें । पश्‍चात बालक की माता को अपना दायां स्तन धोकर, मंत्र बोलकर बालक को स्तनपान कराना चाहिए । दायां स्तन पिंगला अर्थात सूर्यनाडी से संबंधित होने के कारण बच्चे की दाईं नाडी कार्यरत होने में सहायता मिलती है । इससे दूध पचने की क्रिया सरलता से प्रारंभ होती है ।

आजकल बच्चे का जन्म प्रसूतिगृह में होता है, इसलिए वहां जातकर्मसंस्कार नहीं कर पाते; अतः अधिकतर वह नामकरण संस्कार के समय किया जाता है ।

पांचवां संस्कार : नामकरण

इस विषय में अधिक पढने के लिए भेंट दे – नामकरण

छठा संस्कार : निष्क्रमण संस्कार (घर के बाहर ले जाना)

उद्देश्य

इस संस्कार का उद्देश्य है, आयु तथा सम्पत्ति की वृद्धि करना ।

 

मुहूर्त

जन्मदिन से तीसरे मास के जन्मदिन अथवा जन्मनक्षत्र पर यह विधि करते हैं । चौथे मास में शुभ समय पर अग्नि, गाय एवं चंद्र का दर्शन करवाएं ।

 

संकल्प

मेरे बच्चे की आयु तथा श्री अर्थात लक्ष्मी की वृद्धि, साथ ही बीजगर्भ से उत्पन्न दोषों का नाश करने के उद्देश्य से श्री परमेश्‍वरप्रीति हेतु निष्क्रमण (घर के बाहर ले जाना) कर्म करता हूं ।

विधि

गंध-अक्षता, पुष्प इत्यादि से इष्ट देवताओं की पूजा करनी चाहिए । संस्कार का मंत्रोच्चारण कर पिता इत्यादि को बालक को गोद में लेना चाहिए तथा बालक की आयु की अभिवृद्धि के लिए ईश्‍वर से आगे दी गई प्रार्थना करनी चाहिए – चंद्र, सूर्य, अष्टदिक्पाल, अष्टदिशा, आकाश, आप सब को यह बालक अमानत स्वरूप सौंपता हूं; आप सब इसकी रक्षा करें । यह बालक चेतन अथवा अचेतन हो, रातदिन आप इसकी रक्षा करें । इंद्रादि देव निरंतर इसकी रक्षा करें ।

तत्पश्‍चात महादेव अथवा श्रीविष्णु देवता के मंदिर में अथवा किसी भी आप्त के घर देवता का पूजन करें । गोबर से लीपे हुए स्थान पर चावल इत्यादि धान्य रखकर उसपर उस बालक को बिठाकर, उसे पकडे रखें । मंत्रोच्चारण कर भस्म अथवा अक्षत से उस बालक के सिर पर, मस्तक पर प्रोक्षण करने पर मिष्ठान्न इत्यादि से महादेव एवं श्री गणेश देवता का पूजन करें एवं बालक को मिठाई देकर उसे भगवान के सामने औंधा रखें तत्पश्‍चात अपने घर लौट आएं ।

एक विचारधारानुसार इस दिन पिता अपनी पत्नी सहित संस्कार्य बालक को घर के बाहर ले जाकर तच्चक्षुः० मंत्र से सूर्यावलोकन करवाए । इस मंत्र का अर्थ आगे दिए अनुसार है – समस्त विश्‍व के नेत्र एवं भगवान को प्रिय पूर्व दिशा में उदित सूर्य के प्रसाद से हमें सौ वर्ष की आयुष्य प्राप्त हो ।

सातवां संस्कार : अन्नप्राशन

उद्देश्य

इस संस्कार से माता के गर्भ में हुए मलमूत्रादि भक्षणदोष का नाश होता है ।

मुहूर्त

पुत्र के लिए छठा अथवा आठवां मास तथा कन्या के लिए पांचवां अथवा अन्य विषम मास अन्नप्राशन हेतु उचित है । (सम संख्या पुरुषवाचक एवं विषम संख्या स्त्रीवाचक है ।)

संकल्प

मेरे बालक के लिए माता के गर्भमलप्राशन द्वारा उत्पन्न दोषों का नाश, शुद्ध अन्न इत्यादि की प्राप्ति, ब्रह्मवर्चस (तेज)का लाभ, इंद्रियो एवं आयु की सिद्धि, बीजगर्भ द्वारा हुए पापों का निरसन, इनके द्वारा श्री परमेश्‍वर प्रीति होने के लिए अन्नप्राशन नामक संस्कार करता हूं । उसके अंगभूत श्री गणपतिपूजन, स्वस्तिवाचन, मातृकापूजन तथा नांदीश्राद्ध करता हूं ।

विधि

संकल्प हो जाने पर देवता के सामने अपनी दाईं ओर शुभ्रवस्त्र पर माता की गोद में पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठे हुए बालक को प्रथम अन्नप्राशन कराएं । दही, मधु तथा घी से युक्त अन्न सोने अथवा कांसे के पात्र में रखकर, हे अन्नपते ईश्‍वर ! हमें आरोग्यकारक एवं पुष्टिदायक अन्न दें ।, ऐसा कहकर स्वर्णयुक्त हस्त से (हाथ में स्वर्ण लेकर) अन्न लेकर प्रथम ग्रास दें । पश्‍चात पेट भर अन्नप्राशन हो जाने पर मुंह धोकर बालक को भूमि पर बिठाएं ।

जीविका परीक्षा

बालक के सामने पुस्तकें, शस्त्र, वस्त्र आदि वस्तुएं उपजीविका की परीक्षा करने के लिए रखें । बालक स्वेच्छा से जिस वस्तु को प्रथमतः हाथ लगाए, वह आगे उसकी उपजीविका का साधन होगा, ऐसा समझना चाहिए ।

संदर्भ : सनातन – निर्मित ग्रंथ सोलह संस्कार