श्राद्ध : प्रश्नोत्तर

श्राद्ध के कारण पूर्वजदोष के
(पितृदोषके) कष्ट से रक्षा कैसे होती है ?

‘श्राद्धद्वारा उत्पन्न ऊर्जा मृत की लिंगदेह में समाई हुई त्रिगुणात्मक ऊर्जा से साम्य दर्शाती है; इसलिए अल्पावधि में श्राद्ध से उत्पन्न ऊर्जा के बल पर लिंगदेह मत्र्यलोक पार करती है । (मत्र्यलोक भूलोक एवं भुवर्लोक के मध्य स्थित है ।) एक बार जो लिंगदेह मत्र्यलोक पार कर लेती है, वह पुनः लौटकर पृथ्वी पर रहनेवाले सामान्य व्यक्ति को कष्ट देने के लिए पृथ्वी की वातावरण-कक्षा में नहीं आ सकती । इसीलिए श्राद्ध का अत्यधिक महत्त्व है; अन्यथा विषय-वासनाओं में फंसी लिंगदेह, व्याqक्त की साधना में बाधाएं उत्पन्न कर उसे साधना से परावृत्त (विमुख) कर सकती हैं ।’ – एक विद्वान (पू.) श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यमसे, १.३.२००५, सायं. ६.४३़

 

 क्या श्राद्ध नियमित करना आवश्यक है ?

मृत व्यक्ति की तिथि पर श्राद्ध करने पर वह अन्न उसकी सूक्ष्म-देह के लिए वर्षभर के लिए पर्याप्त होता है । जब तक इच्छा-आकांक्षाएं रहती हैं, तब तक वह मृत व्यक्ति उस तिथि को अपने वंशजों से अन्न मिलने की अपेक्षा रखता है । श्राद्ध करने से उनकी इच्छापूर्ति तो होती ही है, साथ ही, उन्हें आगे (उच्च लोकोंमें) जाने के लिए ऊर्जा भी मिलती है । पूर्वजों की एक भी वासना तीव्र रही, तो श्राद्धविधि से (श्राद्धकर्मसे) प्राप्त ऊर्जा उनकी वासनापूर्ति में व्यय होती है । इससे पितरों को आगे जाने के लिए गति प्राप्त नहीं होती । इसलिए नियमित श्राद्ध करने पर धीरे-धीरे उनकी वासना का क्षय होकर उन्हें आगे जाने के लिए गति भी प्राप्त हो सकती है । वैसे भी शास्त्रीय नियमों के अनुसार इस विश्व में रहने तक पितरों के प्रति कृतज्ञता के रूप में प्रतिवर्ष श्राद्ध करना ही उचित है ।

 

 ‘श्राद्ध करने से एक सौ एक कुलों
को गति प्राप्त होती है’, इसका क्या अर्थ है ?

‘श्राद्ध करने से एक सौ एक कुलों को गति प्राप्त होने का अर्थ है, मृत जीव के साथ लेन-देनयुक्त क्रिया के माध्यम से बंधे अन्य सजीवों को भी गति प्राप्त होती है । जीवनकाल में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्षरूप से लेन-देनयुक्त रूप में संपर्क में आए अन्य जीव’ इस अर्थ से ‘कुल’ शब्द का उपयोग किया गया है, ‘पीढी’ के अर्थ में नहीं । श्राद्धादि कर्म करने से उस विशिष्ट लिंगदेह पर परिणाम होता है तथा उसके कोष के आसक्तियुक्त रज-तमात्मक तंतुओं का विघटन होता है । इस प्रकार श्राद्धादि कर्म उस जीव के साथ-साथ अनेक कारणों से संपर्क में आए लगभग सौ जीवों का लेन-देनयुक्त संपर्क चुकाने में सहायक होता है । अतएव वे जीव भी इस लेन-देन कर्म से मुक्त होते हैं । भले ही अल्प मात्रा में क्यों न हो, थोडी गति धारण करते हैं । इस अर्थ से ऐसा कहा गया है कि ‘श्राद्ध करने से एक सौ एक कुलों को गति प्राप्त होती है’ अर्थात मृत व्यक्ति से संबंधित लेन-देन युक्त क्रिया से बंधे अन्य जीवों को भी गति प्राप्त होती है ।’ – एक विद्वान (पू.) श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यमसे, १३.८.२००६, दोपहर २.१३़

 

 मंगलकार्य के आरंभ में कौन-सा श्राद्ध किया जाता है और क्यों ?

मंगलकार्य के आरंभमें, गर्भाधान इत्यादि सोलह संस्कारों के आरंभमें, पुण्याहवाचन के समय कार्य सुसंपन्न करने हेतु जो श्राद्ध किया जाता है, उसे नांदीश्राद्ध कहते हैं । इसमें सत्यवसु (अथवा क्रतुदक्ष) संज्ञक विश्वेदेव होते हैं तथा पितृत्रय, मातृत्रय एवं मातामहत्रय का ही उच्चारण किया जाता है । कर्मांगश्राद्ध एवं वृद्धिश्राद्ध, दोनों नांदीश्राद्ध हैं ।

‘पुत्रजन्म, उपनयन एवं विवाह, इन पितरों के पारिवारिक प्रेम से सबंधित अवसरों पर प्रथम नांदीश्राद्ध कर उनका हविर्भाग उन्हें अर्पित कर संतुष्ट किया जाता है । इससे इन प्रसंगों के समय पूर्वजों के लिंगदेहों के वासनायुक्त अवरोध घट जाते हैं एवं कार्यक्रम निर्विघ्नरूप से संपन्न होने में सहायता मिलती है ।’ – एक विद्वान ड(पू.) श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यमसे, ११.८.२००६, रात्रि ८.५७़

श्राद्ध के देवता कौन है ?

अ. पुरुरव-आद्र्रव एवं धूरि-लोचन : पुरुरव-आद्र्रव एवं धूरि-लोचन, पितरोें के विश्वेदेव हैं । श्राद्ध में उनका उल्लेख किया जाता है ।

आ. वसु-रुद्र-आदित्य
१. ‘श्राद्ध का संबंध पितरों के अधिष्ठाता देवता – वसु, रुद्र एवं आदित्य से है । श्राद्धमंत्र एवं विधिद्वारा इन देवताओं से संपर्कहोता है ।’
२. जिसे उद्देशित कर श्राद्ध करना है, उस मृत व्यक्ति की गणना वसुगणों में होती है, उसके माता-पिता की रुद्रगणों में एवं दादा-दादीकी आदित्यगणों में गणना होती है; इसलिए श्राद्ध के समय वसु-रुद्र-आदित्य के प्रतिनिधि के रूप में पिता-पितामह-प्रपितामह का (अथवा माता-पितामही-प्रपितामही का) उच्चारण किया जाता है ।

 

 कौए का पिंड को न छूना, क्या
दर्शाता है ? ऐसे में क्या करना चाहिए ?

कौए का पिंड को न छूना : किसी लिंगदेह की इच्छा पूर्ण करने हेतु कोई वचनबद्ध न हो, तो उससे निकलनेवाली मारक तरंगों के कारण कौआ पिंड के पास आकर भी उसे स्पर्श नहीं कर पाता ।
जिस समय लिंगदेह की अतृप्त इच्छाएं पूरी नहीं होती, उस समय लिंगदेह से तमोगुणी मारक शक्ति की तरंगों का वातावरण में तथा कौए की ओर प्रक्षेपण होता रहता है । वे तरंगें कौए को अनुभव होती हैं तथा उन तरंगों के कारण कौआ पिंड को स्पर्श नहीं करता ।

कौएद्वारा पिंड को न छूए जाने पर अपनाने हेतु पर्याय : बहुत प्रतीक्षा करने पर भी कौआ पिंड को न छूए एवं ज्ञात न हो कि, उस मृत शक्ति की कौनसी इच्छा अपूर्ण है, तो इच्छापूर्ति का आश्वासन नहीं दिया जा सकता । कभी-कभी चौबीस घंटे बीतने पर भी कौआ पिंड को नहीं छूता । ऐसे में दर्भ का कौआ बनाकर पिंड को छुआते हैं ।

 

पुत्र किसे कहते हैं और उसका कर्तव्य क्या है ?

अपने पुत्रोंद्वारा पिंडोदक (पिंड एवं उदक) दिए जाने पर ही पितर सुखी एवं संतुष्ट होते हैं । ‘पुत्र किसे कहें’ इस विषय पर शास्त्रवचन आगे दिया है –

पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात् त्रायते पितरं सुतः ।
तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ – मनुस्मृति अध्याय ९, श्‍लोक १३८

शास्त्रों के अनुसार, पुत्र उसे कहते हैं जो अपने पितरों की (पूर्वजोंका) पुं नामक नरक से रक्षा करता है; उसे स्वयं ब्रह्मदेवने ‘पुत्र’ कहा है । पितरों को सद्गति प्राप्त हो, उन्हें अनंत यातनाओं से मुक्ति मिले एवं पितृलोक से पितर अपने वंश पर कृपादृष्टि रखें, इस हेतु पुत्र श्राद्ध आदि विधियां करे ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण कहता है, ‘देवकार्य की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण पितृकार्य है’; इसलिए सर्व मंगल कार्यों में भी नांदी श्राद्ध का विधान सर्वप्रथम है ।

ब्रह्मपुराण कहता है, ‘जो व्यक्ति विधिपूर्वक अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूफ श्राद्ध करता है, वह ब्रह्मदेव से लेकर तृणतक, सर्व जीवों को तृप्त करता है । श्राद्ध करनेवाले के कुल में कोई दुःखी नहीं रहता ।’

एक परिवार में ४ पुत्र हैं, और पिता का देहांत हुआ हो,
तो क्या चारों पुत्रों को पूर्वजों का कष्ट होगा ? ऐसी स्थिति में क्या करें ?

जिस प्रकार परिवार में पिता की मृत्यु होने के उपरांत सभी पुत्र पूर्वजों की संपत्ति, धन तथा वास्तु में समान अधिकार की बात करते हैं, वैसे ही उन पर पितृऋण भी लागू होता है । यदि सभी पुत्रों का भोजन एक ही रसोईघर में बनता है, तो ज्येष्ठ पुत्र को श्राद्धविधि करनी होती है और यदि सभी की रसोई अलग अलग है, तो सभी को श्राद्ध कर पितृऋण से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए । पितृदोष न लगे इसलिए ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का नामजप करना चाहिए ।

 

कैसे समझें कि परिवार में पूर्वजों का कष्ट है ?

हमें पूर्वज कष्ट दे रहे हैं अथवा कष्ट की आशंका है, इस विषय में उन्नत पुरुष (संत) ही बता सकते हैं। ऐसे उन्नत पुरुष न मिलें, तो सामान्यतः मान सकते हैं कि, आगे दिए कुछ प्रकार के कष्ट पूर्वजों के कारण होते हैं – घर में निरंतर लडाई-झगडे होना, एक-दूसरे से अनबन, चाकरी (नौकरी) न मिलना, घर में पैसा न टिक पाना, किसी को गंभीर बीमारी होना, स्थिति अनुकूल होने पर भी विवाह न होना, पति-पत्नी में अनबन, गर्भधारण न होना, गर्भपात होना, यदि संतान का जन्म हो तो वह मतिमंद अथवा विकलांग होना एवं कुटुंब के किसी सदस्य का व्यसनी होना । श्राद्धविधि से पितर संतुष्ट होते हैं और आशीर्वाद देते हैं, साथ ही मर्त्यलोक में अटके हुए पूर्वजों को गति प्राप्त होती है तथा उनके कारण
हमारे कष्टों का निवारण होता है ।

 

श्राद्ध से पितरों को सद्गति कैसे मिलती है ?

श्राद्ध के मंत्रोंद्वारा निर्माण होनेवाली तरंगें, ब्राह्मणों के आशीर्वाद, सगे-संबंधियों की सदिच्छाएं एवं पिंडदान जैसी कर्मकांड की विधियों का अलौकिक परिणाम होता हैं । इन परिणामों को तर्कद्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता । इससे लिंगदेह के सर्व ओर कवच का निर्माण होता है एवं उसे आगे की गति मिलती है । नरक, भुवर्लोक, पितृलोक एवं स्वर्ग में इन विधियों का लाभदायक परिणाम होता है ।’

जब तक गर्भाशय से बालक सुरक्षित बाहर नहीं निकलता, तब तक मां उसे सुरक्षा-कवच देती है, उसी प्रकार श्राद्ध की विधियोंद्वारा पितरों के लिए भी समय-समय पर सुरक्षा-कवच की पूर्ति की जाती है ।

 

श्राद्ध में पितरों को अर्पित अन्न, उन तक कैसे पहुंचता है ?

‘मत्स्यपुराण में (अध्याय १९, श्‍लोक ३ से ९, अध्याय १४१, श्‍लोक ७४-७५) श्राद्ध के संदर्भ में एक प्रश्‍न उपस्थित किया गया है, जो इस प्रकार है – ब्राह्मणोंद्वारा खाया हुआ या होमाग्नि में अर्पित अन्न मृतात्माओं को कैसे प्राप्त होता है ? इसलिए कि मृत्यु के पश्‍चात आत्माएं पुनर्जन्म प्राप्त कर दूसरी देह में आश्रय लेती हैं । इसका उत्तर वहीं दिया हुआ है, जो इस प्रकार है – वसु, रुद्र तथा आदित्य, इन पितृदेवताओंद्वारा वह अन्न पितरों को प्राप्त होता है अथवा वे अन्न भिन्न पदार्थों, जैसे अमृत, तृण, भोग, वायु आदि में रूपांतरित होकर भिन्न-भिन्न योनि के पितरों को मिलते हैं ।’

 

श्राद्धीय भोजन के लिए उचित पदार्थ कौन-से हैं ?

१. दाल (उबली हुई मसाले रहित), चावल, कढी, टूटे हुए चावलों की खीर, बडे, पूडी, आम अथवा नींबू का ताजा अचार एवं सत्तू (विविध दालों को भूनकर एवं पीसकर बनाया गया एक खाद्यपदार्थ),

२. खीरा, मूली, कद्दू, गोेभी, सेम (पतली एवं गुच्छेदार प्रकार), सूरन, धारीधार तोरई, अरबी, चंदन बटवा एवं अदरक,

३. तिल, जौ, मूंग, चना, गाय का दूध, दही, मट्ठा, मधु, चीनी, गुड, तेल एवं घी

४. लड्डू, पायस, गेहूं के पदार्थ, तैलपक्व (तले हुए) पदार्थ, चूसकर खाए जानेवाले पदार्थ, लौंग, सुपारी एवं बीडा ।

जिसका श्राद्ध कर रहे हैं, उसके जीवनकाल में उसे जो पदार्थ अच्छे लगते थे, वे पदार्थ श्राद्ध के समय ब्राह्मणों को परोसें । (श्राद्ध में ब्राह्मणभोजन महत्त्वपूर्ण माना गया है ।)

अधिक उचित पदार्थ (पुष्प, फल एवं धान) : ‘अगस्त, कांचन, मोगरा, जाही, जूही, दोलन चंपा, सुगंधा, कनकचंपा, नागचंपा, पारिजात, बकुल (मौलसिरी), सुरंगी इत्यादि पुष्प; बिजौरा, उंबर, आंवला, इमली, कोकम (इमली जैसा खट्टा पदार्थ), अंमडा (एक खट्टा फल), कैथ (कपित्थ – एक कडवा फल), मकई के दाने, अखरोट, चिरौंजी, छुहारा, खजूर, नारियल, केले, अंगूर, अनार, बेर, कटहल, खरबूजा इत्यादि फल एवं सूखा मेवा; काली उडद, सांवा, चना, चूका (एक खट्टा साग), प्रियंगु (चेना), सरसों का कल्क (पीसकर बनाया गया द्रव पदार्थ), देवधान (अपनेआप उगनेवाले चावल) एवं खीलें ।

 

श्राद्धकर्म में कौन-सी वस्तुएं वर्जित हैं और क्यों ?

श्राद्ध के लिए निषिद्ध पदार्थ हैं – प्याज, लहसुन, नमक, बैंगन, मटर, हरीक एवं पुलक नाम के चावल, रामदाना, मुनगा (सहिजन), गाजर, कुम्हडा, किडंग (एक आयुर्वेदिक औषधि), चिचडा, मांस, काला जीरा, काली मिर्च, काला नमक, शीतपाकी, अंकुरित होनेवाला अनाज, सिंघाडा, जामुनी रंग के एवं सडे-गले पदार्थ ।’

इसका कारण है ये पदार्थ तमोगुण बढानेवाले हैं । तमोगुण जडत्व बढाता है । ऐसा अन्न ग्रहण करनेवाले पितरों में जडत्व की निर्मिति होकर उनकी आगे की गति बाधित होती है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्राद्ध – भाग २’

 

श्री गणेशचतुर्थी-काल में कुछ लोग २१ दिन का गणपति
बैठाते हैं । तब, क्या उस काल में घर में श्राद्ध करना उचित रहेगा ?

शास्त्र में जिस कार्य के लिए जो समय बताया गया है, वह कार्य उस समय करना उचित है । इसलिए, पितृपक्ष में ही महालय श्राद्ध करना चाहिए । श्री गणेशचतुर्थी पर किसी का वार्षिक श्राद्ध हो, तो उस दिन वह श्राद्ध करना चाहिए । श्राद्ध के लिए बनाए गए भोजन का भोग श्री गणपति को लगाएं । सर्वसाधारणतः, जबतक सूर्य वृश्‍चिक राशि में रहते हैं, तबतक ही महालयश्राद्ध करने के लिए कहा गया है । (इस वर्ष यह काल १५ नवंबर तक है ।) पितृपक्ष में महालय श्राद्ध करने के विषय में भिन्न-भिन्न मत हैं । आजकल मृत व्यक्ति का उसकी मृत्यु की तिथि पर ही पितृपक्ष में एक दिन महालय श्राद्ध किया जाता है । जिनके घर २१ दिन के गणपति का पूजन होता है, उस काल में श्राद्ध की तिथि आ जाए, तब भी उन्हें उसी तिथि पर महालय श्राद्ध करना चाहिए । श्राद्ध में बने हुए भोजन का भोग श्रीगणपति को लगाना चाहिए । परंतु, श्राद्ध के दिन अन्य अनुष्ठान न करें; उदा. श्रीगणेशयज्ञ, लघुरुद्र यज्ञ आदि अनुष्ठान न करें । जो लोग जननाशौच अथवा मरणाशौच (सूतक) अथवा किसी अन्य कारण से उस तिथि पर महालय श्राद्ध नहीं कर सकते, वे सर्वपित्री अमावास्या पर करें । अन्यथा, सुविधानुसार, कृष्णपक्ष की अष्टमी, द्वादशी, अमावस्या और व्यतिपात योग पर भी, महालय श्राद्ध कर सकते हैं ।

श्राद्धकर्म के समय‘ॐ’ यह जप
बजाना शास्त्रानुकूल होगा अथवा नहीं ?

प्रश्‍न : श्राद्धकर्म में ‘ॐ’ का उच्चारण नहीं करना चाहिए, ऐसा शास्त्र में लिखा है । इस वर्ष पितृपक्ष में सब साधकों को ‘ॐॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐॐ’ यह जपने के लिए कहा गया है । इसी प्रकार, श्राद्धकर्म के समय‘ॐ’ यह जप बजाना शास्त्रानुकूल होगा अथवा नहीं ?

उत्तर : जब श्राद्धकर्म हो रहा हो, तब ‘ॐ’ का उच्चारण न करना उचित है । परंतु, जब जप मन में हो रहा हो, तब यह नियम नहीं लागू होता । श्राद्धकर्म आरंभ रहने पर, बताया हुआ नामजप ‘ॐॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐॐ’ मन में करना उचित है, वैखरी वाणी (मुख से बोलते हुए) में नहीं । यदि जप मुख से ही करना हो, तब ‘श्री गुरुदेव दत्त’ यह जप करें; परंतु इसे बजाएं नहीं ।

वेदमूर्ति केतन शहाणे, सनातन साधक-पुरोहित पाठशाला, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

4 thoughts on “श्राद्ध : प्रश्नोत्तर”

  1. महोदय,
    आप से निवेदन हैं मेरा मार्गदर्शन करें , अगर मां और पिता दोनों का स्वर्गवास हो गया है तो क्या एकादशी/अमावस्या को एक साथ वार्षिक श्राद्ध कराया जा सकता है?

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    • नमस्कार श्री. अजित कुमारजी,

      धर्मशास्त्रानुसार जिस दिन व्यक्ति का देहांत होता है, उसी तिथि को वार्षिक श्राद्ध करना चाहिए ।

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