‘घरेलु औषधि’ सेवन की पद्धतियां !

वैद्य मेघराज पराडकर

शास्त्रीय आयुर्वेद में विकारों के कारण, उन कारणों से शरीर पर हुआ परिणाम, उस परिणाम को दूर करने हेतु चिकित्सा, रोगी की प्रकृति, उसकी जीवन-शैली, उसकी रोगप्रतिकारक क्षमता आदि अनेक बातों का गहन अध्ययन कर रोगी के लिए उचित हो, ऐसी योग्य औषधि देनी चाहिए, ऐसा बताया गया है । विशेषज्ञ वैद्य ही ऐसी चिकित्सा कर सकते हैं । विशेषज्ञ वैद्य के अभाव में न्यूनतम रोगी को आराम मिले, इसके लिए परंपरागत घरैलु औषधियों की बहुत अच्छी सुविधा उपलब्ध की गई है । ये औषधियां उपयोग के लिए सरल होती हैं । उनसे कोई अपाय (रिएक्शन) नहीं होता; परंतु यदि अपाय हुआ, तो वह एलोपैथिक औषधियों जितना गंभीर नहीं होता । इसलिए अस्वस्थ होने पर तुरंत एलोपैथिक औषधियों के सेवन की अपेक्षा घरेलु उपाय करके देखना चाहिए । सामान्य रूप से एक बार ली गई औषधि अपना अच्छा अथवा अनिष्ट परिणाम २४ घंटे में दिखाती ही है; परंतु एक ही दिन में उसका सूक्ष्म परिणाम मिलना यदि कठिन लगता हो, तो उस औषधि को उसके पश्‍चात ३ दिनों तक चालू रखना चाहिए और यदि इससे भी कोई परिणाम नहीं मिला, तो अधिकतम ७ दिनों तक औषधि को चालू रखना चाहिए । ७ दिनों तक औषधि लेने पर भी कोई परिणाम नहीं दिखा, तो चिकित्सा बंद कर देनी चाहिए । औषधियों के सेवन की कालावधि में औषधि का दुष्परिणाम हो रहा है, ऐसा ध्यान में आने पर भी औषधि बंद कर देनी चाहिए ।’

– वैद्य मेघराज पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (२४.६.२०१७)

 

कहां एलोपैथी, तो कहां आयुर्वेद !

एलोपैथी आयुर्वेद
१. इतिहास २००-३०० वर्षों का अनादि
२. विषय कालबाह्य होना/न होना कालबाह्य होता है; क्योंकि पहले का शोध तथा उपाय कुछ समय पश्‍चात अचूक न होने की बात ध्यान में आती है । कभी भी कालबाह्य नहीं होता; क्योंकि इसमें चिरंतन शास्त्र बताया गया है ।
३. शोध की आवश्यकता होना/न होना निरंतर करते रहने की आवश्यकता होना परिपूर्ण होने से शोध की आवश्यकता ही न पडना
४. रोगों के कारणों का विचार अधिकांश रूप से केवल तात्कालीन तथा सीमित कारणों का ही विचार किया जाना देश, काल, ऋतु, प्रकृति सहित पूर्वजन्मों के कारणों का भी विचार किया जाना
५. निदान पद्धति निदान के लिए यंत्र, उपकरण, परीक्षण इत्यादि पर निर्भर रहने की आवश्यकता होना नाडी-परीक्षण जैसी अचूक तथा गहन निदान-पद्धति होने से बाह्य साधनों पर निर्भर होने की आवश्यकता न होना
६. औषधियां तथा उनके दुष्परिणाम तात्कालीन, महंगी तथा भीषण/भयंकर दुष्परिणाम करनेवाली होना प्राकृतिक, अत्यंत सस्ती तथा उचित पद्धति से सेवन करने से किसी भी प्रकार के दुष्परिणाम न होना
७. स्वरूप व्यापार सेवा तथा ईश्‍वरप्राप्ति का एक मार्ग
८.आध्यात्मिक अधिष्ठान होना न होना
९. जीवनपद्धति के रूप में शास्त्र का उपयोग असंभव हिन्दू धर्म में विद्यमान सभी आचार आयुर्वेद के अनुसार ही होने से सहस्रों वर्षों से आयुर्वेद हिन्दुओं की जीवन-पद्धति ही होना

उपर्युक्त सारणी से हिन्दू राष्ट्र में आयुर्वेद को ही प्रधानता क्यों दी जाएगी, यह ध्यान में आता है । – परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी (२४.१२.२०१४)

 

स्वस्थ जीवन का सबसे सरल मार्ग : स्वास्थ्य संजीवनी

निम्न ३ बातों का नियमित रूप से आचरण करने से स्वास्थ्य उत्तम रहकर कार्यक्षमता बढती है ।

अ. प्रातः ३ से ५ के मध्य उठना / जगना

इस समय अन्य समय की अपेक्षा फेफडे अधिक क्रियाशील होते हैं । इस समय जगने से संपूर्ण शरीर को प्रचुर मात्रा में प्राणवायु की आपूर्ति होती है । अपानवायु का कार्य आरंभ होने से मलविसर्जन सुलभ होता है ।

आ. दोपहर की अपेक्षा सुबह ९ से ११ की कालावधि में तथा
रात की अपेक्षा सायंकाल ५ से ७ की कालावधि में भोजन करना

हमारी पाचनशक्ति सूर्य की स्थिति पर निर्भर होती है । इस समय भोजन करने से पाचन अच्छा होता है ।

इ. रात ९ से ११ के मध्य सोना

रात १२ बजने से पूर्व ली गई १ घंटे की नींद अन्य समय ली गई २ घंटे की नींद के समान होती है । इस अवधि में सोने से शांत और गहरी नींद मिलती है । उपर्युक्त ३ बातें नियमित रूप से करने से अन्य कोई भी विशेष पथ्य के पालन की आवश्यकता नहीं है ।

– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, फोंडा, गोवा (२९.१.२०१५)

 

आयुर्वेद के समान तथा हिन्दू संस्कृति के अभिमानी बनें !

(पू.) श्री. संदीप आळशी

घर के आंगन, घर के छज्जे तथा गमलों में भी तुलसी, घीकुंवर जैसी औषधियों की बोआई की जा सकती है । ये वनस्पतियां, साथ ही रसोई में स्थित धनिया, जीरा तथा अजवाईन जैसे मसालों का उपयोग बुखार, खांसी तथा पेटदर्द जैसे विविध विकारों में होता है । ऐसा होते हुए भी हम सामान्य विकारों के लिए महंगी एलोपैथिक औषधियों का उपयोग क्यों करें ? इन औषधियों को बनानेवाले अधिकांश प्रतिष्ठान विदेशी होने से हमारा पैसा भी विदेशों में जाता है । ऋषि-मुनियों द्वारा बताए गए आयुर्वेद को अपनाकर स्वदेशी व्रतों का पालन करना तथा हिन्दू संस्कृति का अभिमानी बनना, तो प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है !’
– पू. संदीप आळशी (२७.२.२०१७)

संदर्भ : दैनिक सनातन प्रभात