श्राद्ध में पितरों तथा देवताओं को नेवैद्य दिखाना

श्राद्ध में पितरों तथा देवताओं को नेवैद्य दिखाना, एक महत्त्वपूर्ण क्रिया है । इसलिए इसका शास्त्र जानना आवश्यक है । इस दृष्टि से इस लेख में समझाया गया है कि पितरों के लिए रखे हुए पिंड पर दर्भ (कुश) क्यों रखते हैं, देवताओं एवं पितरों को नेवैद्य कैसे दिखाएं इत्यादि ।

श्राद्ध में पितरों और देवताओं को नैवेद्य दिखाना चलदृश्य

 

 

१. पितरों के लिए अन्नपिंड दर्भ (कुश) पर क्यों अर्पित करते हैं ?

दर्भ से तेजतत्वयुक्त वायुतरंगें निकलती रहती हैं । दर्भ पर पितरों के लिए पिंड रखने पर, इससे निकलनेवाली तेजतत्वयुक्त तरंगों से लिंगदेह के सर्व ओर स्थित कालीशक्ति का विघटन होता है । तब, उस अन्न से लिंगदेह सहजता से सूक्ष्म-वायु ग्रहण कर पाती है ।

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, २४.९.२००५, सायं. ६.२०़

(शास्त्रानुसार पितरों के लिए अन्नपिंड दर्भ पर अर्पित किया जाता है; परंतु आजकल इसके लिए पत्तल का उपयोग होने लगा है । – संकलनकर्ता)

‘पितरों के लिए थाली में भोजन नित्य के विपरीत ढंग से परोसने पर, रज-तमात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं, जिससे मृतात्मा (पितर) के लिए अन्न ग्रहण करना सरल होता है ।’

– श्री नीलेश चितळे के माध्यम से, ५.७.२००६, सायं. ७.२७

१ अ. दर्भ पर पिंड रखकर उसका पूजन करने की सूक्ष्म प्रक्रिया दर्शानेवाला चित्र

१. चित्र में कष्टदायक स्पंदन : २ प्रतिशत’ – परात्पर गुरु डॉ. आठवले

२. चित्र में विविध स्पंदन : भाव १ प्रतिशत, चैतन्य १ प्रतिशत, शक्ति ३.७५ प्रतिशत एवं कष्टदायक शक्ति १.७५ प्रतिशत 

३. अन्य सूत्र : दर्भ पर पिंड रखकर उसपर घी छोडा जाता है, जले हुए दर्भ की कालिख दर्भ को लगाई जाती है, ऊन का धागा पिंड पर रखा जाता है । पश्चात पुष्प, तुलसी, भृंगराज (भंगरैया), धूप, दीप आदि से पिंडों की पूजा की जाती है ।

अ. श्राद्ध करते समय शक्ति के स्पंदन अधिक उत्पन्न होते हैं । यह शक्ति पूजक को मिलती है ।

आ. यजमान के हाथों पिंडों का पूजन श्रद्धापूर्वक होने पर, उन पिंडों की ओर भुवलोक के अतृप्त पितर सहजता से आकृष्ट होते हैं, उसका सूक्ष्म अंश ग्रहण करते हैं, इससे उनकी इच्छापूर्ति होती है और गतिज ऊर्जा भी मिलती है । तब, यजमान का पूर्वजों से होनेवाला कष्ट घटता है । 

– कुमारी प्रियांका लोटलीकर, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा । (३०.८.२००९)

१ आ. अनुभूति

सूक्ष्म-ज्ञान का चित्र बनाते समय ‘अपने पितरों का पूजन कर रही हूं’, यह भाव होने से, स्वयं पर आया हुआ नकारात्मक ऊर्जा का आवरण दूर होकर, उत्साह अनुभव होना  ‘यजमान ने जब दर्भ पर पिंड रखा, तब इसके विषय में मिलनेवाले सूक्ष्मज्ञान का चित्र बनाते समय लगा कि मुझपर काली शक्ति (नकारात्मक ऊर्जा) का आवरण आ रहा है । जब वह चित्र बनाते समय मैंने मन में भाव (विचार) रखा कि ‘अपने पितरों की पूजा कर रही हूं ।’ जब चित्र पूरा बन गया, तब अनुभव हुआ कि स्वयं पर आया आवरण दूर हो गया है और उत्साह भी लग रहा है ।’ 

– कुमारी प्रियांका लोटलीकर, सनातन संस्था

 

२. श्राद्धकर्म में देवताओं को नैवेद्य दिखाना 

देवताओं को नैवेद्य

श्राद्ध-जैसे अशुभ कर्म कनिष्ठ प्रकार के पृथ्वी और आप तत्त्वों से संबंधित होते हैं । इसलिए, इसमें नैवेद्य दिखाने की क्रिया अधिकांशतः भूमि (पृथ्वीतत्त्व) से संबंधित होती है । पितृकर्म (श्राद्ध) में कनिष्ठ देवताओं की तरंगें भूमि की ओर गमन करती हैं, इसलिए उस दिशा को मुख्य मानकर यह क्रिया की जाती है । श्राद्ध-जैसे अशुभ कर्म कनिष्ठ प्रकार के पृथ्वी और आप तत्त्वों से संबंधित होते हैं । इसलिए, इसमें नैवेद्य दिखाने की क्रिया अधिकांशतः भूमि (पृथ्वीतत्त्व) से संबंधित होती है । पितृकर्म (श्राद्ध) में कनिष्ठ देवताओं की तरंगें भूमि की ओर गमन करती हैं, इसलिए उस दिशा को मुख्य मानकर यह क्रिया की जाती है ।

 

३. पितरों को अन्न-निवेदन की पद्धति एवं उसका अध्यात्मशास्त्र

३ अ. क्रिया 

पितरों को अन्न-निवेदन

 

देवताओं को नैवेद्य-निवेदन करते समय वज्रासन में इस प्रकार बैठें कि केवल दायां घुटना भूमि पर रहे और बायां घुटना पेट के पास । पश्चात, नैवेद्य की थाली के ऊपर दायां हाथ तथा नीचे बायां रखकर, देवताओं को अन्न-निवेदन करें, अर्थात भोग लगाएं ।

३ आ. अध्यात्मशास्त्र

‘वज्रासन में बैठकर दाहिना घुटना भूमि पर रखना, यह देह की शक्ति व्यय कर अपने अहंकार को घटाने तथा बार्इं नाडी सक्रिय कर देवताओं की निर्गुण तरंगें ग्रहण करने का प्रतीक है । दाहिना घुटना भूमि पर टिकाकर बायां घुटना पेट के पास लाने से नाभि पर दबाव पडता है । इससे बार्इं नाडी (चंद्र नाडी) सक्रिय होती है । इसके विपरीत क्रिया करने से रजोगुण बढानेवाली दार्इं नाडी (सूर्य नाडी) सक्रिय होती है । इससे, पितरों के लिए श्राद्धस्थल पर आना सरल होता है ।

देवताओें नैवेद्य की थाली अथवा पत्ते के नीचे बायां हाथ रखना तथा थाली के ऊपर दाहिना हाथ रखना, यह दाहिने हाथ को अधिक महत्त्व देने तथा श्राद्ध में आए देवताओं का स्वागत करने का शुभसूचक कर्म है ।’ इसके विपरीत ढंग से देवताओं की तुलना में कनिष्ठ पितरों को अन्न-निवेदन किया जाता है । इसमें, अल्प महत्त्व के अशुभदर्शक बाएं हाथ को अधिक महत्त्व दिया जाता है । अर्थात, बायां हाथ नैवेद्य के पत्ते के ऊपर तथा दायां हाथ पत्ते के नीचे रखा जाता है ।’

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, ५.८.२००६, सायं. ५.३४़

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘श्राद्ध (भाग-२) श्राद्धकर्म का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’