गोमय से बनी अशास्त्रीय गणेशमूर्ति उपासक को आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक न होकर धर्मशास्त्रानुसार बनी सनातन-निर्मित शास्त्रीय गणेशमूर्ति आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक होना

गोमय से बनी अशास्त्रीय गणेशमूर्ति एवं मिट्टि से बनी शास्त्रीय गणेशमूर्ति इनसे प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदनों का विज्ञान की सहायता से अध्ययन करने हेतु ९.३.२०१८ के दिन रामनाथी, गोवा स्थित सनातन के आश्रम में ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ की ओर से एक प्रयोग किया गया ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा बताया प्रतिशत और उपकरणों द्वारा किए परीक्षण में समानता होना तथा उनके दृष्टा होने की प्रतीति !

देवता का चित्र उनके मूल रूप से जितना अधिक मिलता-जुलता होता है, उतना ही उसमें देवता का तत्त्व अधिक मात्रा में होता है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का मुखमंडल, आश्रम की दीवारें तथा साधकों के शरीरपर अनिष्ट शक्तियों के मुख और आकृतियां दिखाई देना

प्रत्येक युग में देवासुर युद्ध निरंतर होता रहता है । आज के इस कलियुगांतर्गत कलियुग में भी वह चल रहा है । सप्तलोकों में विद्यमान दैवीय अथवा अच्छी और सप्तपातालों में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों में चल रहे इस युद्ध का स्थूल से प्रकटीकरण भूतलपर भी विविध रूपों में दिखाई देता है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का कक्ष तथा उससे संबंधित वस्तुओं में आए बुद्धिअगम्य परिवर्तन !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी समष्टि गुरु एवं जगद्गुरु होने के कारण उनका अवतारकार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में चालू रहता है । इस कार्य को पूर्णत्व की ओर ले जाने हेतु उनके कक्ष में कार्यरत पंचतत्त्व अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होती हैं ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का कक्ष तथा परिसर में स्थित वृक्षोंपर हुए अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण

वर्ष १९८९ से लेकर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के जीवन में कई बार महामृत्युयोग आए । वर्ष २००९ में आया हुआ परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का महामृत्युयोग तो बहुत कठिन था ।

‘ईश्‍वरीय राज्य’ की निर्मिति की अटल प्रक्रिया : सूक्ष्म का ‘देवासुर युद्ध’ !

वातावरण में अच्छी और अनिष्ट दोनों प्रकार की शक्तियां कार्यरत होती हैं । कोई भी शुभकार्य करते समय अच्छी और अनिष्ट इन दोनों शक्तियों का संघर्ष होता है ।

यज्ञ का प्रथमावतार ‘अग्निहोत्र’के विषय में वैज्ञानिक शोध !

विज्ञान के माध्यम से अग्निहोत्र का वातावरणपर क्या परिणाम होता है ?, इसके अध्ययन हेतु महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय की ओर से एक परीक्षण किया गया । इस परीक्षण हेतु यू.टी.एस्. (युनिवर्सल थर्मो स्कैन) उपकरण का उपयोग किया गया ।

एक दिन यज्ञ करने से १०० यार्ड क्षेत्र में १ मासतक प्रदूषण नहीं हो सकता ! – अवकाश वैज्ञानिक डॉ. ओमप्रकाश पांडेय

बेंगलुरु की प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण से यह प्रमाणित हुआ है कि हम हवन और यज्ञ कर स्वयं को रोगों से दूर रख सकते हैं । एक दिन यज्ञ करने से १०० यार्ड क्षेत्र में १ मासतक प्रदूषण नहीं हो सकता ।

योगतज्ञ दादाजी वैशंपायन द्वारा दी गई संस्कारित दत्तमूर्ति का परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा आध्यात्मिक उपचारों के लिए उपयोग करने पर उस दत्तात्रेय मूर्ति पर हुआ परिणाम

‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी विश्वकल्याण हेतु सत्त्वगुणी लोगों का ईश्वरी राज्य स्थापित करने हेतु प्रयासरत हैं । ज्योतिषशास्त्रानुसार वर्ष १९८९ से उनके जीवन में अनेक बार महामृत्युयोग आए हैं ।

‘बॉम्बे’, ‘औरंगाबाद’ जैसे आक्रांताओ के नाम परिवर्तित कर ‘मुंबई’, ‘संभाजीनगर’ जैसे भाषा, राष्ट्र और धर्म का अभिमान रखनेवाले नाम नगरों को देने की आवश्यकता स्पष्ट करनेवाली वैज्ञानिक जांच

प्राचीन काल में नगरों के नाम वहां के ग्रामदेवता, पराक्रमी राजा इत्यादि के नामों पर आधारित होते थे । इसलिए नगरों के नाम सात्त्विक होते थे ।