श्राद्ध तिथिनुसार क्यों करें ?

 

सारिणी

१. पितृपक्षमें श्राद्ध क्यों करना चाहिए ?
२. वर्षश्राद्ध करनेके उपरांत पितृपक्षमें भी श्राद्ध क्यों करें ?
३. श्राद्धका मास ज्ञात है, किंतु तिथि ज्ञात न होनेपर उस माहकी शुक्ल अथवा कृष्ण पक्षकी एकादशी अथवा अमावस्याको श्राद्ध क्यों करें ?
४. सामान्यतः संध्याकाल, रात्रि एवं संधिकाल एवं उनके निकटका समय श्राद्ध विधिके लिए वर्जित क्यों है ?
५. श्राद्ध करनेका स्थान


‘प्रत्येक कृतिकी परिणामकारकता, उसका कार्यरत कर्ता (उसके कर्ता), कार्य करनेका योग्य समय एवं कार्यस्थल आदिपर निर्भर करती है । यदि तिथि प्रकृतिको आवश्यक बल देनेवाली अर्थात मूल ऊर्जास्वरूप हो तो उस तिथिपर उस विशिष्ट जीवके नामसे घटनेवाले कर्मसे उत्पन्न प्रवृत्तिके लिए अर्थात फलनिष्पत्तिके लिए पोषक होती है । प्रत्येक बात उस विशिष्ट तिथि अथवा उस विशिष्ट मुहूर्तमें करना महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि उस दिन उस घटनात्मक कर्मका कालचक्र एवं उनका प्रत्यक्ष घटनाक्रम, उससे उत्पन्न परिणाम इन सभीके स्पंदन एक समान अर्थात एक-दूसरेके लिए पूरक होते हैं । ‘तिथि’ उस विशिष्ट घटनाक्रमको पूर्णत्व प्रदान करने हेतु आवश्यक तरंगोंको कार्यरत करनेवाली होती है ।

उत्तम श्राद्ध, श्राद्धपक्ष में ही होता है । हमारे पूर्वज जिस तिथि पर इस संसार से चले गए होते हैं, श्राद्धपक्ष की उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम होता है । जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनका श्राद्ध अमावस्या तिथि पर करना उचित माना गया है । रात्रि में श्राद्ध करना मना है ।संन्यासी पूर्वजों के लिए श्राद्ध की तिथि एकादशी तथा जिनकी मृत्यु दुर्घटना, भूकंप, वर्षा, बमविस्फोट, हत्या आदि से हुई हो, उनके लिए श्राद्ध की तिथि चतुर्दशी बताई गई है । इस चतुर्दशी को घायल चतुर्दशी भी कहते हैं । 

 

१. पितृपक्षमें श्राद्ध क्यों करना चाहिए ?

पितृपक्षमें वातावरणमें तिर्यक तरंगोंकी (रज-तमात्मक तरंगोंकी) तथा यमतरंगोंकी अधिकता होती है । इसलिए पितृपक्षमें श्राद्ध करनेसे रज-तमात्मक कोषोंसे संबंधित पितरोंको पृथ्वीकी वातावरण-कक्षामें आना सरल होता है । इसलिए हिंदु धर्ममें बताए गए विधिकर्म उस विशिष्ट कालमें संपादित करना श्रेयस्कर एवं कल्याणकारी है ।

 

२. वर्षश्राद्ध करनेके उपरांत पितृपक्षमें भी श्राद्ध क्यों करें ?

‘वर्षश्राद्ध करनेसे उस विशिष्ट लिंगदेहको गति मिलती है । जिससे उसका प्रत्यक्ष व्यष्टिस्तरका ऋण चुकानेमें सहायता होती है । यह हिंदु धर्मद्वारा व्यक्तिगत स्तरपर प्रदत्त निर्धारित, ऋणमुक्तिकी एक व्यष्टि उपासना ही है, जबकि पितृपक्षमें श्राद्ध कर पितरोंका समष्टि स्तरपर ऋण चुकाना, यह समष्टि उपासनाका भाग है । व्यष्टि ऋण चुकाना उस लिंगदेहके प्रति प्रत्यक्ष कर्तव्यपालनकी सीख देता है, तो समष्टि ऋण एक ही साथ व्यापक स्तरपर लेन-देन पूर्ण करता है ।

जिनसे हमारा घनिष्ठ संबंध होता है, ऐसे एक-दो पीढी पूर्वके पितरों का हम श्राद्ध करते हैं; क्योंकि उनके साथ हमारा प्रत्यक्ष कर्तव्यस्वरूप लेन-देन रहता है । अन्य पीढियोंकी अपेक्षा इन पितरोंमें परिवारमें अटके आसक्ति विषयक विचारोंकी मात्रा अधिक होती है । अतः उनका यह प्रत्यक्ष बंधन अधिक प्रगाढ होता है; इसलिए उससे मुक्त होनेके लिए व्यक्तिगत स्तरपर वार्षिक श्राद्ध करना आवश्यक है । उसकी तुलनामें उनके पहलेके अन्य पितरोंसे हमारे संबंध उतने प्रगाढ नहीं होते । जिसके कारण उनके लिए पितृपक्ष विधि एकत्रित स्वरूपमें करना इष्ट होता है; इसलिए वर्षश्राद्ध तथा पितृपक्ष ये दोनों ही विधियां करना आवश्यक है ।’

 

३. श्राद्धका मास ज्ञात है, किंतु तिथि ज्ञात न होनेपर उस माहकी शुक्ल अथवा कृष्णपक्षकी एकादशी अथवा अमावस्याको श्राद्ध क्यों करें ?

‘इस दिन वायुमंडलमें यमतरंगोंकी प्रबलता अधिक होती है, इसलिए इन तरंगोंके प्रवाहसे पितरोंका आवाहन कर उन्हें मंत्रोच्चारणके बलकी आपूर्ति कर वायुमंडलमें अल्पावधिमें आकर्षित करना सहजतासे संभव होता है । यमतरंगोंके अधिकतादर्शक प्रवाहके माध्यमसे पितर पृथ्वीमंडलमें सहजतासे प्रवेश कर सकते हैं ।’

(इतने मार्ग उपलब्ध होनेपर भी हिंदु श्राद्ध इत्यादि नहीं करते । – संकलनकर्ता)

 

४. सामान्यतः संध्याकाल, रात्रि एवं संधिकाल एवं
उनके निकटका समय श्राद्ध विधिके लिए वर्जित क्यों है ?

‘संध्याकाल, रात्रि एवं संधिकालके निकटके समयमें संबंधित तरंगोंका ऊर्जाप्रवाह तीव्र होता है । इसका लाभ लेकर अनेक अनिष्ट शक्तियां इन गतिमान ऊर्जास्रोतके साथ पृथ्वीकी कक्षामें आगमन करती हैं, इसलिए यह काल ‘रज-तमयुक्त आगमनकाल’ कहलाता है ।’

 

संध्याकालके समय वातावरणमें तिर्यक तरंगोंकी प्रबलता होती है, संधिकालमें विस्फुटित (शेषनागसे उत्पन्न हिरण्यगर्भ तरंगें जब पृथ्वीपर आती हैं, तब उनकी संख्या ३६० होती है, इस कारण उन्हें ‘३६० तरंगें’ कहते हैं । इन ३६० तरंगोंमें से तम युक्त विस्फुटित तरंगें ।) तरंगें कार्यरत अवस्थामें रहती हैं, जबकि रात्रिके समय विस्फुटित, तिर्यक एवं यम, इन तीनों तरंगोंकी अधिकता होती है । जिस कारण इस समय वातावरण अतिशय तप्त ऊर्जासे संचारित रहता है । श्राद्धके समय जब उस विशिष्ट पिंडके लिए संकल्प किया जाता है, तब आवाहनात्मक प्रक्रियाके कारण उस विशिष्ट लिंगदेहका वातावरणमें आगमन होता है ।

 

जब वायुमंडल रज-तम कणोंसे संचारित होता है, तब वायुमंडलमें संचार करनेवाली अनिष्ट शक्तियोंके कारण पृथ्वीकी वातावरण कक्षामें प्रवेश करनेवाले लिंगदेहको अवरोध हो सकता है । कभी-कभी ऐसे लिंगदेहके मांत्रिकोंके चंगुलमें फंस जानेकी आशंका होती है । इसलिए जहांतक संभव हो, वायुमंडल दूषित होनेकी अवस्थामें लिंगदेहको अवरोध करनेवाली तरंगोंकी प्रबलताके प्रभावमें श्राद्धविधि न करें । अन्यथा लिंगदेहको सदैवके लिए मांत्रिकोंके चंगुलमें फंसकर स्थायीरूपमें नारकीय यातनाएं भोगनी पड सकती हैं । इसके लिए हिंदु धर्मद्वारा बताई गई कृतियोंका आचरणसहित पालन करना अति महत्त्वपूर्ण होता है, तभी इष्ट फलकी प्राप्ति होती है ।’

 

टिप्पणी १ : ‘मांत्रिक’ अर्थात बलवान आसुरी शक्ति ।

 

५. श्राद्ध करनेका स्थान

अपने घरमें श्राद्ध करनेसे तीर्थक्षेत्रमें श्राद्ध करनेकी तुलनामें आठ गुना पुण्य प्राप्त होता है ।

‘लगभग ५० प्रतिशत पितर साधनाके अभाववश एवं वासनाओंकी अधिकतासे प्राप्त जडत्वके कारण गति प्राप्त नहीं कर पाते हैं । इसलिए उनका वास उनकी पारंपरिक वास्तुमें ही अधिक होता है । अतः श्राद्ध आदि विधि इसी क्षेत्रमें करनेसे पितर स्वयंका हविर्भाग सहज प्राप्त कर सकते हैं । इस कारण वे तुलनात्मकरूपसे अधिक संतुष्ट हो सकते हैं एवं इसके फलस्वरूप वंशको पितरोंका आशीर्वाद भी अधिक मात्रामें प्राप्त होता है । अत एव ऐसा कहा जाता है कि ‘तीर्थकी अपेक्षा आठ गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है ।’ इसके अतिरिक्त इस विधिसे पितरोंका वास्तुके साथ रहा घनिष्ट संबंध कम होनेमें सहायता होती है । जिससे उन्हें मर्त्यलोकमें प्रवेश करने हेतु बल प्राप्त होता है और भूतलपर एक स्थानपर बंदी बनकर भोगनेकी यातनाओंकी मात्रा अल्प होती है ।

 

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्राद्धकी कृतियोंका आधारभूत शास्त्र’

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