हिन्दू धर्म में छोटे बच्चों का श्राद्धकर्म न करने के कारण

यहां छोटे बच्चे वे होते हैं, जिनके दांत नहीं आए हों, साथ ही जिन में हड्डियां बनने की प्रक्रिया पूर्ण न हुई हो और उनकी मृत्यु हुई हो, तो उनका श्राद्ध नहीं किया जाता ।

श्राद्धकर्ता के लिए आचरणीय कुछ विधि-निषेध

श्राद्ध के दिन किए जानेवाले आवाहनात्मक मंत्रोच्चारण का प्रभाव श्राद्ध में प्रत्यक्ष सम्मिलित होनेवाले व्यक्तियों पर पडता है । इससे उनके पंचप्राण जागृत होते हैं और देह में तेजतत्त्व बढता है ।

पितरों का ‘वार्षिक श्राद्ध’ और ‘पितृपक्ष में महालय श्राद्ध’ दोनों क्यों करना चाहिए ?

प्रत्येक कार्य विशिष्ट तिथि अथवा मुहूर्त पर करना विशेष लाभदायक है; क्योंकि उस दिन उन कर्मों का कालचक्र, उनका प्रत्यक्ष होना तथा उनका परिणाम, इन सभी के स्पंदन एक-दूसरे के लिए सहायक होते हैं ।

श्राद्ध में पितरों तथा देवताओं को नेवैद्य दिखाना

दर्भ पर पितरों के लिए पिंड रखने पर, इससे निकलनेवाली तेजतत्वयुक्त तरंगों से लिंगदेह के सर्व ओर स्थित कालीशक्ति का विघटन होता है । तब, उस अन्न से लिंगदेह सहजता से सूक्ष्म-वायु ग्रहण कर पाती है ।

श्राद्ध तीर्थक्षेत्र में करने की तुलना में घर पर करना अधिक लाभदायक

५० प्रतिशत पितरों का लगाव अपने घर से रहता है । इसलिए, घर में श्राद्ध करने से तीर्थक्षेत्र में किए गए श्राद्ध की तुलना में आठ गुना लाभ होता है ।

श्राद्ध में की जानेवाली विविध क्रियाओं का अध्यात्मशास्त्र

यह लेेख पढकर आप श्राद्ध में की जानेवाली अनेक छोटी-छोटी क्रियाओं का अध्यात्मशास्त्र समझ सकेंगे । इससे ‘श्राद्धकर्म’ की श्रेष्ठता ज्ञात होगी ।

अतृप्त पूर्वजों से कष्ट के कारण तथा उसका स्वरूप

अधिकांश लोग साधना नहीं करते । अतएव वे माया में अत्यधिक लिप्त होते हैं । इसलिए मृत्यु के उपरांत ऐसे व्यक्तियों की लिंगदेह अतृप्त रहती है ।