१२ ज्योतिर्लिंगों में प्रथम मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दिव्य अंश सनातन संस्था को अर्पित !

४ मई २०२६ के पवित्र दिन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के ४ दिव्य अंशों का रामनाथी (गोवा) स्थित सनातन संस्था के आश्रम में आगमन हुआ । श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळजी द्वारा लाए गए ४ शिवलिंगों का साधकों ने भोलेनाथ के जयघोष एवं वेदमंत्रोच्चार के साथ भावपूर्ण स्वागत किया ।

ग्रंथवाचन एवं ग्रंथों के लिए चिन्हित कतरनों से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का ध्यान में आया ईश्वरत्व !

अनेक लोगों को उनके द्वारा पढे गए लेखन से महत्त्वपूर्ण सूत्रों को अलग निकालकर रखने की तथा कतरनों को संदर्भ के रूप में संजोकर रखने की आदत होती है । उससे उनके गुण भी प्रकट होते हैं; परंतु इससे केवल ईश्वर ही अन्यों को अनुभूति दे सकते हैं । इस सेवा के माध्यम से अन्यों में गुणवृद्धि करनेवाले तथा उन्हें चैतन्य प्रदान करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमात्र हैं ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा स्नान के लिए उपयोग में लाए ‘मग’में काफी मात्रा में चैतन्य निर्माण होना

उच्च कोटि के संतों द्वारा दैनंदिन उपयोग में लाई निर्जीव वस्तुएं भी उन संतों में विद्यमान सत्त्वगुण से प्रभारित होकर पावन हो जाती हैं । संतों द्वारा उपयोग में लाई वस्तुओं का अध्ययन करने पर अध्यात्म की अनेक नई बातें सामने आईं हैं और प्राप्त हुए इस ज्ञान का, मानव के कल्याण के लिए उपयोग होगा ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की देह, उनके द्वारा उपयुक्त वस्तु एवं साधक के पूजाघर में रखे उनके छायाचित्र पर गुलाबी छटा आना

प.पू. डॉक्टरजी की आंखों के अंदर का भाग, त्वचा, नख, केश, जैसे पीले -सुनहरे हो रहे हैं, उसीप्रकार उनकी हथेलियां और पैरों के तलवे का भाग, जीभ एवं होंठ भी गुलाबी हो रहे हैं । यह प.पू. डॉक्टरजी में विद्यमान ईश्वर के सर्वव्यापी प्रीति के रंग का परिणाम है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का विविध क्षेत्रों में शोधकार्य

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में हिन्दू आचार, आहार, वेशभूषा, केशभूषा, धार्मिक विधियां, यज्ञ, नामजप, मुद्रा, न्यास, श्रीयंत्र आदि का व्यक्ति, वस्तु एवं वातावरण पर होनेवाले परिणामों के विषय में विविध वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा शोधकार्य शुरू है ।

अनुपम प्रीति से सभी को एकसमान ईश्वरप्राप्ति के धागे में पिरोनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

साधकों को साधना से जोडकर रखनेवाली, कठिन काल में मनोबल देनेवाली वह शक्ति है परात्पर गुरु डॉक्टरजी की साधकों के प्रति अपार प्रीति ! समष्टि के प्रति उच्च प्रीति, यह परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की एक अभूतपूर्व विशेषता है ।

सजीव प्रतीत होनेवाले एवं चैतन्य की अनुभूति देनेवाले नागोठणे (जिला रायगढ) के सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का जन्मस्थान !

रायगढ जिले के पनवेल से वाहन द्वारा २ घंटों के (लगभग १०० कि.मी.) के अंतर पर शिवकालीन ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त ‘नागोठणे’ नामक गांव है । सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का जन्म आज से ८१ वर्षाें पूर्व वैशाख कृष्ण सप्तमी को यहां के वर्तक वाडा में हुआ ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कक्ष में उत्तर की दीवार पर पडे दाग-धब्बों में बुद्धिअगम्य परिवर्तन और उसका आधारभूत शास्त्र !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कक्ष की दीवार पर, इसके साथ ही फर्श पर पडे दाग-धब्बों के ११ से १३.३.२०२१ तक छायाचित्र खींचे गए । उसीप्रकार इनके वर्ष २०१३ एवं वर्ष २०१८ में भी छायाचित्र खींचे गए थे । इन छायाचित्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के अपने एक  हाथ की उंगलियां पानी में डुबोने पर उसमें विविध रंगों की निर्मिति होना एवं उसके आध्यात्मिक विश्लेषण !

हाथ की कनिष्ठा से अंगूठे तक की सभी उंगलियों में पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश, यह पंचतत्त्व होते हैं । पानी में उंगली डुबोनेवाले व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर अनुसार विविध रंग दिखाई देते हैं ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चरणों के एवं हाथों की उंगलियों के नखों में हुआ परिवर्तन एवं उसके पीछे का अध्यात्मशास्त्र !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चरणों के एवं हाथों की उंगलियों के नखों पर खडी रेखाएं एवं नख के मूल से ऊपर जानेवाली गुलाबी रंग की अर्धवर्तुलाकार २ – ३ वलयों का स्पर्श खुरदरा लगना एवं इन रेखाओं का उठावदारपना बढने के पीछे अध्यात्मशास्त्र !