पाप एवं समष्टि पाप

उचित कर्म कर प्रारब्ध पर मात करने की एवं अपने साथ ही संपूर्ण सृष्टि को सुखी करने की क्षमता ईश्‍वर ने केवल मनुष्य को दी है । ऐसा होते हुए भी इस क्षमता का उपयोग अपना स्वार्थ साधने, निष्पाप जीवों पर अन्याय करने, अन्यों पर अधिकार जमाने इत्यादि अधर्माचरण करने से समाज का प्रारब्ध दूषित होता है ।

पाप के दुष्परिणामों का निराकरण कैसे करें ?

प्रायश्‍चित कर्म से पाप के दुष्परिणामों का निराकरण संभव है । प्रायश्‍चित पापमुक्ति के लिए हैं । प्रायश्‍चित अर्थात स्वयं से हुई भूल एवं दुष्कृत्यों के लिए पश्‍चाताप होना तथा उसके लिए धर्म में बताए दंड भुगतना ।

कुछ अटल चूकें और उनके लिए विविध प्रायश्‍चित

अधिकांशत: सदैव होनेवाली भूल के लिए प्रायश्‍चित कर्म है नित्यनैमित्तिक कर्म अर्थात दैनिक पूजा-अर्चना, स्नान-संध्या, व्रत इत्यादि । (इन कर्मों के सन्दर्भ में विस्तृत विवरण सनातन के ग्रंथ कर्म का महत्त्व, विशेषताएं व प्रकार में दिया है ।

पाप-पुण्य लगने के नियम

कौनसा कर्म पाप अथवा पुण्य निर्माण करता है, यह बताने का अधिकार मात्र धर्मशास्त्र का है; क्योंकि कौनसा कर्म अच्छा है अथवा बुरा, यह निर्धारित करने के लिए अपनी बुद्धि अल्प सिद्ध होती है ।

साधना कर पुण्य बढाने का महत्त्व

व्यक्तिने अपने पूर्वजन्मों में जो कुछ अच्छे कर्म, परोपकार एवं दानधर्म किए होंगे, उसका फल पुण्य के रूप में एकत्र होता है और वह आपको अगले जन्म में सुख के रूप में मिलता है ।

कर्मयोग के संदर्भ में शंकानिरसन

चाकरी में (नौकरी में) घूस लेना पडता है । न लेने पर ऊपर के एवं नीचे के लोग (वरिष्ठ एवं कनिष्ठ श्रेणी के लोग) बहुत कष्ट देते हैं । ऐसे में मन को बहुत कष्ट होता है । इसके लिए क्या करें ?

पाप की व्याख्या एवं प्रकार

धर्मशास्त्र द्वारा निषिद्ध बताए गए कर्म करने से अथवा किसी व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्य न निभाए जाने से जो निर्मित होता है, वह ‘पाप’ है । उदा. चोरी करना, .

पाप का फल (कर्मविपाक)

मनुष्यजन्म में अधर्माचरण एवं पापाचार कर मनुष्यजन्म का अनुचित उपयोग करने का अर्थ है, ईश्वरीय नियमों के विपरीत व्यवहार करना । जिसका जैसा कर्म होगा, उसके अनुसार ईश्वर उसे न्याय देते हैं; अतः मानव द्वारा होनेवाले अपराध के अनुसार उसे दंड मिलता ही है एवं उसे वह भोगकर ही समाप्त करना पडता है ।

देवालय के पुजारियों के अनुचित कृत्यों से लगनेवाले पाप

कहीं-कहीं पुजारी उपर्युक्त प्रकार के अनुचित कृत्य करते हैं । इसलिए कुछ लोग पुजारीको पूजा का ‘अरि’, अर्थात शत्रु’ कहते हैं । ऐसे पुजारी अगले जन्म में देवालय के द्वारपर कुत्ता अथवा भिखारी बनकर रहते हैं ।