विनम्र, निरपेक्ष एवं सेवाभावी पू. नीलेश सिंगबाळ !

पू. सिंगबाळजी में सीखने की वृत्ति भी अत्यधिक है । कोई कुछ नया बताए, तो पूरी एकाग्रता से सुनते हैं और उसके विषय में पूछते हैं । उनके मुख से श्‍वेत प्रकाश प्रक्षेपित होता दिखता था और उनमें प.पू. गुरुदेवजी की छवि दिखती थी ।

देवद (पनवेल) के सनातन के आश्रम में शिवगिरी महाराज की पादुका तथा दत्तपालकी का चैतन्यमय वातावरण में आगमन !

शिवगिरी महाराज की पादुका तथा दत्तगुरु के छायाचित्र का पूजन सनातन के ६३ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त हुए साधक श्री. अनिल कुलकर्णी ने किया, तो धर्मध्वज तथा धर्मदंड का पूजन ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त हुए श्री. अविनाश गिरकर ने किया ।

निरपेक्ष प्रेम देकर अतिथियों को अपनी ओर आकर्षित करनेवाला रामनाथी (गोवा) का सनातन आश्रम

सनातन आश्रम में प्रवेश करते ही हंसकर स्वागत होता है । बिना बताए ही सामान कक्ष में रखने हेतु सहायता की जाती है । साधक यह सर्व इतने प्रेम, सहजता और शीघ्र गति से करते हैं, कि आनेवाला देखते ही रह जाता है । कुछ पूछना नहीं पडता न ही कुछ मांगना पडता है ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के कलाकारों की दयनीय स्थिति

सद्गुरु (सौ.) अंजली गाडगील काकूने बताया संगीत साधना में बैखरी वाणी की अपेक्षा अंतर्मन में नादब्रह्म जागृत करने का महत्त्व है । नहीं तो संपूर्ण जीवन ऐसे ही गाने में व्यर्थ जाएगा ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के अमृत महोत्सव समारोह के समय तुला का यू.टी.एस. (यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर) उपकरण से महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय द्वारा किया वैज्ञानिक परीक्षण !

अत्युच्च स्तर के संत ईश्‍वर के सगुण रूप होते हैं । उनकी देह सात्त्विकता का स्रोत होती है । इसलिए संतों के संपर्क में आने पर चराचर इस सात्त्विकता से भारित हो जाता है और उसमें विविध सकारात्मक परिवर्तन होते हैं ।

प.पू. डॉक्टरजीसे आश्रम की स्वच्छता के विषय में एवं अन्य सीखने को मिले हुए सूत्र

अस्वच्छता तथा अव्यवस्थितपन का निवास जहां रहेगा, वहां अनिष्ट शक्तियों का प्रादुर्भाव होना तथा प.पू. डॉक्टरजी ने आश्रम के अनिष्ट स्पंदनदूर करने के लिए स्वयं सफाई करना !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा समय-समय पर दिए गए साधना के विषय में दृष्टिकोण

गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुतत्त्व १ सहस्र गुना मात्रा में कार्यरत होने से गुरुपूर्णिमा सभी शिष्य, भक्त एवं साधकों के लिए एक अनोखा पर्व होता है । केवल गुरुकृपा के कारण ही साधक की आध्यात्मिक उन्नति होती है ।

मां-पिता समान सभी साधकों को आध्यात्मिक स्तर पर घडने के लिए प्रयासरत पू. (श्रीमती) सूूरजकांता मेनरायजी !

सनातन की ४५ वीं संत पूज्य (पू.) मेनराय दादी का ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को जन्मदिन है  इस निमित्त उनकी ध्यान में आई गुणविशेषताएं यहां दे रहे हैं । 

सहस्रों वर्षों के काल-पटल पर अपना प्रभाव अंकित करनेवाले अवतारी पुरुष !

साधारण व्यक्ति का जीवन पक्षियों की भांति होता है, ४ तिनकों से बनी गृहस्थी ! उनमें से भी जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को त्याग कर समाज, राष्ट्र एवं धर्म हेतु अपना जीवन अर्पित करते हैं, वे विभूति कहलाते हैं । ऐसी अनेक विभूतियों को भारत मां ने अपनी गोद में खेलाया है । कुछ व्यक्ति सही समय पर अपने कार्य छाप अंकित कर, कीर्ति अर्जित करते हैं ।

सनातन की संत पू. (श्रीमती) सूरजकांता मेनराय द्वारा साधकों को बताएं गए अनमोल सूत्रं

सनातन की ४५ वी संत पू. (श्रीमती) सूरजकांता मेनराय को ७५ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं । उस अवसर पर उन्होंने साधकों को मार्गदर्शक सूत्रं बताएं ।