नामकरण

 

सोलह संस्कारों में पांचवां संस्कार है नामकरण !

नामकरण का उद्देश्य

१.‘शिशु को पहचाना जा सके, इसके लिए

२.बालक में बीज और गर्भ से आए पापों का प्रक्षालन, आयु में वृद्धि और सभी व्यवहार सफल होने के साथ-साथ परमेश्‍वर के प्रति प्रीति उत्पन्न होने हेतु ।

 

जन्मनाम एवं व्यावहारिक नाम का महत्त्व

संध्याविधि के समय बालक को अपने जन्मनाम का उच्चारण करना पडता है । उसी प्रकार, जन्मपत्रिका बनाने के लिए भी जन्मनाम की आवश्यकता होती है । किसी भी विधि के समय जन्मनाम लेना पडता है । शेष व्यवहारों के लिए व्यावहारिक नाम प्रचलित रहता है ।’

– प.पू. पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.

 

अध्यात्मशास्त्रानुसार नाम का महत्त्व

जिसप्रकार बच्चे का लिंग गर्भाशय में ही निश्‍चित होता है, उस प्रकार बच्चे का नाम भी पूर्वनिश्‍चित ही होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध, ये घटक एकत्रित रहते हैं; इसीलिए बच्चे का जो रूप है उसके अनुसार उसका नाम भी होता है । केवल हमें उसका ज्ञान नहीं होता, उन्नत पुरुषों को होता है । किसी उन्नत पुरुष से (संत से) परिचित न हों, तो अनुरूप नाम के लिए ज्योतिषशास्त्र मार्गदर्शन कर सकता है ।

‘व्यक्ति का नाम लेने पर वह नाम केवल उसके शरीर का नहीं होता, अपितु आत्मचैतन्याधिष्ठित शरीर का होता है ।’

– गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

 

नाम का चुनाव

१. बालक का नाम आगे लिखित नियमानुसार रखना चाहिए । नाम का प्रथम अक्षर घोष (मृदुवर्ण) अर्थात ककारादि पंचवर्ग के आरंभ के दो वर्ण छोडकर बाकी के ‘ग घ ङ ज झ ञ ड ढ ण द ध न ब भ म और य र ल व’, इन उन्नीस वर्णों में से हो । ककारादि पंचवर्ग के प्रथम दो वर्ण अर्थात ‘क ख च छ ट ठ त थ और प फ’ । ये वर्ण पृथ्वी एवं आपतत्त्व प्रधान तथा तमोगुण प्रधान हैं, इसलिए नाम का प्रथम अक्षर इनमें से न हो ।

२. अंतिम अक्षर दीर्घ अथवा विसर्गयुक्त हो ।

३. बालक का नाम दो अथवा चार अक्षरों का हो । उदा. भद्र, देव, देवदत्त, भव, भवनाथ, नागदेव आदि तथा बालिका का नाम विषम अक्षर संख्या का अर्थात 3-5-7 अक्षरों का हो । विषम संख्या के अक्षर शक्तिप्रधान होते हैं और सम संख्या के अक्षर शिवप्रधान होते हैं ।

४. स्त्री के नाम में आद्याक्षर का द्वित्व नहीं होना चाहिए । स्त्रियां शक्तिप्रधान होती हैं और आद्याक्षर का द्वित्व पुरुषप्रधान होता है; इसीलिए आद्याक्षर का द्वित्व होने पर स्त्री पर अनिष्ट परिणाम होने की संभावना उत्पन्न होती है ।

५. यदि बच्चे की कीर्ति की इच्छा हो, तो नाम दो अक्षरों का रखना चाहिए ।

६. ब्रह्मवर्चस, अध्ययन तथा आचार की समृद्धि की इच्छा हो, तो चार अक्षरों का नाम रखें । चार अक्षर चार पुरुषार्थों के – धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के प्रतीक हैं । पूर्वकाल में ब्राह्मणों के नाम के आगे ‘शर्म’, क्षत्रियों के नाम के आगे ‘वर्म’, वैश्यों के नाम के आगे ‘गुप्त’ एवं शूद्रों के नाम के आगे ‘दास’ का पद जोडकर नाम रखने की परंपरा थी । इससे नाम से ही वर्ण का बोध हो जाता था ।

७. शिशु का नाम अपनी रुचि अनुसार रखने की अपेक्षा, नक्षत्रचरण अक्षरानुसार आध्यात्मिक अर्थवाला रखें, उदा. चैतन्य, भक्ति, कृपा ।

 

नामों के प्रकार

१. जिस नक्षत्र पर शिशु का जन्म हुआ, उससे नाक्षत्रनाम;

२. जिस मास में जन्म हुआ उससे मासनाम;

३. कुलदेवता के नामानुसार रखा नाम एवं

४. व्यावहारिक नाम

५. अन्य

 

व्यवहारिक नाम (लौकिक नाम)

यह नाम सामाजिक व्यवहार के लिए रखा जाता है एवं यही महत्त्वपूर्ण होता है । मुख्य रूप से कुल की संस्कृति एवं प्रतिष्ठा को शोभा देनेवाला अथवा जो मंगलकारक, उच्चारण में सरल और सुनने में अच्छा लगे, ऐसा नाम रखने की प्रथा है।

 

अन्य

१. कुत्सित नाम : कुत्सित अर्थात तुच्छतादर्शक । किसी माता-पिता के बच्चे जीवित न रहते हों, तो जन्म लेनेवाले बच्चे का कोई तुच्छतादर्शक नाम रखें, ऐसी लौकिक प्रथा है, उदा. पप्पी, बुद्धू, घिर्राऊ इत्यादि । ऐसा नाम रखने से वह बच्चा जीवित रहेगा और उसकी आयु भी लंबी होगी, ऐसी आधारभूत लोकधारणा है ।

२. आदिवासियों के नाम : पूर्व भारत में वन्य जाति के लोग मृत पूर्वजों के नाम अपने बच्चे को देते हैं । उनकी मान्यता होती है कि ‘उस पूर्वज की आत्मा नवजात बालक में प्रविष्ट हुई होती है ।’ आदिवासियों का मानना है कि मृत पूर्वज की आत्मा उस नवजात बालक में प्रक्षेपित होती है । जिस वृक्ष के नीचे बच्चे का जन्म होता है, उस वृक्ष अथवा समीपवर्ती पहाड का नाम कुछ वन्य जातियों में बच्चे को देते हैं । कुछ जातियों में बच्चे को वार के नाम भी देने की प्रथा है, उदा. सोमा, बुधा, शुक्रया आदि ।’

 

आजकल बच्चों के अर्थहीन नाम रखे जाने, नामों का
विकृत ढंग से उच्चारण कर उन्हें बुलाना और इससे अपने साथ-साथ
बच्चों को भी देवी-देवताओं के स्पंदनों से वंचित रख पाप के भागीदार होना

अर्थहीन नामकरण करने से होनेवाली हानि

आजकल माता-पिता अपने बच्चों के नाम शास्त्रानुसार न रखते हुए ‘चिंटू, पिंकी, मिंटू’ ऐसे अर्थहीन नाम रखते हैं । इतना ही नहीं, अपितु अच्छे नामों का भी विकृतिकरण कर उन्हें संबोधित किया जाता है, उदा. जैसे किसी का नाम अनिरुद्ध अथवा पांडुरंग होगा, तो उसे ‘अन्या, पंड्या, पांडू’, ऐसी गलत पद्धति से बुलाते हैं । व्यक्ति के नाम का अनादर करने से उसे देवताओं के अथवा नाम के स्पंदन नहीं मिलते हैं । इतना ही नहीं व्यक्ति के नाम का अनादर करने से हम भी पाप के भागीदार होते हैं ।

अनुभूति

देवी के नाम से कन्या का नाम रखना एवं कन्या को उस नाम से पुकारते समय कुलदेवी का स्मरण होना

‘मेरे एक संबंधी को कन्या हुई । जब वह रुग्णालय में थी, तब मेरे मनमें विचार आया, ‘इस कन्या का नाम हम कुछ ऐसा रखें जिसमें ‘भ’ एवं ‘व’ अक्षर आएं; क्योंकि मुझे उसमें भवानीमाता का आस्तत्व प्रतीत हुआ । हमने कन्या का नाम ‘वैभवी’ रखा । यह नाम ईश्‍वर ने ही सुझाया । हम सब जब उसे ‘वैभवी’ कहकर पुकारते हैं, तब हमें अपनी कुलदेवी का अर्थात भवानीमाता का स्मरण होता है ।’ – कु. उज्ज्वला डुबे, बीड, महाराष्ट्र. (इ.स. २००६)

प्रश्‍न : कन्या का नामकरण मंत्र रहित एवं पुत्र का मंत्र सहित करते हैं । ऐसा क्यों ?

लडकी के जननेंद्रिय पर दुष्परिणाम न हो; इसके लिए उसका नामकरण मंत्र रहित किया जाना

मंत्रों में ‘ॐ’ का उच्चारण बार-बार होता है । ‘ॐ’ से उत्पन्न स्पंदनों के कारण शरीर में अधिक शक्ति (उष्णता) उत्पन्न होती है । पुरुषों की जननेंद्रियां शरीर के बाहर होती हैं । इस कारण उसे इस उष्णता से कोई हानि नहीं होती । स्त्रियों की जननेंद्रियां पेडू में (शरीर के भीतर) होने के कारण इस उष्णता से उन्हें कष्ट हो सकता है । बडे होने पर उसे मासिकस्राव अधिक होना, न होना, मासिकस्राव के समय वेदना अधिक होना, इस प्रकार की विविध व्याधियां हो सकती हैं । इसलिए कन्याओं का नामकरण मंत्र रहित ही किया जाता है; जबकि लडकों का नामकरण मंत्र सहित किया जाता है ।

शिशू के जन्म उपरांत कौनसे संस्कार करने आवश्यक होते है, यह जानने हेतु भेंट दे ।

शिशू के जन्म उपरांत कौनसे संस्कार करें ?

संदर्भ : सनातननिर्मित ग्रंथ ‘सोलह संस्कार’