भारतभर के लाखों श्रद्धालुओं के श्रद्धास्थान कटरा (जम्मू) की श्रीवैष्णोदेवी !

श्रीवैष्णोदेवी का मंदिर समुद्रतल से ५ सहस्र २०० फुट की ऊंचाई पर है । यह मंदिर जम्मू जिले के कटरा से १४ किलोमीटर चढाई करने के पश्चात एक पहाडी पर है । यह अत्यंत जागृत देवस्थान के रूप में प्रसिद्ध है । इस स्थान पर देशभर से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं ।

द्वापरयुग में पांडवों ने एक ही रात में निर्माण किया बनखंडी, जिला कांगडा में श्री बगलामुखी मंदिर !

द्वापरयुग में पांडवों ने अज्ञातवास के समय एक रात में यह मंदिर बनाया और पूजाअर्चा की । इस मंदिर में प्रथम अर्जुन और भीम ने युद्धकला में सफलता मिलने के लिए देवी की उपासना की थी और शत्रुसंहारिणी देवी बगलामुखी मंदिर में विविध प्रकार के कष्टों के निवारण के लिए शत्रुुनाश हवन करवाया था ।

राजा धन्यमाणिक को स्वप्नदृष्टांत देकर माताबरी (त्रिपुरा) में स्थानापन्न हुई श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी !

त्रिपुरा राज्य के उदयपुर शहर के निकट माताबरी गांव में श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी का मंदिर है । यह ५१ शक्तिपीठों में से एक पीठ है । यहां सती के बाएं पैर की उंगलियां गिरी थीं । कलियुग में इस स्थान पर धन्यमाणिक नामक राजा ने मंदिर निर्माण किया और इस मंदिर में त्रिपुरासुंदरीदेवी की स्थापना की ।

बीरभूम (बंगाल) के महास्मशान में विराजमान श्री तारादेवी !

तारापीठ मंदिर के सामने ही महास्मशान है । जिस स्मशान में १ करोड मृतदेहों का अग्निसंस्कार हो चुका होता है, उसे ‘महास्मशान’ कहते हैं ।

कर्नाटक राज्य के शृंगेरी (जिला चिक्कमगळुरू) और कोल्लुरू (जिला उडुपी) के मंदिर

कर्नाटक राज्य के चिक्कमगळुरू जिले में तुंगा नदी के तट पर शृंगेरी नाम का गांव है । यहां के पर्वत पर पहले शृंगऋषि रहते थे; इसलिए इस स्थान का नाम ‘शृंग गिरि’ पडा । आगे शृंगगिरी का रूपांतर ‘शृंगेरी’ हो गया । २ सहस्र ६०० वर्षों पूर्व आद्य शंकराचार्य इस स्थान पर आए थे ।

सती का ब्रह्मरंध्र जिस स्थान पर गिरा, वह पाकिस्तानस्थित शक्तिपीठ श्री हिंगलाजमाता !

हिंगलाजमाता मंदिर ५१ शक्तिपीठों में से एक हैं और पाकिस्तान में है । इस स्थान पर सती का ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था । वह बलुचिस्तान की लारी तालुका की एक घनी घाटी में हैं । हिंगोल नदी के तट पर और मकरान मरुस्थल की खेरथार पहाडियों में बसा श्री हिंगलाजमाता मंदिर करोडों हिन्दुओं का श्रद्धास्थान है ।

महाराष्ट्र में सुप्रसिद्ध कुछ देवियों की जानकारी और उनका इतिहास

नवरात्रि में जिस देवी की पूजा की जाती है, वह देवी मानव के लिए जो उत्कृष्ट गुण होते हैं उनसे सुशोभित होती है । दुर्गा का स्तवन और पूजा करते समय अभिषेक के समय उनकी नामावली कही जाती है । उस नामावली से नारी में कौनसे गुण होने चाहिए, इसका निर्देश मिलता है ।

कैमूर (बिहार) में देवी मुंडेश्वरी के मंदिर में दी जाती है रक्तहीन बलि !

बिहार के मुंडेश्वरी देवी मंदिर में नवरात्रि में मनोव्रत (मनोकामनाएं अथवा मन्नतें) पूर्ण करने के लिए रक्तहीन बलि दी जाती है । अर्थात बलि की प्रक्रिया बकरे को मारे बिना पूरी हो जाती है। यह मंदिर ५ वीं शताब्दी का माना जाता है ।

योगमाया द्वारा श्रीविष्णु से नरकासुर का वध करवानेवाली श्री कामाख्यादेवी

गुवाहाटी शहर से १० किलोमीटर दूर नीलाचल पर्वत पर श्री कामाख्यादेवी का मंदिर है । पृथ्वी पर जहां-जहां सती के अवयव गिरे थे, उस स्थान पर एक-एक शक्तिपीठ निर्माण हो गया ।

चोटीला (गुजरात) में स्थित आदिशक्ति का रूप श्री चंडी-चामुंडा देवी

सप्तर्षियों ने आगे कहा, ‘‘चोटीला गांव की पहाडी पर ‘चंडी-चामुंडा’ नामक देवियों की मूर्ति है । ये देवियां दो दिखाई देती हैं, तब भी वे एक ही (एकरूप) हैं । चंडी एवं चामुंडा, ये आदिशक्ति के ही रूप हैं । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्रीसत्‌शक्‍ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ एवं श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ, ये दोनों चंडी एवं चामुंडा के ही रूप हैं ।