
१. नम्रता : पू. सिंगबाळजी में अत्यधिक नम्रता है । वे सभी को आदरसूचक शब्दों से ही संबोधित करते हैं । उनके स्वर की लय सदैव एक जैसी ही रहती है ।
२. शांत स्वभाव : पूज्य सिंगबाळजी सदैव शांत ही रहते हैं । परिस्थिति कैसी भी हो, वे कभी तनाव में नहीं दिखते । उनके समक्ष जाने से साधकों का मन कितना भी अशांत हो, एकदम शांत हो जाता है । कोई भी निर्णय पूछने पर वे पूर्ण विचार करके ही उत्तर देते हैं ।
३. सीखने की वृत्ति : पू. सिंगबाळजी में सीखने की वृत्ति भी अत्यधिक है । वे बार-बार कहते हैं कि वाराणसी आश्रम के साधकों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया । कोई कुछ नया बताए, तो पूरी एकाग्रता से सुनते हैं और उसके विषय में पूछते हैं । दो माह पूर्व उन्होंने आश्रम के विविध स्थानों के छायाचित्र खींचे और हम सभी को दिखाकर अभ्यास करने के लिए कहा ।
४. कार्यपद्धति का पालन करना : प्रत्येक सेवा गुरुदेवजी द्वारा बताए अनुसार कार्यपद्धति का पालन करने पर उनका ध्यान रहता है । वे सदैव आश्रम की सर्व कार्यपद्धतियों का पालन करते हैं । इससे सभी साधकों को बहुत प्रेरणा मिलती है ।
५. अन्यों को समझकर लेना : पू. सिंगबाळजी सदैव ही सामनेवाले को समझकर लेते हैं । इस कारण सभी उन्हें मनमुक्तता से अपने मन की सभी बातें निःसंकोच बताते हैं । सभी को उनसे बहुत निकटता लगती है ।
६. सकारात्मकता : पू. सिंगबाळजी सदैव सकारात्मक रहते हैं । विपरीत परिस्थिति आने पर भी सकारात्मक रहकर उससे क्या सीख सकते हैं, वे हमें बताते हैं ।
७. परिस्थिति स्वीकारना : पू. सिंगबाळजी मूलतः गोवा से हैं और वाराणसी का मौसम गोवा से पूर्णतः भिन्न है । यहां गर्मी तथा ठंड दोनों ही अत्यधिक होती है । तब भी उन्हें कभी इसके बारे में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए नहीं देखा है । परिस्थिति इत्यादि को दोष देना उनके शब्दकोश में नहीं है ।
८. सेवाभाव : आरंभ में वाराणसी आश्रम में साधक संख्या बहुत अल्प थी । उस समय पू. सिंगबाळजी सभी प्रकार की सेवाएं, चाहे लेखा की हों या स्वच्छता की, मन लगाकर करते थे ।
९. नेतृत्वगुण : पू. सिंगबाळजी प्रत्येक सेवा परिपूर्णता से ही करते हैं । सेवा भावपूर्ण कैसे करें, इसके लिए भी आवश्यक दृष्टिकोण वे बताते हैं । साधकों की सेवाएं पूर्ण बारीकियों के साथ हो रही हैं अथवा नहीं, इस पर भी उनका ध्यान रहता है ।
१०. निरपेक्षता : पू. सिंगबाळजी कोई भी सेवा निरपेक्षता से बताते हैं । एक बार उन्होंने कहा था कि हमें बस करते ही रहना है, सेवा हो अथवा नहीं । साधक के प्रति उनके मन में कभी भी अपेक्षा नहीं रहती । इस कारण वे सदैव साधकों को निरपेक्षता से सेवा की गंभीरता ध्यान में लाकर देते हैं । निरपेक्षता के कारण वे इतनी सहजता से चूकें बताते हैं कि साधक अंतर्मुख हो जाते हैं ।
११. तत्त्वनिष्ठता : साधक तथा गुरुकार्य की हानि न हो, इसलिए वे सदैव साधकों की प्रत्येक चूक का भान करवाकर देते ही हैं ।
प्रार्थना : हे परम पूज्य गुरुदेवजी, आपकी कृपा से वाराणसी आश्रम में हमें संतों के मार्गदर्शन में साधना करने का अवसर प्राप्त हुआ है । इस अवसर का हम सभी साधक आपको अपेक्षित ऐसा लाभ उठा पाएं, ऐसी आपके चरणों में शरणागत भाव से प्रार्थना है !
– वाराणसी सेवाकेंद्र एवं केंद्र के सभी साधक (दिसंबर २०१७)
स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात
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