दसवें दिन की श्राद्ध विधि नदी तट पर स्थित शिव मंदिर में करने का कारण इस लेख के माध्यम से जानकर लेंगे ।
दसवें दिन किया जानेवाला श्राद्ध
दसवें दिन लिंगदेह को काकस्पर्श के माध्यम से मंत्रोच्चारण से संचारित पिंडयुक्त हविर्भाग दिया जाता है । इससे लिंगदेह को अन्नदर्शक आसक्तियुक्त रज-तमरूपी संस्कारात्मक बंधन से मुक्त करने का प्रयत्न कर पृथ्वीमंडल भेदने के लिए आवश्यक बल की आपूर्ति की जाती है । व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात प्रतिदिन दस दिनों तक पिंडदान बताया गया है; किंतु कालानुसार वह दसवें दिन ही एक साथ किया जाता है ।
१. पिंडदान करने का कर्म नदी के तट पर अथवा घाट पर क्यों किया जाता है ?
‘पिंडदान साधारणतः तीर्थक्षेत्र, नदी के तट पर, घाट पर, स्मशान में अथवा घर के बाहर किया जाता है । इनमें से नदी के तट पर अथवा घाटपर पिंडदान करके के पीछे अध्यात्मशास्त्र आगे स्पष्ट किया है ।
‘मृत्यु के पश्चात स्थूलदेह त्याग दिया जाने से लिंगदेह के सर्व ओर विद्यमान कोष के पृथ्वीतत्त्व के, अर्थात जडत्व की मात्रा अल्प हो जाती है और आपतत्त्व की मात्रा बढती है । लिंगदेह के सर्व ओर विद्यमान कोष में सूक्ष्म आर्द्रता की मात्रा सबसे अधिक होती है । पिंडदान कर्म लिंगदेह से संबंधित होने से ऐसी विधियां नदी के तट पर अथवा घाट पर करने से लिंगदेह को पृथ्वी की वातावरणकक्षा में आना सरल हो जाता है । नदी के तट पर अथवा घाट के वातावरण में आपतत्त्व के कणों की प्रबलता होने से, वहां का वातावरण आर्द्रतादर्शक होता है । लिंगदेह को ऐसा वातावरण अन्य जडत्वदर्शक वातावरण की तुलना में अनुकूल और जाना-पहचाना लगता है । इसलिए लिंगदेह ऐसे आर्द्रतादर्शक वातावरण की ओर शीघ्र आकर्षित हो जाती हैं; अत: यही कारण है कि पिंडदान जैसी विधियां प्रमुखरूप से नदी तट पर अथवा घाट पर की जाती हैं ।
२. पिंडदान कर्म नदी के तट अथवा घाट पर स्थित शिव के अथवा अन्य कनिष्ठ देवताओं के देवालयों में क्यों करते हैं ?
कुछ स्थानों पर नदी तट अथवा घाट पर मंदिर होते हैं । ‘मंदिरों के परिसर में पिंडदान करें’, ऐसा धर्मशास्त्र में नहीं बताया गया है; परंतु नदी के तट पर अथवा घाट पर मंदिर हों तो उस मंदिर के परिसर में पिंडदान करने की प्रथा है । अधिकांश बार शिवजी के अथवा कनिष्ठ देवताओं के मंदिरों का इसके लिए उपयोग किया जाता है; कारण इन देवताओं के उस स्थान की अनिष्ट शक्तियों को अपने नियंत्रण में रखने से पिंडदान में किए गए आवाहनानुसार पृथ्वी की वातावरणकक्षा में आनेवाली लिंगदेह की यात्रा में बाधा निर्माण नहीं होती । इसलिए पिंडदान कर्म से पहले उस अमुक मंदिर के देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के पश्चात ऐसी विधि की जाती है । देवता से प्रक्षेपित होनेवाली सात्त्विक तरंगों के कारण लिंगदेह की अनिष्ट शक्तियों के आक्रमणों से रक्षा होती है, अन्यथा कभी-कभी पिंडदान विधि के समय अनिष्ट शक्तियों की वातावरणकक्षा में आनेवाली लिंगदेह पर आक्रमण कर उसे नियंत्रण में रख सकते हैं; अत: उसे टालने के लिए संभवत: नदी के तट पर अथवा घाट पर शिवजी के, अन्य कनिष्ठ देवताओं के अथवा स्थानदेवता के मंदिर के परिसर में ऐसी विधि की जाती है ।
– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, ५.३.२००५, दोपहर १२.२१़
दसवें दिन कौए का पिंड को स्पर्श करना क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है ?
१. दसवें दिन पिंड को काैए का स्पर्श क्यों महत्त्वपूर्ण समझा जाता है ?
‘काकगति’ पिंडदान में किए गए आवाहनानुसार पृथ्वी की वातावरणकक्षा में आनेवाली लिंगदेह की गति से साधर्म्य दर्शाती है । इसके साथ ही कौए का काला रंग रज-तमदर्शक होने से, वह ‘पिंडदान’ इस रज- तमात्मक कार्य से संबंधित विधि से साधर्म्य दर्शाता है । कौए के आसपास विद्यमान सूक्ष्म कोष में भी लिंगदेह के सर्वओर विद्यमान कोष समान ही आपकणों की प्रबलता अधिक होने से लिंगदेह को कौए की देह में प्रवेश करना सरल हो जाता है । वासनाग्रस्त लिंगदेह भूलोक, भुवलोक, स्वर्गलोक और अन्य स्थानों पर अटकी होती हैं । ऐसी लिंगदेह पृथ्वी की वातावरणकक्षा में प्रवेश करने के पश्चात कौए की देह में प्रवेश कर पिंड का अन्न भक्षण करती है । प्रत्यक्ष पिंड का अन्न कौए के माध्यम से भक्षण कर स्थूल स्तर पर, इसके साथ ही अन्न से प्रक्षेपित होनेवाली सूक्ष्म-वायु ग्रहण कर सूक्ष्म स्तर पर, ऐसे दोनों माध्यमों से लिंगदेह की तृप्ति होती है और पृथ्वी की कक्षा भेदकर आगे जाने के लिए उसे इस अन्न से स्थूल एवं सूक्ष्म, इन दोनों स्तरों कर ऊर्जा मिलती है । स्थूल ऊर्जा लिंगदेह के बाहर की वासनात्मक कोष का पोषण करती है, तो सूक्ष्म-वायुरूपी ऊर्जा लिंगदेह को आगे जाने के लिए आंतरिक बल देती है ।’ (श्रीचित्शक्ति [श्रीमती] अंजली मुकुल गाडगीळ के माध्यम से, ५.३.२००५, दोपहर १२.१० व १२.२१ एवं २९.७.२०२४)
२. काकस्पर्श (कौए का पिंड को चोंच लगाना) के पश्चात होनेवाली सूक्ष्म-स्तरीय प्रक्रिया दर्शानेवाला चित्र

अ. चित्र में कष्टदायक स्पंदन
२ प्रतिशत’ – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
आ. ‘सूक्ष्म-ज्ञानचित्र में स्पंदनों की मात्रा
कष्टदायक शक्ति ४.२५ प्रतिशत
इ. अन्य सूत्र
१. जिस समय कौआ चोंच से पिंड (श्राद्ध का भोजन) लेता है, उस समय लगता है कि पितर की वासना शांत हो गई है । कौए के माध्यम से पितर अपनी भोजन की इच्छा पूरी करते हैं ।
२. जब लिंगदेह (पितर) की भोजन की इच्छा पूरी नहीं होती, तब वह क्रोधित होकर तमोगुणी मारक शक्ति की तरंगें वातावरण में तथा कौए की ओर प्रक्षेपित करता है । ये तरंगें कौए को अनुभव होती हैं, जिससे वह पिंड को स्पर्श नहीं करता ।
३. सामान्य लोग माया में अधिक उलझे होते हैं । इसलिए, उनकी इच्छा अतृप्त रहती है । इसकी पूर्ति पिंडदान से होती है ।’
– कुमारी प्रियांका लोटलीकर, अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (२८.३.२०१२)

‘कोरोना’ महामारी की पृष्ठभूमि पर शास्त्र के विधान के अनुसार निम्नांकित पद्धति से श्राद्धविधि करें...
अन्य पंथ तो पूर्वजों के लिए कुछ नहीं करते, फिर उन्हें कष्ट नहीं होता है...
हिन्दू धर्म में छोटे बच्चों का श्राद्धकर्म न करने के कारण
पितरों का ‘वार्षिक श्राद्ध’ और ‘पितृपक्ष में महालय श्राद्ध’ दोनों क्यों करना चाहिए ?
श्राद्ध तीर्थक्षेत्र में करने की तुलना में घर पर करना अधिक लाभदायक
श्राद्ध करने में अडचन हो, तो उसे दूर करने का मार्ग