एक गुण के संपूर्ण समर्पण से ही भगवान का विश्व समझ में आकर भगवान के प्रति निकटता प्रतीत होने लगना और उससे ही भावनिर्मिति होना

हमें जो आता है, वह सबकुछ भगवान को अर्पण करने का प्रयास करना चाहिए । एक गुण भी हमें बहुत कुछ सिखाता है । ‘हमने कितना सीखा ?’, इसकी अपेक्षा ‘हमने क्या सीखा ?’, इसका अधिक महत्त्व है । एक गुण के संपूर्ण समर्पण से ही हमें भगवान का विश्व समझ में आने लगता है और साधना के कारण अनंत गुणों से युक्त भगवान के प्रति हमें निकटता प्रतीत होने लगती है । इसी को ‘भगवान के प्रति भाव उत्पन्न होना’ कहते हैं ।

– श्रीचित्‌शक्ति् (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

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