श्राद्ध के विषय में प्राचीन ग्रंथों के संदर्भ

मृत व्यक्ति के तिथि के श्राद्ध के अतिरिक्त अन्य समय कितना भी स्वादिष्ट पदार्थ अर्पित किए जाए, पूर्वज ग्रहण नहीं कर पाते । बिना मंत्रोच्चार के समर्पित पदार्थ पूर्वजों को नहीं मिलते । – (स्कंद पुराण, माहेश्‍वरी खंड, कुमारिका खंड, अध्याय ३५/३६)

मृत पूर्वजों को भू और भुव लोकों से आगे जाने के लिए गति प्राप्त हो; इसके लिए हिन्दू धर्म में श्राद्ध करने के लिए कहा गया है । श्राद्ध न करने से व्यक्ति में कौन-से दोष उत्पन्न हो सकते हैं, इसका भी वर्णन विविध धर्मग्रंथों में मिलता है । 

१. ऋग्वेद

त्वमग्न ईळितो जातवेदोऽवाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी ।
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥
– ऋग्वेद, मण्डल १०, सूक्त १५, ऋचा १२

अर्थ : हे सर्वज्ञ अग्निदेव, हम आपकी स्तुति करते हैं । आप हमारे द्वारा समर्पित इन हवनीय द्रव्यों को सुगंधित बनाकर, हमारे पूर्वजों तक पहुंचाइए । हमारे पूर्वज स्वधा के रूप में दिए गए इस हवनीय द्रव्य का भक्षण करें । हे भगवन, आप भी हमसे समर्पित इस हविर्भाग का भक्षण कीजिए ।

२. कूर्मपुराण

अमावास्वादिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिताः ।
वायुभूताः प्रपश्यन्ति श्राद्धं वै पितरो नृणाम् ॥
यावदस्तमयं भानोः क्षुत्पिपासासमाकुलाः ।
ततश्‍चास्तंगते भानौ निराशादुःखसंयुताः ।
निःश्‍वस्य सुचिरं यान्ति गर्हयन्तः स्ववंशजम् ।
जलेनाऽपिचन श्राद्धं शाकेनापि करोति यः ॥
अमायां पितरस्तस्य शापं दत्वा प्रयान्ति च ॥
– कूर्मपुराण

अर्थ : (मृत्यु के पश्‍चात) वायुरूप बने पूर्वज, अमावस्या के दिन अपने वंशजों के घर पहुंचकर देखते हैं कि उनके लिए श्राद्ध भोजन परोसा गया है अथवा नहीं । भूख-प्यास से व्याकुल पितर सूर्यास्त तक श्राद्ध भोजन की प्रतीक्षा करते हैं । न मिलने पर, निराश और दुःखी होते हैं तथा आह भरकर अपने वंशजों को चिरकाल दोष देते हैं । ऐसे समय जो पानी अथवा सब्जी भी नहीं परोसता, उसको उसके पूर्वज शाप देकर लौट जाते हैं ।

३. आदित्यपुराण

न सन्ति पितरश्‍चेति कृत्वा मनसि वर्तते ।
श्राद्धं न कुरुते यस्तु तस्य रक्तं पिबन्ति ते ॥  
– आदित्यपुराण

अर्थ : मृत्यु के पश्‍चात पूर्वजों का अस्तित्व नहीं होता, ऐसा मानकर जो श्राद्ध नहीं करता, उसका रक्त उसके पूर्वज पीते हैं ।

४. मार्कंण्डेयपुराण

श्राद्ध न करने से प्राप्त दोष

न तत्र वीरा जायन्ते नाऽऽरोग्यं न शतायुषः ।
न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम् ॥
– मार्कण्डेयपुराण

अर्थ : जहां श्राद्ध नहीं होता, उसके घर लडका (वीराः) नहीं जन्मता । (जन्मीं तो केवल लडकियां ही जन्मती हैं ।), उस परिवार के लोग स्वस्थ्य और शतायु नहीं होते तथा उनको आर्थिक समस्याएं उत्पन्न  होती हैं अथवा संतुष्टि नहीं प्राप्त होती । (न च श्रेयः)
(संदर्भ : श्राद्धकल्पकता, पृष्ठ ६)

इस संदर्भ से ज्ञात होता है कि श्राद्धकर्म न करने से पितर रूठ जाते हैं । इससे उनके वंशजों को कष्ट होता है । सब उपाय करने पर भी जब कष्ट दूर न हो, तब समझना चाहिए कि यह पूर्वजों के रुष्ट होने के कारण हो रहा है ।

(संदर्भ : ग्रंथ का नाम : भारतीय मानसशास्त्र अथवा सार्थ एवं सविवरण पातंजल योगदर्शन, लेखक : योगाचार्य कृष्णाजी केशव कोल्हटकर, प्रकाशक : आदित्य प्रतिष्ठान, १२, अमित कॉम्प्लेक्स, ४७४ ब, सदाशिवपेठ, न्यू इंग्लिश स्कूल (तिलक पथ) के सामने, पुणे – ४११ ०३०, दूरभाष : (०२०) ४४७९१७५)

५. गरुड पुराण

अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के द्वार के निकट उपस्थित होते हैं तथा अपने परिजनों से श्राद्ध की अपेक्षा रखते हैं । भूख-प्यास से व्याकुल वे सूर्यास्त तक वहीं खडे रहते हैं । इसलिए, पितृपक्ष की अमावस्या तिथि पर श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ।

संत एकनाथ महाराज का अपने पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों से पहले अछूत जाति के लोगों को भोजन कराने से उन्हें महान पुण्य की प्राप्ति तथा उसके प्रभाव से कुष्ठ रोग दूर होना

संत एकनाथ महाराज पैठण में रहते थे । एक बार वे घर पर अपने पिता का श्राद्ध कर रहे थे । उन्होंने श्राद्ध का भोजन करने के लिए गांव के ब्राह्मणों को आमंत्रित किया । श्राद्ध के भोजन की सुगंध घर के आसपास फैल रही थी । उसी समय उस मार्ग से एक अछूत जाति का व्यक्ति अपने छोटे बच्चों के साथ जा रहा था । उन बच्चों को पकवान खाने की इच्छा हुई । तब, वे लडके पकवान खिलाने के लिए अपने पिता से हठ करने लगे । पिता ने उन्हें समझाया कि हम निर्धन और अछूत जाति के हैं । हमें ऐसा पकवान मिलना कठिन है । संत एकनाथ को यह बात सुनाई दी । उनको उस पर दया आई । उन्होेंने उस व्यक्ति और उसके बच्चों को अपने घर बुलाकर भरपेट भोजन कराया । पश्‍चात, अपनी रसोई और भोजन के बरतन गोदावरी के जल से धोए और पुनः दूसरा भोजन बनवाया । जब गांव के ब्राह्मणों को पता चला कि संत एकनाथ ने हमें भोजन कराने के पहले अछूत जाति के लोगों को भोजन कराया है, तब वे बहुत क्षुब्ध हुए । एकनाथ महाराज उनको भोजन के लिए बुलाने गए; किंतु उन्होंने उनके घर भोजन करना अस्वीकार कर दिया और संत एकनाथ को उनकी जाति से निकाल दिया ।

ब्राह्मणों ने उनसे कहा, आपने अछूत जाति के लोगों को ब्राह्मणों से पहले भोजन करवाया है । यह पाप है । इस पाप के लिए आपको प्रायश्‍चित करना पडेगा । तब संत एकनाथ ने प्रायश्‍चित करना स्वीकार किया । वे गोदावरी नदी में खडे रहे । ब्राह्मणों ने प्रायश्‍चित का मंत्र पढना प्रारंभ किया । इतने में त्र्यंबकेश्‍वर से एक ब्राह्मण उनके पास आया । वह कुष्ठरोग से पीडित था । उसने पैठण के ब्राह्मणों से कहा, मुझे कुष्ठरोग हुआ है । मैंने त्र्यंबकेश्‍वर में कठोर अनुष्ठान किया । उससे महादेवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे आदेश दिया, तुम पैठण जाओ । वहां संत एकनाथ ने अछूत जाति के लोगों को अपने पिता के श्राद्ध में भोजन कराया है । इससे उन्हें महान पुण्य की प्राप्ति हुई है । यदि वे अपने इस पुण्य का थोडा भाग तुम्हें देंगे, तो तुम्हारा कुष्ठरोग ठीक हो जाएगा । उस ब्राह्मण की यह बात सुनकर संत एकनाथ ने हाथ में जल लिया और प्राप्त पुण्य का थोडा भाग उसे देने के लिए उसके शरीर पर छिडक दिया । तब, चमत्कार हुआ । उस ब्राह्मण का कुष्ठरोग तुरंत समाप्त हो गया । पैठण के ब्राह्मणों ने जब यह चमत्कार देखा, तब वे संत एकनाथ के सामने नतमस्तक हुए और क्षमा मांगी । पश्‍चात, वे संत एकनाथ के घर भोजन करने गए ।
– श्रीराम विश्‍वनाथ गुजर (मासिक शक्तिब्रह्माश्रम समाचार, (अप्रैल २०११)

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