नामकरण

जिसप्रकार बच्चे का लिंग गर्भाशय में ही निश्चित होता है, उस प्रकार बच्चे का नाम भी पूर्वनिश्चित ही होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध, ये घटक एकत्रित रहते हैं; इसीलिए बच्चे का जो रूप है उसके अनुसार उसका नाम भी होता है ।

पूजाविधि के संदर्भ में शंकानिरसन – भाग २

कर्पूर जलाने से उत्पन्न सूक्ष्म-वायु की उग्र गंध में शिवगणों को आकृष्ट करने की क्षमता अधिक होती है । वास्तु में कनिष्ठ अनिष्ट शक्तियों को नियंत्रित रखने का कार्य शिवगण करते हैं । वास्तु में विद्यमान शिवगणों के अस्तित्व से स्थानदेवता एवं वास्तुदेवता के आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायता मिलती है ।

पूजाविधि के संदर्भ में शंकानिरसन – भाग १

मोगरा (बेला), जाही (एक प्रकारकी चमेली), रजनीगंधा इत्यादि पुष्पों में ऐसी लगन होती है कि देवताओं के पवित्रक अधिकाधिक उनकी ओर आकृष्ट हों । उन पुष्पों की कलियां सूर्यास्त से खिलना आरंभ होकर ब्राह्ममुहूर्त की आतुरता से प्रतीक्षा करती हैं । उनकी लगन के कारण देवताओं के पवित्रक उनकी ओर अधिक मात्रा में आकृष्ट होते हैं ।

पूजा की थाली में विभिन्न घटकों की रचना किस प्रकार करें ?

प्रत्यक्ष में देवतापूजन आरंभ करने से पूर्व, पूजनसामग्री एवं अन्य घटकों की संरचना उचित ढंग से करनी आवश्यक है । उक्त संरचना यदि पंचतत्त्वों के स्तरपर आधारित होगी, तो वह अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित होगी ।

प्रार्थना किसे कहते हैं एवं उससे क्या लाभ होता है ?

उषःकाल में प्रार्थना की कुंजी से दिन का द्वार खोलें और रात को प्रार्थना की कुंडी डालकर उसे बंद कर लें’, ऐसा सुवचन है ।यह वैज्ञानिक प्रयोगोंद्वारा भी सिद्ध हो गया है कि प्रार्थना से व्यक्ति को व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक लाभ होते हैं ।

सोलह संस्कार

धर्म सिखाता है कि मनुष्य-जन्म ईश्‍वरप्राप्ति के लिए है; इसलिए जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रत्येक प्रसंग में ईश्‍वर के निकट पहुंचने के लिए आवश्यक उपासना कैसे की जाए, इसका मार्गदर्शन धर्मशास्त्र में किया गया है ।