अध्यात्म में जो सीखा है, उसे तुरंत कृति में लाना, यही ‘अध्यात्म को जानना एवं जीना’ है । अध्यात्मशास्त्र को ईश्वर के प्रति भावभक्ति से ही समझा जा सकता है ।
अध्यात्म में जो सीखा है, उसे तुरंत कृति में लाना, यही ‘अध्यात्म को जानना एवं जीना’ है । अध्यात्मशास्त्र को ईश्वर के प्रति भावभक्ति से ही समझा जा सकता है ।