कर्करोग जैसी दुःसाध्य बीमारी में भी गुरुदेवजी के प्रति दृढ श्रद्धा के कारण आनंदित रहकर बीमारी का सामना करनेवाले पू. डॉ. नंदकिशोर वेदजी !

‘१०.११.२०१९ को अधिक मात्रा में सेवा व शारीरिक परिश्रम होने के कारण मेरी कमर में पीडा होने लगी । मैंने इस संदर्भ में डॉक्टर से संपर्क किया; परंतु उनके ध्यान में कुछ नहीं आ रहा था अथवा वे मेरी इस बीमारी का अनुमान लगाने में रुचि नहीं ले रहे थे । वे प्रत्येक बार औषधियां दे रहे थे । अधिक मात्रा में पीडाहारी औषधियां लेने से मुझे पेट का भी बहुत कष्ट होने लगा ।

साधकसंख्या अल्प होते हुए भी भावपूर्वक एवं लगन से गुरुकार्य करनेवाले अयोध्या के पू. डॉ. नंदकिशोर वेद !

डॉ. नंदकिशोर वेद से हमारा लगभग १७ वर्षाें से निकट का संबंध था । हम सभी प्रेम से उन्हें ‘नंदकिशोर काका’ कहते थे । मैं उत्तर भारत में सेवा हेतु आया, तब से अयोध्या केंद्र का दायित्व उन्हीं के पास था ।

कठिन प्रसंग में भी कृतज्ञभाव में रहनेवाले और परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के प्रति अपार भाव रखनेवाले कल्याण (ठाणे) के स्व. माधव साठे (आयु ७५ वर्ष) संतपद पर विराजमान !

कल्याण यहां के श्री. माधव साठे वर्ष १९९८ से सनातन के मार्गदर्शन में साधना कर रहे थे । परात्पर गुरु डॉक्टरजी पर उनकी अपार श्रद्धा थी । साधना की तीव्र लगन के कारण उन्होंने मन लगाकर व्यष्टि और समष्टि साधना की । वर्ष २०१२ में उनका आध्यात्मिक स्तर ६० प्रतिशत घोषित किया गया था ।

साधना की तीव्र लगन और ईश्वर पर दृढ श्रद्धा रख असाध्य रोग में भी भावपूर्ण साधना कर ‘सनातन के १०७ वें (समष्टि) संतपद’ पर आरूढ हुए अयोध्या के पू. डॉ. नंदकिशोर वेदजी (आयु ६८ वर्ष) !

सनातन आश्रम में निवास करनेवाले डॉ. नंदकिशोर वेदजी (आयु ६८ वर्ष) का दीर्घकालीन रोग के कारण ११ मई २०२१ की संध्या को निधन हुआ । वे मूलत: अयोध्या (उत्तर प्रदेश) निवासी थे । २२ मई २०२१ को डॉ. नंदकिशोर वेद को देहत्याग किए १२ दिन पूर्ण हुए । इस दिन साधना की तीव्र लगन और ईश्वर पर दृढ श्रद्धा रख, असाध्य रोग में भी भावपूर्ण साधना कर वे सनातन के १०७ वें (समष्टि) संतपद पर आसीन हुए ।

अखिल मानवजाति पर निरपेक्ष प्रेम (प्रीति) करनेवाले परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

‘एसएसआरएफ’ के जालस्‍थल पर मृत व्‍यक्‍ति का अंतिमसंस्‍कार करने के संदर्भ में उस पर अग्‍निसंस्‍कार करने के लाभ और दफन करने से होनेवाली हानि के संबंध में जानकारी देनेवाला लेख प्रकाशित किया गया है ।

श्री विद्याचौडेश्‍वरी देवी द्वारा परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी के सहस्रार पर लगाई गई विभूति में बहुत चैतन्‍य होना

‘२६.२.२०२० को गोवा के रामनाथी आश्रम में श्री विद्याचौडेश्‍वरी देवी का शुभागमन हुआ । उस समय प.पू. श्री श्री श्री बालमंजूनाथ महास्‍वामीजी और उनके भक्‍तों ने श्री विद्याचौडेश्‍वरी देवी की मूर्ति के प्रभामंडल से परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी के सहस्रार पर (तालू के भाग पर) स्‍पर्श कराया ।

मातृवत वात्सल्य से साधकों का ध्यान रखनेवाले तथा प्रत्येक क्षण साधकों का ही विचार करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

‘भक्त भगवान की सेवा नहीं, अपितु भगवान ही भक्तों की सेवा कैसे करते हैं’, परात्पर गुरु डॉक्टरजी के सान्निध्य में रहते हुए पग-पग पर यह बात दिखाई देती है ।

परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी की देह तथा उनके उपयोग में अंतर्भूत वस्‍तुओं पर गुलाबी आभा आना

‘परात्‍पर गुरु डॉक्‍टरजी की त्‍वचा, नख एवं केश जिस प्रकार पीले हो रहे हैं, उसके साथ ही उनकी आंखों का अंदरूनी भाग, हाथ-पैर के अंदरूनी भाग, तथा जीभ और होंठ भी गुलाबी हो रहे हैं । यह परात्‍पर गुरु डॉक्‍टरजी में व्‍याप्‍त ईश्‍वर की सर्वव्‍यापक प्रीति के रंग का आविष्‍कार है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की प्रेरणा से स्थापित हुई आध्यात्मिक संस्था निर्माण किए जानेवाले ‘साधक-वृद्धश्रम’ का महत्त्व समझ लें !

वृद्धावस्था की पूर्वतैयारी के रूप में अब से ही अपने मनोलय की आदत डालें और परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की प्रेरणा से स्थापित हुई आध्यात्मिक संस्था द्वारा निर्माण किए जा रहे ‘साधक-वृद्धाश्रम’ का महत्त्व समझ लें !

श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी का परिचय

‘हम कितना भी चिंतन करें, तब भी सद़्गुरु (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी (सद़्गुरु बिंदाजी) के सूक्ष्म आध्यात्मिक कार्य की व्याप्ति नहीं निकाल पाएंगे ! उनका सूक्ष्म कार्य अपार है; क्योंकि वह मानव बुद्धि से परे है ।