कांचीपुरम (तमिलनाडू) के श्री अत्तिवरद पेरुमल स्वामी !

सप्त मोक्षपुरियों में से एक मोक्षपुरी कांचीपुरम ! तमिलनाडू का कांचीपुर मंदिरों का मायका है; क्योंकि यहां शिवशक्ति और विष्णु सहित अन्य देवताओं के १००८ मंदिर हैं । शिवकांची और विष्णुकांची, ये जुडवां मोक्षपुरियां हैं ।

गुजरात का ‘द्वारकाधीश’ मंदिर और द्वारकापीठ

श्रीकृष्ण ने अवतार-समाप्ति के पहले द्वारका समुद्र में डुबो दी । दुर्वास ॠषि के शाप के कारण यदुकुल का नाश हुआ । समुद्र में विलीन द्वारका के समीप के भूभाग को तदनंतर द्वारका का स्थान प्राप्त हुआ ।

योगतज्ञ दादाजी वैशंपायनजी द्वारा स्थापित शेवगाव का जागृत दत्त मंदिर !

योगतज्ञ दादाजी ने स्वयं जयपुर से गर्भगृह की प्रसन्न, सजीव, मासूम, वात्सल्यमयी एवं तेजस्वी दत्त मूर्ति बनवाकर लाई है । दादाजी ने स्वयं दत्तमूर्ति में प्राण प्रोक्षण किए हैं, इस कारण मूर्ति प्रत्यक्ष हमसे बात कर रही है, ऐसा प्रतीत होता है ।

भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व का अनुभव किए हुए कुछ स्थानों का छायाचित्रात्मक दिव्यदर्शन !

श्रीकृष्ण के प्रति उत्कट भाव बढाने के लिए उनके दिव्य जीवन से संबंधित गोकुल, वृंदावन एवं द्वारका, इन दैवी क्षेत्रों के छायाचित्र यहां दिए हैं । इन छायाचित्रात्मक कृतज्ञता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व का अनुभव करने का प्रयत्न करते हैं !

जन्मकुंडली, हस्तसामुद्रिक और पादसामुद्रिक में भेद

हाथ और पैर की रेखाओं का संबंध पूर्वजन्म के कर्मों से होता है; इसलिए उन्हें ‘कर्मरेखा’ कहा गया है । कर्म करने से इन रेखाओं में सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं । पश्चात, ये परिवर्तन स्थूलरूप में दिखाई देते हैं ।

हिन्दू किसे कहना चाहिए ?

जो व्यक्ति (उत्तर-पश्चिम में) सिन्धु महानदी से (दक्षिण में) सिन्धु (हिन्द) महासागर तक फैले विशाल भूभाग को अपनी पितृभूमि (पूर्वजों की भूमि) और पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है ।

गुरुकुल शिक्षापद्धति

आजतक आपने अनेक बार भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षापद्धति के विषय में सुना होगा । इस पद्धति की शिक्षा के विषय में हमें इतना ही पता होता है कि इसमें गुरु के घर जाकर अध्ययन करना पडता है ।

गोपीभाव एवं कृष्णभाव

गोपीभाव का अर्थ है श्रीकृष्णमिलन की तडप अथवा श्रीकृष्णमिलन की आर्तता और कृष्णभाव का अर्थ है केवल शुद्ध आनंद । कलियुग में यह दोनों बातें अत्यंत ही दुर्लभ हो गई हैं ।

धर्म और नीति

नीति का मुख्य सिद्धांत है, एकता, मोक्ष अथवा समरसता का अनुभव करना । जिससे देवता के विषय में उचित ज्ञान बढाने में और उसके माध्यम से उनका दर्शन होने में सहायता हो, वह सब नीति है, अन्य सब अनीति है ।’