तिथी
आश्विन कृष्ण नवमीको अविधवा नवमी कहते हैं ।
महत्त्व
अपनी मां या परिवारकी अन्य अहिवातिन (सधवा) स्त्रीकी मृत्यु हुई हो, तो इस दिन उसका श्राद्ध करते हैं । इस दिन ब्राह्मण एवं सुहागिनोंको भोजन करवानेकी रूढि है ।
पति के निधन से पूर्व मृत स्त्रियों के श्राद्ध
पितृपक्ष की नवमी को (अविधवा नवमी को) ही क्यों करें ?
‘नवमी के दिन ब्रह्मांड में रजोगुणी पृथ्वी एवं आप तत्त्वोंसे संबंधित शिवतरंगों की अधिकता होती है । इसके कारण इन तरंगोंकी सहायतासे श्राद्धविधि से प्रक्षेपित मंत्रोच्चारणयुक्त तरंगें शिवरूप में ग्रहण करने का सूक्ष्म बल उस विशिष्ट संबंधित सुहागन की लिंगदेह को प्राप्त होती है । इस दिन कार्यरत शिवतरंगों का पृथ्वी एवं आप तत्त्वात्मक प्रवाह संबंधित लिंगदेह के लिए आवश्यक तरंगों का अवशोषण करने में पोषक और पूरक होता है । इस दिन सुहागन में निहित शक्तितत्त्व का सूक्ष्म शिवशक्ति से संयोग होनेमें सहायता होती है तथा सुहागनकी लिंगदेह त्वरित उर्ध्व गति धारण करती है ।
इस दिन शिवतरंगोंकी अधिकताके फलस्वरूप सुहागनको सूक्ष्मरूपी शिवतत्त्व का बल प्राप्त होता है । उसके स्थूल शिवरूपी पुरुषप्रकृतिसे जुडे पृथ्वीतत्त्व के संस्कारोंसे संबंधित घनिष्ट आसक्ति युक्त तंतुओंका विघटन होता है । इससे उसे प्रतिबंधन से मुक्त होनेमें सहायता मिलती है । इसलिए रजोगुणी शक्तिरूप की प्रतीक सुहागन का श्राद्ध महालय में शिवतरंगोंकी अधिकता दर्शानेवाली नवमी के दिन करते हैं ।’
श्राद्ध में भोजन परोसने की पद्धति
‘कोरोना’ महामारी की पृष्ठभूमि पर शास्त्र के विधान के अनुसार निम्नांकित पद्धति से श्राद्धविधि करें...
अन्य पंथ तो पूर्वजों के लिए कुछ नहीं करते, फिर उन्हें कष्ट नहीं होता है...
शास्त्रों के अनुसार श्राद्धकर्म न करने से होनेवाली हानि
हिन्दू धर्म में छोटे बच्चों का श्राद्धकर्म न करने के कारण
पितरों का ‘वार्षिक श्राद्ध’ और ‘पितृपक्ष में महालय श्राद्ध’ दोनों क्यों करना चाहिए ?