अतृप्त पूर्वजों से कष्ट के कारण तथा उसका स्वरूप

अधिकांश लोग साधना नहीं करते । अतएव वे माया में अत्यधिक लिप्त होते हैं । इसलिए मृत्यु के उपरांत ऐसे व्यक्तियों की लिंगदेह अतृप्त रहती है ।

श्री गणेशजी का कार्य, विशेषताएं एवं उनका परिवार

विभिन्न साधनामार्गों के संत विभिन्न देवताओं के उपासक होते हैं, फिर भी सब संतों ने श्री गणेश की शरण जाकर याचना की है, उनका भावपूर्ण स्तवन किया है । सर्व संतों के लिए श्री गणेश अति पूजनीय देवता रहे ।

श्री गणपति की उपासना

पार्वती द्वारा निर्मित गणेशजी महागणपति के अवतार हैं । उन्होंने मिट्टी से आकार बनाया तथा उसमें गणपति का आवाहन किया । जगदुत्पत्ति से पूर्व महत्त्व निर्गुण तथा आत्मस्वरूप में होने के कारण उसे ‘महागणपति’ भी कहते हैं ।

भगवतभक्ति का अनुपमेय उदाहरण अर्थात् संतश्रेष्ठ नामदेव महाराज !

८४ लक्ष योनियों के पश्‍चात् जीव को मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, किंतु उस समय यदि अधिक मात्रा में चुकाएं हुई, तो पुनः फेरा करना पडता है । अतः इस जन्म में ही आत्माराम से (ईश्‍वर से) पहचान करें !

भगवतभक्ति का अनुपमेय उदाहरण अर्थात् संतश्रेष्ठ संत जनाबाई !

संत जनाबाई के पुण्यतिथी के उपलक्ष्य में भक्ति के अनुपमेय उदाहरण की साक्ष देनेवाली वस्तुओं का भावपूर्ण दर्शन करेंगे तथा अपने अंतरात्मा में भगवंत
के प्रति भक्ति वृद्धिगंत करने हेतु शरणागत भाव से प्रार्थना करेंगे !

श्रद्धा एवं भक्ति का उत्कट दर्शन करानेवाली जगन्नाथ रथयात्रा !

विश्‍वविख्यात पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा अर्थात् भगवान श्री जगन्नाथ (विश्‍वउद्धारक भगवान श्रीकृष्ण) के भक्तों के लिए एक महान आैचित्त्य है ! पुरी का मंदिर कलियुग के चार धामों में से एक है । यह विश्‍व की सबसे महान यात्रा है । लक्षावधी विष्णुभक्त यहां इकठ्ठा होते हैं । इस स्थान की विशेषता यह है कि,…

‘हिन्दु’ इस नाम से परिचय देते समय मुझे अभिमान प्रतीत होता है ! – स्वामी विवेकानंद

पाश्चात्त्य सिद्धांतों के अनुसार पाश्चात्त्य मनुष्य स्वयं के संबंध में कहते समय प्रथम अपने शरीर को प्राधान्य देता है तथा तत्पश्चात् आत्मा को । अपने सिद्धांतों के अनुसार मनुष्य प्रथम आत्मा है तथा तत्पश्चात् उसे एक देह भी है । इन दो सिद्धांतों का परीक्षण करने के पश्चात् आप के ध्यान में यह बात आएगी कि, भारतीय तथा पाश्चात्त्य … Read more

खगोलशास्त्र और फलज्योतिषविज्ञान में अद्भुत शोध करनेवाले आचार्य वराहमिहिर के जन्मस्थान के प्रति मध्यप्रदेश सरकार की घोर उपेक्षा !

बताया जाता है कि आचार्य वराहमिहिर का जन्म ५ वीं शताब्दी में हुआ था । जोधपुर के ज्योतिषाचार्य पं. रमेश भोजराज द्विवेदी की गणनानुसार वराहमिहिर का जन्म चैत्र शुक्ल दशमी को हुआ था । वराहमिहिर का घराना परंपरा से सूर्योपासक था ।

हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के संदर्भ में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के अनमोल विचार !

किसी भी कार्य के लिए उचित समय आवश्यक होता है । सन्तों को पता रहता है कि किस कार्य के लिए कौन-सा समय उपयुक्त है । अभी ऐसी कोई स्थूल घटना नहीं हो रही, जिससे अनुमान लगाया जा सके कि ‘भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी ।’ परंतु काल की पदचाप सुननेवाले संत जान गए हैं कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना होगी ! निम्नांकित सूत्रों से सभी को काल का महत्त्व ध्यान में आएगा ।