आध्यात्मिक कष्ट क्यो होते है ?

आध्यात्मिक कष्ट संबंधी शंकानिरसन

साधना करते हुए सूक्ष्म की विविध शक्तियां साधक को कष्ट देती हैं । उसे साधना के परमार्थ पथ से परावृत्त करने हेतु वे प्रयत्नरत होते हैं । इस पर कौन-सा उपाय करें इत्यादि के विषय के प्रश्नोत्तर प्रस्तुत स्तंभ में अंतर्भूत हैं ।

 

अ. अतृप्त पूर्वज

आजकल अनेक लोगों को अतृप्त पूर्वजों का कष्ट होता है । अतृप्त पूर्वजों के कष्ट के लक्षण कौन-से हैं, अतृप्त पूर्वज कष्ट क्यों देते हैं और उनसे होनेवाले कष्टों का निवारण कैसे करें, इस विषय में जानकारी लेते हैं ।

 

प्रश्न : अतृप्त पूर्वजों का कष्ट सभी को होता है क्या ?

उत्तर : आजकल अधिकांश लोगों को होता है । हम सभी के भाग्य में कष्ट है ही । प्रारब्धभोग, भोगकर समाप्त होने के लिए ही जन्म लिया है । कलियुग में हमने जन्म लिया है, तो दुःख ही अधिक भोगकर समाप्त करने हैं । सत्ययुग, त्रेतायुग में हम होते तो सुख भोगने के लिए हमारा जन्म हुआ होता । जैसे प्रारब्ध दुःख भोगने का महत्त्वपूर्ण भाग है, उसी प्रकार अतृप्त पूर्वज भी महत्त्वपूर्ण अंग हैं ।

पहले लगभग ५० से १०० वर्षों पूर्व अनेक घरों से श्राद्धपक्ष, नागबली, कौए के लिए कुछ रखना अत्यंत नियमितरूप से किया जाता था । फिर स्वतंत्रतासंग्राम आरंभ हुआ, उस ओर पूरी पीढी मुड गई । घर के कर्तापुरुष देश के स्वतंत्रतासंग्राम में सहभागी होने के लिए चले जाने से परंपराएं खंडित हो गर्इं । अब जो पीढी है, वह कॉन्वेंट में पढ रही है, अर्थात जो कुछ संस्कार होने की संभावना थी, वह भी अब नहीं रही । दूरदर्शन (टीवी) है । उस पर अनेक वाहिनियां (चैनेल्स) हैं । उन पर परदेशी संस्कृति दिखाई जाती है । इसलिए भगवान के लिए कुछ करना चाहिए, श्राद्धपक्ष करना चाहिए, यह सब हमें पता ही नहीं है । इसलिए अनेक लोगों को लगभग सौ प्रतिशत लोगों को यह कष्ट होता ही है । जिसकी व्यक्तिगत साधना अच्छी है, अर्थात जिनके मन में निरंतर सत् के ही विचार हैं, जिनका नामस्मरण हो रहा है, सेवा, त्याग है, उन्हें कष्ट नहीं होगा; परंतु जिनसे इतना सब नहीं होता, उन्हें कष्ट हो सकता है ।

अतृप्त पूर्वजों के कष्टों के बुद्धि द्वारा न समझ में आनेवाले कुछ उदाहरण देखेंगे । किसी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, प्रयत्न कर रहे हैं, तब भी सतत कष्ट हो रहा है । नौकरी-कामधंधा नहीं है, ऐसे में आधे लोगों के संदर्भ में भाग्य के कारण, तो आधे लोगों के संदर्भ में अतृप्त पूर्वजों के कारण ऐसा होता है । अतृप्त पूर्वजों के कष्टों के कारण कभी विवाह ही नहीं तय होता है, या विवाह तो हो जाता है, परंतु पति-पत्नी में अनबन रहती है, या फिर पति-पत्नी में बनती तो है परंतु बच्चे ही नहीं होते । पत्नी गर्भवती ही नहीं होती । गर्भवती हो जाती है परंतु दूसरे – चौथे महीने में ही गर्भपात हो जाता है । गर्भपात भले ही न हो, बच्चे शरीर से अथवा मन से अपंग होते हैं । बच्चे का भली-भांति जन्म हुआ, परंतु उसकी बालमृत्यु अथवा अपमृत्यु हो जाती है, ऐसा जहां किसी कुटुंब में दिखाई दे, तो समझें कि अतृप्त पूर्वजों का कष्ट है । ‘हम डॉक्टर के पास गए’, ‘गायनॉकॉलॉजिस्ट के पास गए’, तब भी कोई उपयोग नहीं हो रहा है या डॉक्टर कोई सहायता नहीं कर पा रहे हैं । परंतु यह सब बुद्धि द्वारा समझने का भाग हुआ और बुद्धि द्वारा जो समझ में नहीं आता, वह अध्यात्म होता है ।

त्रिपिंडी श्राद्ध प्रत्येक को करने की आवश्यकता नहीं है । जिन लोगों को कुछ कष्ट है, वे इसे अवश्य करें । त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण नागबळी यह सब कर सकते है ।

राजा भगीरथ ने ६० सहस्र वर्षों तक तपश्चर्या की । तब उनके सभी पूर्वजों को मुक्ति मिली । हमारी आयु छोटी होती है, देर से अध्यात्म समझ में आता है और वह भी सर्व व्यवसाय संभालकर थोडी-बहुत साधना करेंगे, तो पूर्वजों को हम मुक्ति कैसे देेंगे ? इसकी अपेक्षा यह विधि करने से साधना बच जाती है । अन्यथा हम जो साधना करते हैं, वह अतृप्त पूर्वजों को मुक्ति दिलवाने में ही व्यय हो जाती है । दो-चार सहस्र रुपए जाएंगे; परंतु अपने जीवन में साधना के अनेक वर्ष बच जाएंगे ।

अतृप्त पूर्वज कष्ट क्यों देते हैं ? हम अपने पूर्वजों की धन-संपत्ति लेते हैं । हमारे पिता-दादा द्वारा रखी गई संपत्ति लेना हमें अच्छा लगता है । जमीन-जायदाद में अपना हिस्सा लेने के लिए हम भाग-दौड करते हैं । भूमि के छोटे-छोटे भूखंडों के लिए / एक-एक वृक्ष तक के लिए लडाई-झगडे होते हैं ।

अपने सभी पूर्वज संत-महात्मा नहीं थे । वे सभी हमारे समान ही सामान्य मनुष्य थे । उन्होंने भी साधना नहीं की थी । इसलिए वे अटके हुए हैं । वे चिल्ला-चिल्लाकर कहने का प्रयत्न करते हैं कि ‘अरे मैं यहां भुुवलोक में अटका हुआ हूं ! मेरे लिए कुछ करो !’ परंतु हमारे कर्णेद्रियों को वह सुनने की क्षमता ही नहीं है । जैसे कुत्ते, बिल्ली, कौओं को कुछ अलग समझ में आता है, (इसलिए कि उनमें संवेदनक्षमता बहुत अधिक होती है), वैसा हमारे संदर्भ में नहीं होता ।

हम किसी को पूछते हैं, ‘घर में हमारी किसी से पटती नहीं । बच्चों से नहीं पटती, पत्नी से नहीं पटती, ऐसा क्यों ?’ फिर कोई हमें बताता है, ‘अरे आपके घर में पूर्वजों का कष्ट है । नारायण नागबली करें, त्रिपिंडी श्राद्ध करें !’ उसे करने पर अनेक लोगों का जीवन सुखी हो जाता है । हमने भारत में जन्म लिया है, यह हमारा सौभाग्य है । हमारे यहां ऐसा बतानेवाले तालुका-तालुका में हैं । भारत के अतिरिक्त अन्य कहीं भी यह शास्त्र ही किसी को पता नहीं है । इंग्लैंड, अमेरिका, युरोप, रशिया इत्यादि में यह किसी को पता ही नहीं है । वे जीवनभर दुःखी ही रहते हैं ।

 

प्रश्न : क्या त्रिपिंडी श्राद्ध एक बार ही करना पर्याप्त है ? क्या इससे पूर्वजों के कष्ट दूर हो जाते हैं ? या २ – ३ बार यह विधि करनी पडती है ?

उत्तर : हमारे यहां सैकडों पूर्वज हैं । एक बार त्रिपिंडी श्राद्ध करने पर जिन पूर्वजों की मुक्ति का समय आ चुका है, उस योनि से वे मुक्त हो जाएंगे । शेष सैकडों हैं, वे ऐसे ही रहेंगे; परंतु वे सभी कष्ट नहीं देते । चरण-दर-चरण हमें कष्ट होते हैं । आमतौर पर ७० – ८० प्रतिशत लोगों के लिए एक बार ही त्रिपिंडी श्राद्ध करना पर्याप्त होता है । ५ – १० प्रतिशत लोगों को जीवन में दो बार करना पडता है । शेष ५ – १० प्रतिशत लोगों को जीवन में तीन बार भी करना पड सकता है ।

 

प्रश्न : जब त्रिपिंडी श्राद्ध करते हैं, तब उसके लिए कुटुंब के सभी सदस्यों को उपस्थित रहना आवश्यक है क्या ?

उत्तर : सर्व जन होने आवश्यक नहीं; परंतु जो जाते हैं; उनके विषय में पितरों को लगता है कि ‘इन्होंने मेरे लिए कुछ तो किया ।’ दो-चार सहस्र रुपये व्यय हुए । भाइयों ने आपसे में बांट लिया, तो दोनों भाइयों को पितरों का आशीर्वाद मिलता है । एक ही भाई ने खर्च किया, तो वे उस पर ही प्रसन्न होते हैं । पितर मुक्त होते समय केवल कष्ट देना बंद करते हैं, ऐसा ही नहीं है अपितु वे कुछ तो भला भी करते हैं । अंत में हम उनके कुटुंब के ही हैं ना ! साधना करने से जो भूत हमें दे रहे कष्ट दे रहे हैं, उन्हें जाना पडता है, तब वे हमारी सहायता नहीं करते । इसलिए कि अब वे हमें कष्ट नहीं दे पाएंगे । इसलिए वे क्षुब्ध होते हैं । इसलिए वे हमारी सहायता नहीं करते; परंतु पितरों को यह भान रहता है कि हमारे लिए नाती-परनाती ने कुछ तो किया है; इसलिए वे हमारी सहायता करते हैं । इसलिए जितनों को संभव है, उन सभी ने जाना चाहिए । यह विधि पूर्वजों के लिए श्रद्धांजलि ही है ।

 

आ. अच्छी शक्ति

अच्छी शक्ति कष्ट क्यों देती है, इसका कारण नीचे दिए प्रश्नोत्तर से ध्यान में आएगा ।

 

प्रश्न : अनिष्ट शक्तियों का कष्ट होता है, वैसे अच्छी शक्तियों से भी कष्ट होता है ? उदा. कुलदेवता, ग्रामदेवता का भी होता है क्या ?

उत्तर : जिसकी साधना करने की क्षमता है, अर्थात साधना करने से वह इसी जन्म में बहुत प्रगति कर सकता है, ऐसा हो और तब भी यदि वह साधना न करता हो, तो कुलदेवता उसे निश्चितरूप से कष्ट देेंगे । कोई विद्यार्थी होशियार है, यदि उसने ठीक से पढाई की, तो परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होगा, परंतु वह यदि पढाई न करे तो शिक्षक उसके पीछे लग जाते हैं । उसे डांटते हैं । शिक्षक उसके पीछे नहीं लगते जो पढाई में मंद है, अनुत्तीर्ण अथवा बार्डरलाइन से उत्तीर्ण होनेवाला है । कोई साधना करनेवाला होगा, तो कुलदेवता को लगता है कि ‘यह मेरा है, इसे प्रगति करनी चाहिए’, तब वह कष्ट देते हैं । किसी से पूछने पर हमें समझ में आता है कि हमें कुलदेवता के दर्शन के लिए जाना चाहिए, दूर हों तो वर्ष में एक बार तो जाना ही चाहिए । उनका जप करना चाहिए । कुलाचार का पालन करना चाहिए । इससे ही साधना का प्रारंभ होता है और कष्ट दूर करने के निमित्त से एक बार प्रारंभ होने पर आगे आदत बन जाने से साधना जारी रहती है ।

गांव की रक्षा करने का दायित्व ग्रामदेवता पर होता है । वे हमारे लिए (ग्रामस्थों के लिए) कुछ तो करती हैं, इसलिए ग्रामदेवता के वार्षिक उत्सव में हमें सहभागी होना चाहिए । तन, मन, धन से कुछ तो करना चाहिए । जो साधना नहीं करते, उनके लिए यह नियम है । जो साधना करने लगे हैं, जिन्हें गुरुप्राप्ति हो गई है, उनके संदर्भ में ऐसे प्रश्न निर्माण नहीं होते । ग्रामदेवता इत्यादि ये सभी क्षूद्र देवता हैं । किसी कार्यालय का मुख्य अधिकारी तुम्हारा परिचित होगा, तो वहां का सिपाही अपना परिचित है अथवा नहीं, इसका विचार हम नहीं करते । गुरु अथवा कुलदेवता प्रसन्न हो गए, आप उनकी साधना करते हैं, तो यदि ग्रामदेवता के लिए कुछ न भी करें, तब भी कोई बात नहीं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ध्वनिचक्रिका ‘अध्यात्मविषयक शंकानिरसन’