मनुस्मृति का विरोध करनेवाले पहले ठीक से मनुस्मृति का अध्ययन करें !

कुछ मास पूर्व वेदशास्त्रसंपन्न विष्णुशास्त्री बापट ने ‘सार्थ श्रीमनुस्मृति’ इस नए नाम से मनुस्मृति का मराठी में भाषांतर कर उसका लोकार्पण किया था ।

नालासोपारा में हुई घटना से तनिक भी संबंध न होते हुए परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी की अपकीर्ति करने का अत्यंत अनुचित प्रयास !

नालासोपारा के प्रकरण से दूर-दूर तक संबंध न होते हुए भी सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले के छायाचित्र समाचार में निरंतर दिखाकर उनकी एवं सनातन संस्था की अपकीर्ति करने का अश्लील प्रकार इस समाचार द्वारा किया गया है ।

ज्ञानप्रबोधिनी या अज्ञानप्रबोधिनी ?

ज्ञानप्रबोधिनी की वटसावित्री पोथी के प्रारंभ में ऐसा उल्लेख है कि ‘पर्यावरण शुद्धि और रक्षा के लिए वटसावित्री की पूजा की जाती है !’ वटवृक्ष (बरगद का वृक्ष) की शुद्ध वायु सेे सत्यवान को होश आया जिससेे सावित्री को आनंद हुआ ।

गणेशमूर्तियों के विसर्जन से जल-प्रदूषण होता है यह कहनेवालो, नगरों के नालों से होनेवाले भीषण जलप्रदूषण का भी विचार करें !

सहस्रों वर्ष से होनेवाले गणेशमूर्तियों के विसर्जन से कभी पर्यावरण की हानि नहीं हुई । परंतु, अपने उदय के पश्चात केवल १०० वर्ष में विज्ञान ने पर्यावरण की अपार हानि कर डाली ।

‘महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर दूध का अभिषेक न कर उस दूध को अनाथों को दें’, ऐसा धर्मद्रोही आवाहन करनेवालों को अभिमान के साथ निम्न उत्तर दें !

भगवान शिवजी को संभवतः दूध से अभिषेक करना चाहिए; क्योंकि दूध में शिवजी के तत्त्व को आकर्षित करने की क्षमता अधिक होने से दूध के अभिषेक के माध्यम से शिवजी का तत्त्व शीघ्र जागृत हो जाता है । उसके पश्‍चात उस दूध को तीर्थ के रूप में पीने से उस व्यक्ति को शिवतत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

श्राद्ध : अन्य पंथ और श्राद्ध

पृथ्वी पर (दक्षिण दिशा में भूमि खोदकर वहां दर्भ (कुश) फैलाकर उस पर ३ पिंडों का दान करने से नरक में स्थित पूर्वजों का उद्धार होता है । पुत्र को हर प्रकार से मृत पिता का श्राद्ध करना चाहिए ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को अवतार कहने के पीछे क्या शास्त्र है, यह जानने की अपेक्षा उनपर टिपण्णी करनेवालों, इस बात की ओर ध्यान दीजिएं !

‘१८ तथा १९ मई को महर्षी की आज्ञा से परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का अमृत महोत्सव संपन्न हुआ था । उस समय उन्होंने महर्षी की ही आज्ञा से श्रीकृष्ण एवं श्रीराम के वस्त्रालंकार धारण किए थे । इस समारोह पर कुछ बुद्धिप्रामाण्यवादी टिपण्णी कर रहे हैं । वास्तविक रूप से परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने कभी भी स्वयं को … Read more

हिंदू धर्मग्रंथ मांसभक्षण का समर्थन नही, निषेधही करते है ।

“वेदों मे मांसभक्षण” का झूठा और निराधार प्रचार यवनों और मलेक्षों द्वारा हमारी संस्कृति को कलंकित करने के उद्देश्य और क्षुदा पूर्ती से किया गया था ।

Donating to Sanatan Sanstha’s extensive work for nation building & protection of Dharma will be considered as

“Satpatre daanam”