हास्यास्पद लोकतन्त्र
राज्यकर्ता पक्ष निर्वाचनमें पराजित हो जाता है अर्थात निर्वाचनसे पूर्व १-२ वर्षतक जनमत उसके विरोधमें होते हुए भी वह पक्ष राज्य करता रहता है ।
राज्यकर्ता पक्ष निर्वाचनमें पराजित हो जाता है अर्थात निर्वाचनसे पूर्व १-२ वर्षतक जनमत उसके विरोधमें होते हुए भी वह पक्ष राज्य करता रहता है ।
अबतक हुए चुनावसे यह सिद्ध हो गया है कि चुनावसे पूर्व एक-दूसरेंके विरोधमें लडनेवाले एवं सभाओंके माध्यमसे एक-दूसरेपर आलोचना करनेवाले राजनीतिक पक्ष चुनावके पश्चात राष्ट्र एवं धर्महितके लिए नहीं, अपितु सत्ता एवं उसके माध्यमसे अपने स्वार्थके लिए एकत्रित आते हैं । इससे इन पक्षोंकी तत्त्वहीनता ध्यानमें आती है । ऐसे तत्त्वहीन राजनीतिक पक्षोंको सत्तामें लानेवाले … Read more
उपयोग करें एवं फेंक दें’ (Use and Throw)’ पाश्चात्त्यों की ऐसी जो आधुनिक संस्कृति है, उसे अब अनेक युवकों ने भी आत्मसात कर लिया है । इसलिए जिन मां-बाप ने जन्म दिया, जन्म से लेकर स्वावलम्बी होने तक सभी प्रकार से चिंता की, उदा. बीमारी में सभी सेवा की, शिक्षा दी, उनके विषय में कृतज्ञ … Read more
‘राजनेता तथा आरक्षणकर्ता स्वार्थ सिखाते हैं, तो गुरु केवल स्वार्थत्याग ही नहीं, अपितु सर्वस्व का त्याग करना सिखाते हैं !’
औषधि कौन सी लेनी है, साधारणतया, यह बहुमत से निश्चित नहीं किया जाता; किंतु कौनसा दल राज्य करे, यह बहुमत से निश्चित किया जाता है । विश्व में इससे हास्यास्पद बात क्या हो सकती है !’
क्या भ्रष्टाचार एवं अहंभाव रहित तथा साधना करनेवाला कोई भी व्यक्ति राजनीतिक दल का नेता अथवा कार्यकर्ता है ? इसका उत्तर ‘नहीं’ ही है । उनके कारण ही राष्ट्र एवं धर्म की ऐसी अधोगति हुई है । इस पर एक ही उपाय है, कि त्यागी एवं नम्र साधक मिलकर राष्ट्र की पुन:स्थापना करें !’
लोकतंत्र में किसी भी समस्या के मूल में जाकर समाधान नहीं ढूंढा जाता, ऊपरी समाधान ढूंढा जाता है । भ्रष्टाचार के कारण यह भी निरर्थक सिद्ध होता है,उदा. किसी अपराधी का अपराध ध्यान में आने पर उसे पकडा जाता है । तदुपरांत अनेक वर्षों तक न्यायालयीन प्रक्रिया चलती है और अंत में उसे दंड दिया … Read more