‘अपना आध्यात्मिक जीवन नदी के पानी के प्रवाह समान होना चाहिए । रास्ते में असंख्य पत्थर-शिलाएं, मिट्टी, वृक्ष इत्यादि पानी के प्रवाह का मार्ग अवरुद्ध करते हैं । अनेक गांवों से बहते-बहते नदी आगे-आगे जाती है और एकदम अंत में कभी न कभी वह समुद्र में जाकर मिल जाती है । यहीं पर उसका प्रवास रुक जाता है । प्रतिदिन के जीवन में भी हमें ऐसे ही बहते रहना चाहिए । ‘नित्यनूतन सनातन’ इस उक्ती अनुसार जीवन में नित्य नया-नया सीखते रहना चाहिए’, यही परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने हमें सिखाया है । हमारा मन भी ऐसा ही है । नया-नया सीखने से मन को भी आनंद मिलता है ।
हम जीवन में न सीखते हुए यदि एक ही स्थान पर रुक गए, तो हमारा जीवन पानी के ठहरे हुए पानी समान हो जाता है । इस पोखर में कालांतर में जीव-जंतू तैयार होते हैं । एक ही प्रकार की सेवा करते रहने पर उसके मन को ऊब होती है और मन भी किसी पोखर समान बन जाता है । इसमें ही जीवजंतुओं समान प्रतिक्रिया एवं विकल्प तैयार होते हैं । परिणामस्वरूप मन निराशा में जाने लगता है; इसीलिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी हमेशा कहते हैं, ‘प्रतिदिन सीखें और नदी के बहते पानी समान प्रगति कर एक दिन मोक्ष नामक सागर में विलीन हों !’
– श्रीचित्शक्ति सौ. अंजली गाडगीळ
भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं का समाप्त करने का उत्तम साधन !
ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में भक्तिमार्ग का महत्त्व
सत्सेवा का महत्त्व