नौवां संस्कार : उपनयन (व्रतबंध, मुंज अथवा जनेऊ )

व्याख्या एवं समानार्थी शब्द

१. उपनयन में दो शब्द हैं – उप एवं नयन । उप शब्द का अर्थ है समीप और नयन का अर्थ है ले आना । अतः उपनयन का अर्थ है, गायत्री मंत्र सीखने हेतु गुरु के (शिक्षक के) पास ले जाना । नयन शब्द का अर्थ आंख भी है । उपनयन अर्थात अंतःचक्षु । जिस विधि से अंतःचक्षु खुलने लगते हैं अथवा खुलने में सहायता होती है, उसे उपनयन कहते हैं ।

२. व्रत से, धर्मनियम से, ब्रह्मचर्यानुसार आचरण का जहां से बंधन आरंभ होता है, उसे व्रतबंध कहते हैं । उसके पहले बालक का आचरण कैसा भी हो, उस पर बंधन नहीं होता ।

३. उपनयनविधि में मुंज नामक घास कटि पर (कमर पर) बांधते हैं; अतः इस विधि को मुंज (जनेऊ) कहते हैं ।

जिसका जनेऊ किया जाता है, उसे बटु, मुंजामणि, ब्रह्मचारी इत्यादि नाम से जाना जाता है । जनेऊ हो जाने पर उसे उपनीत कहते हैं ।

धर्मजनेऊ अर्थात किसी निर्धन बालक का अपने व्यय से (खर्चेसे) जनेऊ करना ।

 

उद्देश्य

प्रत्येक मनुष्य जन्मतः शूद्र होता है अर्थात, शरीर की स्वच्छता ही करना सीखता है । आगे कर्म करने पर वह द्विज बनता है । द्वि अर्थात दो एवं ज अर्थात जन्म लेना । जनेऊ अंतर्गत संस्कारों के कारण पुत्र का एक प्रकार से जन्म ही होता है, अतः वह द्विज हो गया, ऐसा कहते हैं । ब्रह्मचारी का दूसरा जन्म (ब्रह्मजन्म) जनेऊ-बंधनसे चिह्नित होता है । उसका प्रतीक है जनेऊमेखला धारण करना । ऐसा कहते हैं कि इस जन्म में सावित्री उसकी माता तथा आचार्य उसके पिता हैं (मनुस्मृति, अध्याय २, श्‍लोक १७०) । द्विज होने पर वह गायत्री मंत्र का अधिकारी बनता है अर्थात, साधना करनेयोग्य होता है । अतः जनेऊ विधि करनी ही चाहिए; परंतु विवाह करना अनिवार्य नहीं है ।

 

महत्त्व

कुमार को व्रतस्थ वृत्ति से रहते हुए जीवन के लिए आवश्यक ज्ञान ग्रहण करना चाहिए, इस हेतु उपनयन विधि है । उसे १२ वर्ष ऋषिकुल में रहना पडता था । वहां उसे ४ वेद, ६४ कलाएं, उपनिषद, धनुर्विद्या एवं आयुर्वेद ऐसे सर्व प्रकार की शिक्षा मिलती थी । ज्ञानार्जन कर आया यह परिपूर्ण साधक आगामी जीवन व्यतीत करने में सक्षम हुआ करता था ।

– परात्पर गुरु पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.

 

अधिकार

१. वर्णानुसार किस आयु में ?

यह संस्कार ब्राह्मणों में जन्म के पश्‍चात आठवें वर्ष में, क्षत्रियों में ग्यारहवें वर्ष में, वैश्यों में बारहवें वर्ष में करना चाहिए, ऐसा आश्‍वलायन गृह्यसूत्र में (खंड १९, सूत्र १ से ४) कहा गया है ।

पूर्वकाल में सत्रहवें वर्ष से पूर्व ही विवाह हो जाता था । इसलिए शूद्रों को उपनयन का उपयोग नहीं था; क्योंकि उपनयन के पश्‍चात अध्ययन के लिए गुरुगृह जाना पडता था ।

२. कन्याओं को भी अधिकार

प्राचीन काल में कन्याओं का भी उपनयन करने की प्रथा थी । कूर्मपुराण में इसका उल्लेख है । पिता, चाचा अथवा भाई कन्याओं को विद्यादान करते थे । अन्य पुरुष के लिए इस कार्य की मनाही थी । ब्रह्मचारिणी कन्या स्वगृह में ही भिक्षा मांगती थी । आर्यसमाजी आज भी कन्या का उपनयन करते हैं ।

 

पूर्व तैयारी

उपनयन के लिए जो शुभमुहूर्त निश्‍चित हुआ हो, उसके एक दिन पूर्व से (या तीन दिन पहले से) कुमार को केवल दूध पीना चाहिए । इससे सात्त्विकता बढती है ।

१. बटु का संकल्प

इच्छानुसार आचरण करना, इच्छानुसार भाषण करना एवं मनोवांछित खान-पान इत्यादि द्वारा उत्पन्न दोषों का निरसन मैं तीन कृच्छ्र प्रायश्‍चित कर अथवा धनदान से करूंगा । (प्रायश्‍चित संबंधी अधिक ज्ञान सनातन के ग्रंथ पापोंके दुष्परिणाम दूर करनेके लिए प्रायश्‍चित में दिया है ।)

२. उपनयनकता का संकल्प

इस कुमार को उपनयन का अधिकार प्राप्त होने के लिए गायत्रीमंत्र का १२ सहस्र बार जप करूंगा । कुमार के उपनयन में ग्रहानुकूलता की सिद्धि होने एवं श्री परमेश्‍वर की प्रीति प्राप्त करने के लिए गृहयज्ञ करूंगा । पुत्र का उपनयन करने का प्रथम अधिकार उसके पिता का होता है । उपनयन करना निश्‍चित होने पर १२ सहस्र बार गायत्रीमंत्र का जप करते हैं ।

 

आचारबोध एवं बटुव्रत

आचारबोध

तुम ब्रह्मचारी हो इसलिए,

१. मूत्र, पुरीषोत्सर्ग (शौच के लिए जाना), भोजन, मार्ग पर चलना, निद्रा जैसे कृत्य करने पर शुद्धि हेतु आचमन करते जाओ ।

२. संध्या, औपासन, होम इत्यादि नित्यकर्म प्रतिदिन करते जाओ । (स्त्रियों को विवाहोपरांत पुराणोक्त संध्या एवं गायत्रीजप करने का अधिकार है ।)

३. दिन में निद्रा नहीं लेना ।

४. आचार्यों के स्वाधीन रहकर वेदोच्चारण करते जाओ ।

५. प्रातःकाल तथा संध्याकाल भिक्षा मांगते जाओ ।

६. संध्याकाल तथा प्रातःकाल अग्नि में समिधा देते जाओ ।

७. बारह वर्ष अथवा वेदाध्ययन पूर्ण हो जाने तक ब्रह्मचर्य का पालन करो ।

८. जो पुरुष अथवा स्त्री तुम्हें कुछ न कुछ भिक्षा दिए बिना नहीं लौटने देते, उनसे भिक्षा मांगने जाते रहो ।

इस प्रकार आचारबोध होने पर यदस्यकर्मणो (होम का उत्तर भाग) से शेष होम समाप्त करें ।

बटुव्रत

आचारबोध का पालन, लवण (नमक) एवं क्षार वर्जित करना, नीचे सोना (पलंग पर नहीं) इत्यादि । इसके अतिरिक्त बटु द्वारा पालनयोग्य विविध यम-नियमों की जानकारी स्मृतिग्रंथों मेें उपलब्ध होती है ।

संदर्भ : सनातन – निर्मित ग्रंथ सोलह संस्कार

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