अनेक जन्मों के पश्चात मनुष्य जन्म प्राप्त होता है एवं ‘अनेक जन्मों में की गई साधना के फलस्वरूप परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी जैसे ‘गुरु’ उस मनुष्य के जीवन में आते हैं । मनुष्य की आयु अल्प है । इसलिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी साधकों को इसका सतत भान कराते हैं एवं मनुष्य के जन्म को सार्थक करने हेतु साधना करके जन्म-मृत्यु के फेर से मुक्त होने हेतु वे साधकों को साधना सिखाते हैं । जब तक हम मनुष्यदेह में हैं, तब तक ही साधकों के पास साधना सीखने का सर्वोत्तम अवसर है । मृत्यु के पश्चात संपूर्ण जगत् ‘सूक्ष्म’ है । उस सूक्ष्म जगत् का प्रवास बिना बाधा के होने हेतु एवं मनुष्य जन्म का वास्तविक लाभ लेने हेतु मनुष्यदेह को अंतर्बाह्य साधना की सीख से संस्कारित करना अत्यंत आवश्यक तो है ही; किंतु अब यह काल की आवश्यकता है । ‘मनुष्य जन्म केवल साधना करने के लिए ही ईश्वर ने मुझे दिया है’, ऐसी दृढ़ श्रद्धा प्रत्येक के मन में उत्पन्न होना आवश्यक है ।’
भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं का समाप्त करने का उत्तम साधन !
ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में भक्तिमार्ग का महत्त्व
सत्सेवा का महत्त्व