केवल साधक ही नहीं, ,अपितु प्राणी, पशु और पक्षियोंपर भी प्रेमकी वर्षा कर उन्हें अपनानेवाले प.पू. गुरुदेवजी !

सनातन संस्थाके अनेक साधक, बालसाधक एवं युवासाधक पूर्णकालीन साधना हेतु आश्रममें रहने आते हैं, वह केवल परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा उनपर किए जानेवाले निरपेक्ष प्रेमभावके कारण ही !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कृतज्ञताभाव को दर्शानेवाली अद्वितीय तथा आदर्शवत् कृतियां !

प.पू. बाबाजी द्वारा उपयोग की गई गाडी का आश्रम में आगमन होनेपर उनमें मानो प.पू. बाबाजी ही आश्रम में आए हैं, इस प्रकार का आनंद था ।

शिष्यभाव का महत्त्व

साधना में साधक के लिए शिष्यभाव में रहना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है । वह जब शिष्य बनता है, तब उसकी आगे की प्रगति गुरुकृपा से ही होती है । शिष्य बनने पर ही, गुरु साधक का पूरा दायित्व लेते हैं ।

सभी दृष्टि से आदर्श और परिपूर्ण परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी !

परात्पर गुरुपद पर विराजमान होते हुए भी परात्पर गुरु डॉक्टरजी का स्वयं के अहं-निर्मूलन की ओर ध्यान, देवता तथा ईश्‍वर की भांति निरंतर कार्यरत रहने की तथा उनके गुणों को आत्मसात करने की लगन, इन गुणों के कारण वे एक आदर्श ज्ञानोत्तर कर्मयोगी हैं ।

साधकों को प्रत्यक्ष कृति से सिखानेवाले परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवलेजी !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की जीवन यात्रा देखें तो उनकी प्रत्येक कृति आदर्श है, यह पग-पग पर दिखाई देता है । साधक भी वैसे ही तैयार होें, वह सेवा की बारीकियों का अध्ययन कर प्रत्येक कृति ईश्‍वर को अपेक्षित ऐसी परिपूर्ण करें, ऐसी उनकी लगन है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कक्ष और परिसर में हुए बुद्धिअगम्य परिवर्तन

जीव की साधना जैसे-जैसे वृद्धिंगत होती है, वैसे-वैसे उससे अधिकाधिक सात्त्विकता प्रक्षेपित होकर उसके संपर्क में आनेवाली वस्तु, वास्तु और आसपास का वातावरण चैतन्यमय बनने लगता है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के समष्टि गुरु और जगद्गुरु होने से उनका अवतारी कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में आरंभ रहता है ।

सहस्रों वर्षों के काल-पटल पर अपना प्रभाव अंकित करनेवाले अवतारी पुरुष !

साधारण व्यक्ति का जीवन पक्षियों की भांति होता है, ४ तिनकों से बनी गृहस्थी ! उनमें से भी जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को त्याग कर समाज, राष्ट्र एवं धर्म हेतु अपना जीवन अर्पित करते हैं, वे विभूति कहलाते हैं । ऐसी अनेक विभूतियों को भारत मां ने अपनी गोद में खेलाया है । कुछ व्यक्ति सही समय पर अपने कार्य छाप अंकित कर, कीर्ति अर्जित करते हैं ।

स्वयं के कृत्य से ही ‘साधक आचरण कैसे करें ?’, इसका आदर्श सभी के समक्ष रखनेवाले प.पू. डॉक्टरजी !

किसी भी प्रकार की अर्थप्राप्ति न होते हुए भी अपना धन भी धर्मकार्य हेतु देकर त्याग करना, किसी भी प्रकार के आडंबर के बिना ‘प्रत्येक बात सादगी से तथा साधना स्वरूप करना, मान-सम्मान की अपेक्षा न रखनेवाले, कर्तापन ईश्‍वर को देकर निष्काम भावना से कार्य करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवले !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के शरीर की विशेषताएं, इस्मॉग स्पायन (Esmog Spion) वैज्ञानिक उपकरण की सहायता से समझने के लिए किया वैज्ञानिक परीक्षण

सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के शरीर में पिछले कुछ वर्षों से अनेक ऐसे परिवर्तन (उदा. बाल सुनहरे होना, त्वचा पीली होना, नख पीले और पारदर्शक होना) हो रहे हैं

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का आदर्श जीवन

प.पू. डॉक्टरजी की अलौकिकता का शब्दों में वर्णन करना असंभव है’, ऐसा महर्षि बताते हैं और साधकों ने प्रत्यक्ष में यह अनुभव भी किया है । मैं पिछले १६ वर्ष से प.पू. डॉक्टरजी के सान्निध्य में साधना कर रहा हूं । इस कालखंड में उनके संदर्भ में अनेक अनुभूतियां मुझे भी हुई हैं ।

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“Satpatre daanam”