सनातन की संत पू. (श्रीमती) सूरजकांता मेनराय द्वारा साधकों को बताएं गए अनमोल सूत्रं
सनातन की ४५ वी संत पू. (श्रीमती) सूरजकांता मेनराय को ७५ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं । उस अवसर पर उन्होंने साधकों को मार्गदर्शक सूत्रं बताएं ।
सनातन की ४५ वी संत पू. (श्रीमती) सूरजकांता मेनराय को ७५ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं । उस अवसर पर उन्होंने साधकों को मार्गदर्शक सूत्रं बताएं ।
सेवा की लगन, निर्मलता, प्रेमभाव, ईश्वर के प्रति भाव इत्यादि गुणों से युक्त पुणे की सनातन की संत पू. (श्रीमती) प्रभा मराठेआजी (आयु ८० वर्ष ) !
आश्रम में सैकडों साधक हैं तथा वे प.पू. डॉक्टरजी का प्रत्येक शब्द झेलने के लिए तैयार हैं । तब भी प.पू. डॉक्टरजी कभी किसी भी साधक को स्वयं के काम नहीं बताते । वे अपने सभी काम स्वयं ही करते हैं ।
हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक पूज्य डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी ने कहा, श्री शर्मा जब अपना मनोगत व्यक्त कर रहे थे, तब उसे सुनकर सबको शांति और आनंद की अनुभूति हुई । क्योंकि, उनका आध्यात्मिक स्तर ६४ प्रतिशत हो गया है ।
प.पू. डॉक्टरजी परात्पर गुरु के सर्वाेच्चपद पर विराजमान हैं । इतनी उच्च स्थिति में होते हुए भी प.पू. डॉक्टरजी ने अपना शिष्यत्व बनाए रखा है । उनके अनेक कृत्यों से यह सीखने को मिलता है । इनमें से कुछ उदाहरण आगे दे रहे हैं । १. भेंट लेने आए संतों के सामने भी शिष्यभाव … Read more
‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के गुरु सन्त भक्तराज महाराजजी ने उनसे एक बार कहा था, ‘‘मेरे गुरु ने मुझे आशीर्वाद दिया था कि तू किताबों पर किताबें लिखेगा ।’ किन्तु मैं भजन का एक ही ग्रन्थ लिख पाया । वह आशीर्वाद मैं आपको देता हूं ।
उच्च विद्याविभूषित प.पू. डॉक्टरजी ने उनके गुरू की , परात्पर गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी की तन-मन-धन अर्पण कर परिपूर्ण सेवा की ।
प.पू. डॉक्टरजी साधकों को विनोद की भाषा में सिखाते हैं । संत और गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है और वह समष्टि को कुछ सिखाता है ।
सनातन संस्था के अल्प अवधि में ही विश्वव्यापी होने के पीछे कुछ विशेषताएं हैं; परंतु ये विशेषताएं आध्यात्मिक स्तर की हैं ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजीकी देह, नख और केश में दैवी परिवर्तन हो रहे हैं । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजीके समान ही शरीरमें दैवी परिवर्तनकी अनुभूति सनातनके कुछ सन्तों और साधकों को भी हुई है ।