‘मेरी ओर कोई ध्यान नहीं देता’, ऐसा विचार नहीं करना है । हम जो कुछ भी करते हैं, उस प्रत्येक बात का लेखा-जोखा भगवान के पास होता है । हमें ऐसा लगना; अर्थात अपने मन में असुरक्षितता की भावना है । हमारे संदर्भ में जो कुछ भी होता है, वह अच्छे के लिए ही होता है । भगवान कभी भी गलत नहीं करेंगे । ‘भगवान और मैं’, इस ओर ही हमें ध्यान देना है । ‘कौन कैसे आचरण करता है ?’, इस ओर ध्यान न देते हुए हमें अपनी सत्सेवा और साधना करते रहनी है । मन को लगनेवाली असुरक्षितता अल्प होने के लिए उसे स्वसूचना देनी चाहिए । मन को सतत भगवान के साथ रहना सिखाना चाहिए । भगवान को साथ रखना सीख गए, तो उससे अपनी साधना होती है ।’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ
भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं का समाप्त करने का उत्तम साधन !
ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में भक्तिमार्ग का महत्त्व
सत्सेवा का महत्त्व