वैज्ञानिक तथा यज्ञ के विषय में अध्ययन करनेवाले अभ्यासी, साथ ही इस विषय की शिक्षा लेनेवाले छात्रों को वैज्ञानिक दृष्टि से अनुसंधान के लिए विनम्र अनुरोध !

प.पू. रामभाऊस्वामीजी यज्ञकुंडपर अग्नि के प्रज्वलित होने के समय उसमें स्वयं को समर्पित करते हैं । इस संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टि से शोध करनेवाले यदि हमारी सहायता करते हैं, तो हम उनके प्रति कृतज्ञ रहेंगे ।

प.पू. रामभाऊस्वामीजी द्वारा गोवा के सनातन आश्रम में किए गए उच्छिष्ट गणपति यज्ञ का वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन के उद्देश्य से यु.टी.एस्. (Universal Thermo Scanner) नामक उपकरण की सहायता के अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से किया गया वैज्ञानिक परीक्षण !

यज्ञसंस्कृति की रक्षा हेतु प्रयासशील तंजावूर, तमिलनाडू के महान योगी प.पू. रामभाऊस्वामीजी अपने विशेषतापूर्ण यज्ञों द्वारा समाज को भौतिक तथा आध्यात्मिक स्तर का लाभ पहुंचाने का दैवीय कार्य कर रहे हैं । उन्होंने १५.१.२०१६ को गोवा के सनातन आश्रम में उच्छिष्ट गणपति यज्ञ का आरंभ किया । इस यज्ञ का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन ।

अत्यंत उच्च तापमानवाले यज्ञकुंड में समर्पित होकर स्वयं के शरीर के तापमान को सर्वसामान्य रखनेवाले तंजावूर (तमिलनाडू) के महान योगी प.पू. रामभाऊस्वामीजी !

परीक्षण के समय यज्ञकुंड का तापमान १४६.५ अंश सेल्सियस था । उस समय यज्ञकुंड में समर्पित प.पू. रामभाऊस्वामीजी के शरीरपर ओढी हुई शॉल का तापमान ३९.५ अंश सेल्यियस था |

यूनिवर्सल थर्मो स्कॅनर (UTS)

यू.टी.एस उपकरण का परिचय :इस उपकरण को ऑरा स्कैनर भी कहते हैं । इससे घटकों (वस्तु,भवन,प्राणी और मनुष्य)की ऊर्जा और उनका प्रभामंडल मापा जा सकता है ।

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने से साधकों पर हुए परिणामों का वैज्ञानिक परीक्षण

सामान्य व्यक्ति अथवा वस्तु का प्रभामण्डल लगभग १ मीटर होता है । प्रक्रिया आरम्भ करने से पहले साधक और साधिका का प्रभामण्डल क्रमशः १.५२ मीटर एवं १.५० मीटर था । प्रक्रिया १ मास करने पर उनका प्रभामण्डल क्रमशः १.७४ मीटर तथा १.६० मीटर हो गया, अर्थात दोनों का प्रभामण्डल क्रमशः २२ सें.मी. एवं १० सें.मी. बढ गया ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन करने संबंधी अनुभूति

साधकों को गुरुकृपायोगानुसार साधना सिखाना, यह परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के अवतारी कार्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग !

विष्णुस्वरूप परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की देह पर दिखनेवाले शुभचिन्ह !

इन शब्दों में संत सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया हैं । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के उच्च आध्यात्मिक स्तर के कारण उनकी देह अत्यंत सात्त्विक हो गई है और उससे भारी मात्रा में चैतन्य प्रक्षेपित होता है ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की प्रेरणा से विदेश में चल रहा अध्यात्मप्रसार का कार्य

पूरे संसार में भौतिक शिक्षा देनेवाले अनेक विद्यापीठ हैं, परंतु परिपूर्ण अध्यात्मशास्त्र और ईश्‍वरप्राप्ति की शिक्षा देनेवाला एक भी विद्यापीठ नहीं है । इसलिए २२.३.२०१४ को परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने गोवा में ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ स्थापित किया है ।

सभी दृष्टि से आदर्श और परिपूर्ण परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी !

परात्पर गुरुपद पर विराजमान होते हुए भी परात्पर गुरु डॉक्टरजी का स्वयं के अहं-निर्मूलन की ओर ध्यान, देवता तथा ईश्‍वर की भांति निरंतर कार्यरत रहने की तथा उनके गुणों को आत्मसात करने की लगन, इन गुणों के कारण वे एक आदर्श ज्ञानोत्तर कर्मयोगी हैं ।

श्रीविष्णु के अष्टावतारों में से प्रत्येक अवतार द्वारा किए कार्य की भांति परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा किए जा रहे अवतारी कार्य का साधिका द्वारा किया यथार्थ वर्णन !

कलियुग के अंतकालतक अधिकांश जीवों की देह रोगादि के कारण जर्जर हो जाएगी; उस समय गुरुदेवजी का उदाहरण उनके सामने रखने के लिए श्रीविष्णु ने प्रौढावस्था की लीला की है ।

Donating to Sanatan Sanstha’s extensive work for nation building & protection of Dharma will be considered as

“Satpatre daanam”