अध्यात्म की श्रेष्ठता एवं विज्ञान की मर्यादाएं
कलियुग में अनेक लोग विविध वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं । यह आवश्यक नहीं कि वे सभी प्रयोग सफल हों । कई बार विज्ञान के प्रयोग में त्रुटि होने के कारण उसके लिए उपयोग किया गया मनुष्यबल, आर्थिक निवेश एवं समय, इस प्रकार समस्त ऊर्जा प्रयोग के अंत में व्यर्थ हो जाती है, ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा । अध्यात्म में ऐसा नहीं होता है । साधक द्वारा ईश्वर की पूर्ण रूप से शरण जाकर श्रद्धा एवं भक्तिभाव से की गई कृति उसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए पोषक ही सिद्ध होती है । किसी रोगी व्यक्ति की प्रकृति गंभीर होने पर, उसके स्वस्थ होने के लिए औषधि एवं उपचारों पर बहुत व्यय किया जाता है । आधुनिक वैद्य भी भरपूर प्रयत्न करते हैं । इतना सब करने पर भी यदि उस रोगी की मृत्यु हो जाए, तो विज्ञान के स्तर पर किए गए सभी प्रयोग निष्फल हो जाते हैं । इसके विपरीत, रोगी व्यक्ति स्वस्थ हो जाए; इसलिए उसके परिजनों ने भगवान का नामस्मरण, पूजा-पाठ, व्रत-अनुष्ठान यदि किए हों; तो व्यक्ति को अपनी कर्मगति के अनुसार भले ही मृत्यु प्राप्त हो गई हो, तब भी आध्यात्मिक स्तर पर उसे उसका लाभ होता है । उस व्यक्ति के परिजनों द्वारा किया गया नामस्मरण एवं पूजा-पाठ से प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा का उपयोग उसकी मृत्योत्तर यात्रा के लिए होता है । यह ऊर्जा उस मृतात्मा को आगामी अच्छी गति प्रदान करती है । इस कारण अध्यात्म में किया गया कोई भी प्रयोग अथवा कृति कभी भी व्यर्थ नहीं जाती । मनुष्य को उसका लाभ अवश्य मिलता है । इससे अध्यात्म की श्रेष्ठता एवं विज्ञान की मर्यादाएं ध्यान में आती हैं ।
भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं का समाप्त करने का उत्तम साधन !
ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में भक्तिमार्ग का महत्त्व
सत्सेवा का महत्त्व