विद्युत दीप से युक्त प्लास्टिक का दीया और मोम का दीया जलाने से वातावरण में नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं, जबकि तिल का तेल और कपास की बाती लगे मिट्टी के पारंपरिक दीये से सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं !

भाईयो और बहनो, दीवाली में विद्युत चीनी दीये और मोम के दीयों को दूर रखें, तिल का तेल और कपास की बाती डालकर मिट्टी के पारंपरिक दीये लगाकर उनका आध्यात्मिक स्तर पर लाभ उठाएं !’ 

पिप (पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी – PIP)

किसी घटक में (वस्तु, वास्तु, प्राणी अथवा व्यक्ति में) कितने प्रतिशत सकारात्मक स्पंदन हैं ? वह घटक सात्त्विक है या नहीं अथवा वह घटक आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक है या नहीं ?, यह बताने के लिए सूक्ष्म का ज्ञान होना आवश्यक है ।

वैज्ञानिक तथा यज्ञ के विषय में अध्ययन करनेवाले अभ्यासी, साथ ही इस विषय की शिक्षा लेनेवाले छात्रों को वैज्ञानिक दृष्टि से अनुसंधान के लिए विनम्र अनुरोध !

प.पू. रामभाऊस्वामीजी यज्ञकुंडपर अग्नि के प्रज्वलित होने के समय उसमें स्वयं को समर्पित करते हैं । इस संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टि से शोध करनेवाले यदि हमारी सहायता करते हैं, तो हम उनके प्रति कृतज्ञ रहेंगे ।

प.पू. रामभाऊस्वामीजी द्वारा गोवा के सनातन आश्रम में किए गए उच्छिष्ट गणपति यज्ञ का वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन के उद्देश्य से यु.टी.एस्. (Universal Thermo Scanner) नामक उपकरण की सहायता के अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से किया गया वैज्ञानिक परीक्षण !

यज्ञसंस्कृति की रक्षा हेतु प्रयासशील तंजावूर, तमिलनाडू के महान योगी प.पू. रामभाऊस्वामीजी अपने विशेषतापूर्ण यज्ञों द्वारा समाज को भौतिक तथा आध्यात्मिक स्तर का लाभ पहुंचाने का दैवीय कार्य कर रहे हैं । उन्होंने १५.१.२०१६ को गोवा के सनातन आश्रम में उच्छिष्ट गणपति यज्ञ का आरंभ किया । इस यज्ञ का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन ।

अत्यंत उच्च तापमानवाले यज्ञकुंड में समर्पित होकर स्वयं के शरीर के तापमान को सर्वसामान्य रखनेवाले तंजावूर (तमिलनाडू) के महान योगी प.पू. रामभाऊस्वामीजी !

परीक्षण के समय यज्ञकुंड का तापमान १४६.५ अंश सेल्सियस था । उस समय यज्ञकुंड में समर्पित प.पू. रामभाऊस्वामीजी के शरीरपर ओढी हुई शॉल का तापमान ३९.५ अंश सेल्यियस था |

यूनिवर्सल थर्मो स्कॅनर (UTS)

यू.टी.एस उपकरण का परिचय :इस उपकरण को ऑरा स्कैनर भी कहते हैं । इससे घटकों (वस्तु,भवन,प्राणी और मनुष्य)की ऊर्जा और उनका प्रभामंडल मापा जा सकता है ।

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने से साधकों पर हुए परिणामों का वैज्ञानिक परीक्षण

सामान्य व्यक्ति अथवा वस्तु का प्रभामण्डल लगभग १ मीटर होता है । प्रक्रिया आरम्भ करने से पहले साधक और साधिका का प्रभामण्डल क्रमशः १.५२ मीटर एवं १.५० मीटर था । प्रक्रिया १ मास करने पर उनका प्रभामण्डल क्रमशः १.७४ मीटर तथा १.६० मीटर हो गया, अर्थात दोनों का प्रभामण्डल क्रमशः २२ सें.मी. एवं १० सें.मी. बढ गया ।

एक साधक द्वारा नियमितरूप से उपयोग किए जानेवाले उपनेत्र की (चश्मे की) कांचपर ७ रंगोंवाले गोल का अंकित हो जाना

जैसे-जैसे जीव की साधना बढती जाती है, वैसे-वैसे उसकी ओर से अधिकाधिक सात्त्विकता प्रसारित होकर उसके संपर्क में आनेवाली वस्तुएं, वास्तू तथा आसपास का वातावरण भी चैतन्यमय बनने लगता है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के अमृत महोत्सव समारोह के समय तुला का यू.टी.एस. (यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर) उपकरण से महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय द्वारा किया वैज्ञानिक परीक्षण !

अत्युच्च स्तर के संत ईश्‍वर के सगुण रूप होते हैं । उनकी देह सात्त्विकता का स्रोत होती है । इसलिए संतों के संपर्क में आने पर चराचर इस सात्त्विकता से भारित हो जाता है और उसमें विविध सकारात्मक परिवर्तन होते हैं ।

विविध संगीत का वैज्ञानिक परीक्षण !

शास्त्रज्ञों के मतानुसार कष्टदायक संगीत, सर्वाधिक शिथिलता उत्पन्न करनेवाला पश्‍चिमी संगीत, सुप्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय गायक का गायन और संतों द्वारा गाये हुए भजनों का व्यक्ति पर होनेवाले अध्यात्मस्तरीय परिणाम का अध्ययन करने के लिए ‘यू.टी.एस.’ नामक उपकरण के माध्यम से ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ द्वारा किया गया वैज्ञानिक परीक्षण !

Donating to Sanatan Sanstha’s extensive work for nation building & protection of Dharma will be considered as

“Satpatre daanam”