सर्व भाषाओं में सर्वोत्कृष्ट देवभाषा संस्कृत की महिमा

संस्कृत भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है । यह विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक और पूर्ण लिपि है । यह लिपि लिखने और बोलने में किसी भी प्रकार की अडचन नहीं है ।

सनातन के सभी आश्रमों एवं प्रसारसेवा में सक्रिय साधकों को भावविश्‍व में ले जानेवाले रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में होनेवाले भावसत्संग !

भाव उत्पन्न करने के लिए किए जानेवाले ऐसे प्रयोगों से साधक अंतर्मुख बनता है । साथ ही, थोडे समय के लिए ही क्यों न हो; वह भावस्थिति का अनुभव करता है । साधक के अंतर्मन में उभरनेवाली प्रतिक्रियाएं, स्वभावदोष एवं अहं के विचार, बाहर आने लगते हैं और उसका मन निर्मल होने लगता है ।

भावुकता, को नियंत्रित करने हेतु सदगुरु (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी का मार्गदर्शन !

किसी प्रसंग में मन भावुक हो जाता है और रोना आता है । तब मन की बहुत ऊर्जा का अपव्यय होता है । इसका परिणाम सेवा पर भी होता है । सेवा की अवधि घट जाती है ।

वेदाध्ययन का अधिकार

वेदाध्ययन में चारों वर्णों के बालकों का अधिकार है, किंतु गुण-कर्म से हीन का नहीं । गुण और कर्म ही उच्च और कनिष्ठ वर्ण के कारण हैं ।

शनि के साढे तीन पीठों में से एक है प्रभु श्री रामचंद्रजी के शुभहस्तों स्थापित राक्षसभुवन का श्री शनिमंदिर !

बीड जिले की गेवराई तालुका के राक्षसभुवन में श्री शनि मंदिर में पौष शुक्ल पक्ष अष्टमी को सायं शनिमहाराजजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है । इसी निमित्त से प्रस्तुत है मंदिर की जानकारी !

महाबळेश्‍वर में श्रीकृष्णामाई का देवालय

महाबळेश्वर यहां श्री महाबळेश्वर, श्री पंचगंगा और श्री कृष्णादेवी के अति प्राचीन भव्य देवालय हैं । कुछ कामनिमित्त से महाबळेश्वर में जाने का योग आया था, तब श्री कृष्णामाई के दर्शन हेतु जानेपर ध्यान में आए सूत्र यहां प्रस्तुत कर रहा हूं ।

कोल्हापुर में अतिप्राचीन श्री एकमुखी दत्त मंदिर !

कोल्हापुर शहर में एकमुखी दत्त मंदिर की दत्त मूर्ति १८ वीं शताब्दी में बनी और नृसिंह सरस्वती महाराज, गाणगापुर; श्रीपाद वल्लभ महाराज और तदुपरांत स्वामी समर्थ ने इस मूर्ति की पूजा की है ।

पांडवों के वास्तव्य से पावन है एरंडोल (जलगांव) का पांडववाडा !

पांडववाडा की वास्तु का क्षेत्रफल ४५१५.९ चौरस मीटर है । कुछ समय पूर्व ही पांडववाडा के प्रवेशद्वार के पत्थर पर प्राचीनकालीन नक्काशी उकेरी गई है ।इसमें कमलफूलों की नक्काशी स्पष्ट दिखाई देती है ।

श्री शिकारीमाता के पुरातन मंदिर की छत का अनसुलझा रहस्य !

पांडवों ने अज्ञातवास में इसका निर्माण किया था । तब उन्होंने जानबूझकर इस मंदिर की छत नहीं बनाई और खुले आकाशतले मूर्ति की स्थापना की थी ।

घी अथवा तेल नहीं, अपितु पानी से जलते हैं मध्यप्रदेश के मंदिर में दीपक !

कालीसिंध नदी का पानी इस दीपक में डालने के पश्चात पानी पर तेलीय पदार्थ की परत तैयार हो जाती है और दीपक जल जाता है ।