श्राद्धकर्म में वर्जित वस्तुएं एवं उसका अध्यात्मशास्त्रीय कारण

श्राद्ध के भोजन में कौन-से पदार्थ वर्जित हैं, उसका कारण; साथ ही श्राद्ध में लाल रंग के फूलों का उपयोग क्यों नहीं करते, इसकी जानकारी हम इस लेख में करेंगे ।

 

१. वायविडंग, काली मिर्च, बिजौरा नींबू, चिचिंडा एवं रामदाना

१ अ. काली मिर्च, चिचिंडा जैसे तमोगुणवर्धक
पदार्थों का श्राद्ध के भोजन में समावेश न करना

‘वायविडंग, काली मिर्च,बिजौरा नींबू, चिचिंडा एवं रामदाना, ये पदार्थ शरीर में तमोगुण बढाते हैं । इसलिए, इनसे उत्पन्न तमोगुणी सूक्ष्म-वायु के प्रभाव से इच्छाशक्ति की तरंगें अधिक मात्रा में घनीभूत होती हैं । अतः, ऐसा अन्न ग्रहण करने से पितरों का शरीर भारी हो जाता है, जिससे उन्हें अपने लोक लौटने में बाधा आ सकती है । इसीलिए कहा गया है कि श्राद्ध के भोजन में उपर्युक्त पदार्थों का समावेश करने से पितरों को नीचे की योनियों में स्थान मिलता है; क्योंकि भारी तरंगों का गुणधर्म सदैव अधोदिशा में जाना होता है ।’ 

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ५.८.२००६, दोपहर ३.३२़

 

२. लोहे एवं इस्पात (स्टील) धातु के बरतन

२ अ. लोहे एवं इस्पात से बने बरतनों में कष्टदायक
नाद उत्पन्न करने की क्षमता होने के कारण श्राद्ध में इनका उपयोग वर्जित 

‘लोहा एवं इस्पात धातुओं से प्रक्षेपित होनेवाली तरंगों से वायुमंडल में कष्टदायक नाद उत्पन्न होता है । इन धातुओं के बरतनों में खाद्य पदार्थ रखने से उनमें भी ये कष्टदायक तरंगें प्रवेश कर जाती हैं । जब पितर ऐसा अन्न ग्रहण करते हैं, तब इनकी ओर वातावरण की अनिष्ट शक्तियों के आकर्षित होने की आशंका अधिक रहती है । इसलिए, श्राद्ध में लोहा, इस्पात जैसी धातुओं के बरतनों का उपयोग नहीं किया जाता । उसी प्रकार, इन नाद-तरंगों के कारण श्राद्धस्थल पर आकर्षित वायुमंडल में पितरों के स्पंदनों की गति एकसमान नहीं रहती । इससे, उनके कार्य में रुकावट आने की संभावना रहती है ।’ 

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से ५.८.२००६, दोपहर ४.०५़

(इसीलिए, देवालय का घंटा तथा पूजा के उपकरण लोहे एवं इस्पात के नहीं होते । – संकलनकर्ता)

 

३. लाल रंग के फूल

३ अ. लाल रंग के फूलों से मारक प्रकार की तरंगें
प्रक्षेपित होने के कारण, श्राद्ध में उनका उपयोग न किया जाना

 ‘लाल रंग मारक तत्त्व से संबंधित है । इसलिए, लाल रंग से प्रक्षेपित होनेवाली वेगवान मारक तरंगों के प्रवाह में आने पर, पितरों से संबंधित इच्छातरंगों का, जो पृथ्वी एवं आप तत्त्वों से बनी होती हैं, विघटन होने की आशंका रहती है । इसलिए, पितर श्राद्धस्थल पर आकर अन्न ग्रहण नहीं करते । इसी कारण, श्राद्ध में लाल रंग के फूलों का उपयोग नहीं करना चाहिए ।’ 

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, ५.८.२००६, दोपहर ४.३९़

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘श्राद्ध (भाग १) महत्त्व एवं अध्यात्मशास्त्रीय विवेचन’

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