किसी प्रसंग का कार्यकारणभाव समझने की अपेक्षा सतत सीखने की स्थिति में रहकर साधना में आगे जाना चाहिए !

कई बार साधकों को उनके भाव के कारण स्थूल से और सूक्ष्म स्तर पर अनेक अनुभूतियां होती हैं । कई बार साधक संतों से इस विषय में पूछते हैं कि ऐसे कैसे हुआ ? वैसे क्यों हुआ ? स्वप्न में जो दिखाई दिया, उसका कारण क्या है ? इत्यादि । इन विचारों का साधकों के मन और उनकी साधना पर परिणाम होता है । आरंभ के चरण पर एक जिज्ञासु के रूप में इन अनुभूतियों का विश्‍लेषण और कार्यकारणभाव समझकर लेना, भले ही योग्य हो, तब भी अगले चरण पर यह समझने की आवश्यकता नहीं रहती; कारण तब भगवान ही अंदर से सर्व उत्तर बताने लगते हैं । अपनी श्रद्धा बढ गई और उसे भाव की जोड मिल जाए, तो योग्य काल और समय पर ही हमें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं । उसके लिए हमें अलग से ऊर्जा व्यय (खर्च) नहीं करनी पडती । इसकारण साधनाप्रवास के इस अथांग महासागर में सतत सीखने की स्थिति में रहकर साधना में आगे जाना चाहिए । हम साधना में जैसे आगे जाते हैं, वैसे अनुभूतियों में अटकना, अर्थात माया ही है, यह भी ध्यान में आता है ।

– श्रीचित्‌शक्‍ति श्रीमती अंजली गाडगीळ

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