भक्ति के सुंदर उदाहरण वाला जनाबाई के जीवन का प्रसंग

जनाबाई जैसे भक्त बनने के लिए उनकी ही तरह हर काम में, हर प्रसंग में ईश्‍वर को अपने साथ अनुभव करना, उनसे हर प्रसंग का आत्मनिवेदन करते रहना, उनको ही अपना सब मानकर अपनी सब बातें बताना आवश्यक है ।

नामस्मरण है श्रेष्ठ स्मरण भक्ति !

अर्थात भगवान का स्मरण करते जाएं । उनके नाम का अखंड जप करें । नामस्मरण कर संतुष्ट हों । सुख हो अथवा दु:ख मन उद्विग्न हो अथवा चिंता में, सर्वकाल और सभी प्रसंगों में नामस्मरण करते जाएं ।

नवविधा भक्ति : दास्य भक्ति

ईश्वर को मन से स्वामी स्वीकार कर स्वयं को उनका दास समझना दास्य भक्ति है । ईश्वर की सेवा कर प्रसन्न होना । भगवान को अपना सर्वस्व मान लेना ‘दास्य भक्ति’ कहलाता है ।

नवविधा भक्ति : सख्य भक्ति

सख्य भक्ति में भक्त ईश्वर को अपना सखा और सर्वस्व मानकर उसकी सेवा करता है । इसमें भक्त का भाव रहता है कि भगवान मेरे सखा हैं ओैर मेरे सुख-दु:ख में सहायक हैं । इस भाव से भक्ति करना, सख्यभक्ति कहलाता है । सख्यभक्ति में भक्त व भगवान के बीच कोई भेद नहीं होता ।

नवविधा भक्ति : वंदनभक्ति

हमारे द्वारा किए जा रहे नमस्कार में जब भाव आता है, तब उसका रूपांतरण वंदन में होता है और इस भाव से नमस्कार करते जानेपर धीरे-धीरे उस नमस्कार का रूपांतरण भक्ति में होता है । उसी का नाम है वंदनभक्ति !

पादसेवन भक्ति

भक्ति की इस पद्धति में भक्त को ईश्वर के सामने नतमस्तक होना, उनके चरणों के पास होना, ईश्वर के सामने मैं कुछ भी नहीं हूं और मेरा कोई अस्तित्व नहीं है, यह भान होता रहता है ।

आनंदपूर्ण क्षणों का स्मरण ही स्मरणभक्ति

जिस प्रकार हम भगवान का स्मरण करते हैं अथवा हमारे जीवन की अच्छी घटनाओं का स्मरण करते हैं, तब हमारे जीवन में एक अलग ही आनंद उत्पन्न होता है । केवल उनका स्मरण करना ही एक शक्ति है, यह हमारे ध्यान में आता है ।

नवविधाभक्ति : स्मरणभक्ति

भगवान के स्मरण में सब कुछ है । अन्य सभी बातें, सत्कर्म, दानधर्म, तीर्थयात्रा, पारायण जैसी बातें अन्य अंगों जैसी हैं । इन सभी को अंग माना जाए, तो भगवान का स्मरण प्राण है ।