शारदीय ऋतुचर्या : शरद ऋतु में स्वस्थ्य रहने हेतु आयुर्वेदीय चिकित्सा !

वर्षाऋतु समाप्त होते-होते सूर्य की प्रखर किरणें धरती पर पडने लगती हैं । तब शरद ऋतु का आरंभ होता है ।

शास्त्रों के अनुसार श्राद्धकर्म न करने से होनेवाली हानि

हिन्दू धर्मशास्त्र के अनुसार मृत व्यक्ति के श्राद्धविधि प्रतिवर्ष करने के लिए कहा गया है । कुछ निरीश्‍वरवादी इसे विरोध करते हैं । श्राद्ध-विधि न करने पर क्या हो सकता है और जीवन में साधना का महत्त्व इस लेख द्वारा समझ लेते है ।

अविधवा नवमी

पति के निधन से पूर्व मृत स्त्रियों के श्राद्ध पितृपक्ष की नवमी को (अविधवा नवमी को) ही क्यों करें ?

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य तथा लेखापरीक्षक वरदाराज बापट की सनातन के रामनाथी आश्रम को सदिच्छा भेंट !

खिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य तथा नौपाडा, ठाणे के लेखापरीक्षक श्री. वरदराज बापट ने हाल ही में सनातन के रामनाथी आश्रम का अवलोकन किया ।

रामनाथी (गोवा) के सनातन आश्रम में संत भक्तराज महाराज तथा प.पू. रामानंद महाराज की चरण पादुकाओं का दर्शन समारोह संपन्न

चरणपादुकाओं के पूजन के पश्‍चात श्री. शरद बापट ने परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को शॉल, कमलपुष्प तथा अंग्रेजी भाषा का‘प.पू. भक्तराज महाराजजी का दैवीय जीवनपट’ ग्रंथ समर्पित कर सम्मानित किया ।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य तथा लेखापरीक्षक वरदराज बापट की सनातन के रामनाथी आश्रम को सदिच्छा भेंट !

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य तथा नौपाडा, ठाणे के लेखापरीक्षक श्री. वरदराज बापट ने हाल ही में सनातन के रामनाथी आश्रम का अवलोकन किया ।

सनातन संस्था की ओर से चेन्नई के भारत हिन्दू मुन्नानी के कार्यालय में विशेष सत्संग

सनातन की ओर से श्रीमती सुगंधी जयकुमार ने महिला जिज्ञासुओं का ‘साधना का महत्त्व, नामजप, आचारधर्म तथा समष्टि सेवा का महत्त्व’ विषयपर मार्गदर्शन किया ।

बक्सों से उपचारों के संदर्भ में संयुक्त सूचना

विकार-निर्मूलन हेतु बक्सों से उपचार सामान्यत प्रतिदिन १ से २ घंटे करें । कुछ दिन प्रतिदिन १ से २ घंटे बक्सों से उपचार करने पर भी विकार घट न रहे हों अथवा नियंत्रित न हो रहे हों, तो उपचारों में वृद्धि करें ।

बक्से के उपचार करने हेतु शरीर के स्थान

ब्रह्मांड में विद्यमान प्राणशक्ति (चेतना) कुंडलिनीचक्रों द्वारा मनुष्य के शरीर में ग्रहण की जाती है आैर उस चक्रविशेष द्वारा वह शरीर की संबंधित इंद्रिय तक पहुंचाई जाती है । इंद्रिय में प्राणशक्ति के (चेतना के) प्रवाह में बाधा आने पर विकार उत्पन्न होते हैं ।