बाह्य नातों में फंसने की अपेक्षा आंतरिक नाते से मनुष्य में विद्यमान भगवान को निकट लेने से भगवान हमें कभी दूर नहीं करेंगे

हमें बाह्य देह की अपेक्षा साधक के अंतर में विद्यमान भगवान से प्रेम करना चाहिए, जिससे कुछ कारणवश वह साधक हमारे साथ न हो, तब भी उसके विरह का हमें दुख नहीं होता । हमारा मन साधक की देह के तत्त्व से प्रेम करने का अभ्यस्थ होने से ऐसा लगता है कि वह ‘तत्त्व रूप में हमारे पास ही है ।’ इसमें अकेलेपन का दुख नहीं होता, अपितु ‘भगवान सर्वत्र होने से वह साधक भी हमारे पास ही है’, इस आनंद में हम सेवा कर सकते हैं । ‘आनेवाले आपातकाल में कौन कहां होगा ?, यह हमें ज्ञात नहीं है; इसलिए बाह्य नाते में मत फंसिए । आंतरिक नाते से मनुष्य में विद्यमान भगवान से निकटता बनाइए । ऐसा करने से भगवान कभी दूर नहीं करते ।

– श्रीचित्‌शक्ति् (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

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