प्राणरक्षा हेतु साधना ही टीका है

‘रोगों से बचाव हेतु टीकाकरण होता है; उसी प्रकार तीसरे विश्‍वयुद्ध के समय प्राणरक्षा हेतु साधना ही टीका है ।’ – (परात्‍पर गुरु) डॉ. आठवले

ईश्वर से परिचय

‘पृथ्‍वी के काम भी बिना किसी के परिचय के नहीं होते; तब प्रारब्‍ध, अनिष्‍ट शक्‍तिजनित पीडा इत्‍यादि समस्‍याएं बिना ईश्‍वर से परिचय हुए बिना, क्‍या ईश्‍वर दूर करेंगे ?’ – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

अधिक समझदार बुद्धिजीवी

‘साधना से सूक्ष्म ज्ञान होने पर यज्ञ का महत्त्व समझ में आता है । महत्त्व न समझने के कारण ‘अधिक समझदार बुद्धिजीवी’, ‘यज्ञ में वस्‍तुएं जलाने की अपेक्षा गरीबों को दें’ का राग आलापते हैं !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

बुद्धिजीवियों का अज्ञान

बुद्धिजीवियों का बुद्धि से परे के भगवान नहीं होते’, यह कहना वैसा ही है, जैसे आंगनवाडी के बालक का यह कहना कि ‘डॉक्टर, अधिवक्ता आदि नहीं होते !’’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

चिरंतन आनंद केवल साधना से ही मिलता है ।

‘ईश्वर और साधना पर विश्‍वास न हो, तब भी चिरंतन आनंद प्रत्येक को चाहिए । वह आनंद केवल साधना से ही मिलता है । एक बार यह ध्यान में आने पर, साधना का कोई विकल्प न होने के कारण मानव साधना हेतु प्रवृत्त होता है ।’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

यज्ञ के स्थूल और सूक्ष्म धुएं से होनेवाला परिणाम 

‘जिस प्रकार शरीर के कीटाणु शरीर में ली गई औषधियों से मरते हैं । उसी प्रकार वातावरण में विद्यमान नकारात्मक रज-तम यज्ञ के स्थूल और सूक्ष्म धुएं से नष्ट होते हैं ।’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

खरी शांति का अनुभव कब होता है ?

‘निर्गुण ईश्‍वरीय तत्त्व से एकरूप होने पर ही खरी शांति का अनुभव होता है । तब भी शासनकर्ता जनता को साधना न सिखाकर ऊपरी मानसिक स्तर के उपाय करते हैं, उदा. जनता की अडचनें दूर करने के लिए ऊपरी प्रयत्न करना, मानसिक चिकित्सालय स्थापित करना इत्यादि ।’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

प्रत्येक पीढी के कर्तव्य !

‘प्रत्येक पीढी अगली पीढ़ी को समाज, राष्ट्र और धर्म के संदर्भ में अपेक्षा से देखती है । इसके स्थान पर प्रत्येक पीढी को ‘हम क्या कर सकते हैं ?’, ऐसे विचार कर ऐसा कार्य करना चाहिए कि अगली पीढ़ी को उसके संदर्भ में कुछ भी करने की आवश्यकता ही न हो और इस कारण वे … Read more

हिन्दू संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति में फर्क

‘पश्‍चिमी संस्‍कृति शरीर, मन व बुद्धि को सुख देने हेतु प्रयत्नशील रहती है; जबकि हिन्‍दू संस्‍कृति ईश्‍वरप्राप्‍ति का मार्ग दिखाती है ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

ईश्वर सर्वत्र हैं

‘हिन्‍दू धर्म की सीख है कि ‘ईश्‍वर सर्वत्र हैं, सभी में हैैं’ । इसीलिए हिन्‍दुओं को अन्‍य पंथियों का द्वेष करना नहीं सिखाया जाता ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले