संत जनाबाई की श्रेष्ठ ईश्‍वरभक्ति के दर्शानेवाले तथा भावविभोर करनेवाले अभंग !

जनाबाई स्वयं को ‘नामदेवजी की दासी’ कहलवाती थीं । विठ्ठलचरणी संपूर्ण जीवन समर्पित की हुईं जनाबाई ने देहभान भूलकर दिन-रात संत नामदेवजी के घर में सेवा की ।

मनुष्यजन्म का सार्थक करने का उपदेश देनेवाले संत नामदेवजी के अभंग (भक्तिगीत)

श्रीविठ्ठलजी की अनन्यभाव से भक्ति करनेवाले भक्तशिरोमणि संत नामदेव महाराज ! उनके स्मृतिदिवस के उपलक्ष्य में पंढरपुर के उनके निवास में स्थित विठ्ठलजी की भूर्तियों का भावपूर्ण दर्शन करेंगे ।

ओतूर (पुणे) के श्री कपार्दिकेश्‍वर मंदिर के मेले की विशेषता !

ओतूर में श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को मेला लगता है । इस दिन सुबह गांव के सभी घरों से चावल इकट्ठा कर उसे ओतूर की मांडवी नदी में धो लिया जाता है और मंदिर के गर्भगृह में उस चावल से ५ घडों का पिंड बनाया जाता है ।

गणेशभक्तों, भावभक्ति एवं धर्मपालन को जीवन में पहला और प्रमुखता से स्थान देना आवश्यक !

बाढग्रस्त प्रदेशों में जिन हिन्दुओं को आर्थिक समस्या के कारण श्री गणेशमूर्ति की प्रतिष्ठापना करना संभव नहीं है, वे गणेशोत्सव के समय में भावभक्ति के साथ श्रीगणेशजी की उपासना करें ।

साधकों को ज्ञान देने की तडपवाले जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी !

रामनाथी आश्रम में स्वामीजी ने योग, संगीत आदि विषयोंपर मार्गदर्शन किया । उन्हों ने किस विषयपर मार्गदर्शन करना है, यह स्वयं सुनिश्‍चित न कर उसे संबंधित साधकों के पूछ लिया ।

पंचांग एवं ज्योतिषशास्त्र द्वारा दी गई पूर्वसूचना के अनुसार बाढ आना, तो बुद्धिजीवियों के मुंहपर तमाचा !

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में आज इतना विकास हुआ है कि आज हम भारतीय अंतरिक्ष में चंद्रयान भी भेज सकें । ऐसा होते हुए भी कौन से क्षेत्र में अतिवृष्टि होगी, यह विज्ञान अथवा प्रौद्योगिकी निश्चितरूप से बता नहीं सके । मौसम विभाग के अनुमान तो इतने चूक जाते हैं कि सार्वजनिक रूप से मौसम विभाग का उपहास किया जाता है ।

नवविवाहिता को विशिष्ट मास में ससुराल में निवास न करने के संदर्भ में प्रचलित विचार और वास्तविकता !

पहले लडकियों के विवाह की आयु ८ से १२ वर्षतक की होती थी । इतनी छोटी आयु में लडकियों को गृहस्थी का बोझ उठाना कठिन हो जाता था ।

कलियुग में विशेषतापूर्ण तथा साधकों से सभी अंगों से बनानेवाली सनातन संस्था की एकमात्रद्वितीय गुरु-शिष्य परंपरा !

सनातन संस्था में ‘गुरु की ओर तत्त्व के रूप में देखें’ की शिक्षा दी जाती है । अतः साधक उसे मार्गदर्शन करनेवाले संतों की ओर अथवा अन्य सहसाधकों की ओर तत्त्व के रूप में देखता है