गणेशतत्त्व आकर्षित करनेवाली रंगोलियां

नित्य उपासना में भाव अथवा सगुण तत्वकी, तथापि गणेशाेत्सव में आनंद अथवा निर्गुण तत्त्वकी रंगोलियां बनाएं ।

गुरुदेवजी के जन्मोत्सव के समय गायनसेवा प्रस्तुत करनेवाली २ साधिकाओं में से एक साधिका की आंखें बंद होना तथा दूसरी साधिका की आंखे खुली रहना, इसका शास्त्र !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के ७७वें जन्मोत्सव के अवसरपर अध्यात्म विश्वविद्यालय की ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त साधिका कु. तेजल पात्रीकर एवं कु. अनघा जोशी ने गायन के माध्यम से स्वरांजली समर्पित की ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनकर जिसने निद्रानाश से मुक्ति पाई, वह इटली का तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी !

पंडित ठाकुर ने राग पुरिया के आलाप लेना आरंभ किया । इस राग में ऐसा एक चमत्कारिक प्रकार था कि जिससे मुसोलिनी केवल १५ मिनटों में ही निद्राधीन हुआ ।

कला के लिए कला नहीं, ईश्‍वरप्राप्ति के लिए कला

विविध कलाआें की ओर देखने का सनातन का दृष्टिकोण – केवल कला के लिए कला नहीं, ईश्‍वरप्राप्ति के लिए कला है । इसलिए, सनातन संस्था कला के माध्यम से भी ईश्‍वर को प्राप्त करना सिखाती है ।

साधक को केवल गुरुकृपा से ही भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर शास्त्रीय संगीत का महत्त्व ध्यान में आकर प्राप्त आनंद की अनुभूति !

प्रत्येक व्यक्ति के सत्त्व, रज और तम के त्रिगुणों की संख्या अलग-अलग है। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति की रुचि और पसंद अलग हैं। संगीत के मामले में भी ऐसा ही है। हर व्यक्ति अपने रूचि के अनुसार संगीत सुन रहा है।

वाहिनी पर प्रदर्शित होनेवाली धार्मिक मालिकाओं के संगीत में सात्त्विकता तथा पंडित जसराज द्वारा गाए आलापों के संदर्भ में साधक को प्राप्त ज्ञान !

लगभग ४-५ वर्ष पूर्व मैंने ‘देवों के देव महादेव’ नामक धारावाहिक की कुछ कडियां देखी थीं । उसमें बीच-बीच में पंडित जसराज के विशेषता से परिपूर्ण आलाप सुने । तत्पश्चात् मुझे उसका विस्मरण हुआ था;किंतु ४ माह पूर्व मुझे नींद में पंडित जसराज के आलाप लगातार सुनाई देने लगे ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के कलाकारों की दयनीय स्थिति

सद्गुरु (सौ.) अंजली गाडगील काकूने बताया संगीत साधना में बैखरी वाणी की अपेक्षा अंतर्मन में नादब्रह्म जागृत करने का महत्त्व है । नहीं तो संपूर्ण जीवन ऐसे ही गाने में व्यर्थ जाएगा ।

नृत्य करने का मूल उद्देश्य साध्य करने के लिए ‘ईश्‍वरप्राप्ति के लिए नृत्यकला’ यह दृष्टिकोण सबके सामने प्रस्तुत करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

हमारी संस्कृति में नृत्यकला का प्रादुर्भाव मंदिरों में ही हुआ है । इसका विकास एक उपासना माध्यम के रूप में हुआ । इसके माध्यम से भी ईश्‍वरप्राप्ति हो, इसके लिए सनातन की साधिका श्रीमती सावित्री इचलकरंजीकर और डॉ. (कुमारी) आरती तिवारी ने नृत्य आरंभ किया है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने ‘ईश्‍वरप्राप्ति हेतु संगीत’ के विषय में साधिकाआें को किया हुआ मार्गदर्शन तथा संगीतसाधना के विषय में दिए हुए विविध दृष्टिकोण

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शनानुसार सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ ने संगीत के माध्यम से साधना  आरंभ की । संगीत के किसी भी राग को गाते समय अध्यात्म के दृष्टिकोण से क्या लगना चाहिए अथवा स्वर्गलोक का संगीत कैसा है, इस विषय का अभ्यास आरंभिक काल में उन्होंने किया । इसी प्रकार का संशोधन वर्तमान … Read more

सूक्ष्म-चित्रकला के माध्यम से अज्ञान से ज्ञान की ओर एवं चित्रकलारूपी तेज की ओर से ज्ञानरूपी आकाश की ओर ले जानेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवले !

  सूक्ष्म जगत से परिचित करानेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ! संसार में अनेक महाविद्यालय हैं; परंतु किसी भी कला महाविद्यालय में अध्यात्मसंबंधी शिक्षा नहीं दी जाती । ‘कला क्या है ?’ ‘कलाएं कैसे निर्मित हुई?’ ‘कलाएं कितने प्रकार की होती हैं’ ‘जीवन में कला का महत्त्व क्या है ?’, यह भी किसी कला महाविद्यालय … Read more