अपेक्षा करना अहं का लक्षण है । अपेक्षापूर्ति होने पर तात्कालिक सुख मिलता है; परंतु इससे अहं का पोषण होता है और यदि अपेक्षा के अनुरूप नहीं होता तो दुःख होता है, अर्थात दोनों ही प्रसंगों में साधना की दृष्टि से हानि ही होती है ।’
– (सद्गुरु) श्री. राजेंद्र शिंदे
भावजागृति के प्रयत्न करना, यह अपनी भावनाओं का समाप्त करने का उत्तम साधन !
ज्ञानप्राप्ति के संदर्भ में भक्तिमार्ग का महत्त्व
सत्सेवा का महत्त्व