श्राद्ध करने में अडचन हो, तो उसे दूर करने का मार्ग

हिन्दू धर्म में इतने मार्ग बताए गए हैं कि ‘श्राद्धविधि अमुक कारण से नहीं कर पाए’, ऐसा कहने का अवसर किसी को नहीं मिलेगा । इससे स्पष्ट होता है कि प्रत्येक के लिए श्राद्ध करना कितना अनिवार्य है ।

1. ‘उचित ब्राह्मण न मिलें, तो जो ब्राह्मण मिलें उन्हें बुलाकर श्राद्ध करें ।

2. माता के श्राद्ध के लिए ब्राह्मण न मिलें, तो सुहागिनों को बुलाकर श्राद्ध करें ।

3. अनेक ब्राह्मण न मिलें, तो एक ब्राह्मण को पितृस्थान पर बिठाएं एवं देवस्थान पर शालग्राम इत्यादि रखकर संकल्प कर श्राद्ध करें तथा उस भोजन को गाय को खिलाएं अथवा उसे नदी, तालाब, सरोवर, कुएं इत्यादि में प्रवाहित करें ।

4. राजकार्य, कारावास, रोग अथवा अन्य किसी कारणवश स्वयं श्राद्ध करने में असमर्थ हों, तो पुत्र, शिष्य अथवा ब्राह्मण द्वारा श्राद्ध करवाएं । 

5. संकल्पविधि करें अर्थात पिंडदान छोडकर शेष सर्व विधियां करें । 

6. ब्रह्मार्पणविधि करें अर्थात ब्राह्मण को बुलाकर, उनके हाथ-पैर धो लेने पर, उन्हें आसन पर बिठाकर, पंचोपचार पूजा कर भोजन खिलाएं ।

7. होमश्राद्ध करें अर्थात द्रव्य एवं ब्राह्मण के अभाव में अन्न पकाकर ‘उदीरतामवर0’ सूक्त की प्रत्येक ऋचा का उच्चारण करते हुए होम करें । (यह उत्तर क्रिया के समय किया जाता है ।)

8. उपर्युक्त कुछ भी करने में असमर्थ व्यक्ति आगे दिए अनुसार श्राद्ध करें ।

अ. उदकपूर्ण कुंभ दें ।

आ. थोडा सा अन्न दें । 

इ. तिल दें । 

ई. थोडी-सी दक्षिणा दें । 

उ. यथाशक्ति अनाज दें । 

ऊ. गाय को चारा खिलाएं । 

ए. विधि इत्यादि कुछ न करते हुए केवल पिंडदान करें ।   

ऐ. स्नान कर तिलयुक्त पानी से पितृतर्पण करें ।  

. श्राद्ध की तिथि पर उपवास करें । 

औ. श्राद्ध के दिन श्राद्धविधि का पाठ करें । 

9. उक्त कुछ भी करने में असमर्थ हों तो निम्नानुसार श्राद्ध करें ।  

अ. वन में जाकर दोनों हाथ ऊपर कर अपनी कांखें दिखाते हुए, सूर्यादि लोकपालों को तिनका दिखाकर कहें – ‘मेरे पास श्राद्धोपयोगी धनसंपत्ति इत्यादि कुछ भी नहीं है । मैं सर्व पितरों को नमस्कार करता हूं । मेरी भक्ति से मेरे सर्व पितर तृप्त हों । मैं हतबल हूं ।’

आ. निर्जन अरण्य में जाकर हाथ ऊपर कर ऊंचे स्वर में कहें, ‘मैं निर्धन और अन्नरहित हूं । मुझे पितृऋण से मुक्त करें ।’

इ. दक्षिण की ओर मुख कर रोएं ।  इन सर्व प्रकारों से प्रतिवर्ष आनेवाले श्राद्ध के दिन पितरों को उद्देशित कर किसी भी प्रकार से श्राद्ध करना चाहिए । इसका प्रमुख उद्देश्य यही स्पष्ट होता है कि श्राद्ध करने से न चूकें ।’ 

10. श्राद्धकर्म के लिए ब्राह्मण उपलब्ध न हों, तो क्या श्राद्ध वैकल्पिक पद्धति से करने से लाभ होता है ? 

श्राद्धकर्म करने के लिए ब्राह्मण उपलब्ध न हों, तो हिन्दू धर्मशास्त्र में उसका विकल्प भी बताया गया है । उस वैकल्पिक पद्धति से भावपूर्ण श्राद्ध करने से लाभ अवश्य होता है । किंतु कुछ लोगों की यह नकारात्मक धारणा रहती है कि श्राद्धविधि के लिए ‘ब्राह्मण मिलता ही नहीं ।’ यदि ब्राह्मण मिले, तो भी कुछ लोग घर में शास्त्रानुसार नहीं, अपितु परंपरा से चली आ रही किसी पद्धति से श्राद्ध करते हैं । इससे मिलनेवाला लाभ शास्त्रानुसार श्राद्धकर्म करने की तुलना में अल्प होता है अथवा नहीं भी होता । 

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘श्राद्ध (भाग – 2) श्राद्धविधि का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’

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