‘भगवान की कृपा से ही हमारी प्रत्येक कृति होती है’, ऐसा भाव रखने से प्रत्येक कृति करने पर अथवा छोडते समय भी वह भावपूर्ण पद्धति से ही छोडी जाती है । ‘सब कुछ भगवान ही करते हैं’, ऐसा भाव होगा, तब हम जो भी कर रहे हों उस विषय में कुछ भी नहीं लगता और उसे छोडते समय भी कुछ नहीं लगता । भगवान के कारण ‘करना और छोडना’ यह प्रक्रिया सहज हो जाती है । किसी भी परिस्थिति में एवं परिस्थिति के त्याग में भी आनंद अनुभव करनेवाले संत सहजस्थिति में होते हैं ।’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ
भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं का समाप्त करने का उत्तम साधन !
ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में भक्तिमार्ग का महत्त्व
सत्सेवा का महत्त्व