कुछ देवियों की उपासना की विशेषताएं

अंबाबाई एवं तुळजाभवानी ये जिनकी कुलदेवता होती हैं, उनके घर विवाह जैसी विधि के पश्चात देवी की स्तुति करते हैं । कुछ लोगों के यहां विवाह जैसे कार्य निर्विघ्न होने हेतु सत्यनारायण की पूजा करते हैं

देवी का महत्त्व !

कुलदेवी, ग्रामदेवी, शक्तिपीठ आदि रूपों में देवी के विविध सगुण रूपों की उपासना की जाती है । हिन्दू संस्कृति में जितना महत्त्व देवता का है उतना ही महत्त्व देवी को भी दिया जाता है,

सनातन संस्था और हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों की कर्नाटक सरकार को सावधान करनेवाली चेतावनी !

सभी हत्याआें में समान कार्यपद्धति है, ऐसा कहनेवाली नक्सलवादियों से संबंधित संस्थाएं, कर्नाटक में गुप्त रूप से प्रवेश करना चाहती हैं । शासन को इन्हें रोकना चाहिए । ‘हम इस प्रकरण के सभी कागदपत्र कर्नाटक पुलिस को देने के लिए तैयार हैं’, ऐसा आवाहन भी इस समय सनातन संस्था के प्रवक्ता तथा अधिवक्ताआें ने किया ।

चंडीविधान (पाठ एवं हवन)

श्री दुर्गादेवी का एक नाम है चंडी । मार्कडेय पुराण में चंडी देवी का माहात्म्य बताया गया है, जिसमें उसके अवतारों का एवं पराक्रमों का विस्तार से वर्णन किया गया है ।

आद्याशक्ति

महाकाली ‘काल’ तत्त्व का, महासरस्वती ‘गति’ तत्त्व का एवं महालक्ष्मी ‘दिक्’ (दिशा) तत्त्व का प्रतीक है । काल के प्रवाह में सर्व पदार्थों का विनाश होता है ।

कुदृष्टि उतारने की पद्धति का अध्यात्मशास्त्रीय आधार एवं अनुभूतियां

प्रार्थना के कारण देवता के आशीर्वाद से कुदृष्टिग्रस्त व्यक्ति की देह के भीतर और बाहर के कष्टदायक स्पंदन अल्पावधि में कार्यरत होकर कुदृष्टि उतारने हेतु उपयुक्त घटकों में घनीभूत होकर, तदुपरांत अग्नि की सहायता से अल्पावधि में नष्ट किए जाते हैं ।

श्राद्धकर्ता के लिए आचरणीय कुछ विधि-निषेध

श्राद्ध के दिन किए जानेवाले आवाहनात्मक मंत्रोच्चारण का प्रभाव श्राद्ध में प्रत्यक्ष सम्मिलित होनेवाले व्यक्तियों पर पडता है । इससे उनके पंचप्राण जागृत होते हैं और देह में तेजतत्त्व बढता है ।

पितरों का ‘वार्षिक श्राद्ध’ और ‘पितृपक्ष में महालय श्राद्ध’ दोनों क्यों करना चाहिए ?

प्रत्येक कार्य विशिष्ट तिथि अथवा मुहूर्त पर करना विशेष लाभदायक है; क्योंकि उस दिन उन कर्मों का कालचक्र, उनका प्रत्यक्ष होना तथा उनका परिणाम, इन सभी के स्पंदन एक-दूसरे के लिए सहायक होते हैं ।