गुरुपूर्णिमा पूजाविधि (संपूर्ण गुरु पूजन मंत्र एवं अर्थसहित)

आषाढ पूर्णिमा अर्थात व्यासपूजन अर्थात गुरुपूर्णिमा । इस दिन ईश्वर के सगुण रूप अर्थात गुरु का मनोभाव से पूजन

आषाढी एकादशी

एकादशी यह भगवान श्री विष्णु की तिथि है । एकादशी व्रत करनेसे, कार्यक्षमतामें वृद्धि होना, आयुवृद्धि होना एवं आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होनेमें सहायता मिलना ।

अधिक मास

अधिक मास को ‘मलमास’ कहते हैं । अधिक मास में मंगल कार्य की अपेक्षा विशेष व्रत और पुण्‍यकारी कृत्‍य किए जाते हैं ।

आदर्श विवाहपत्रिका : विवाहपत्रिका सात्त्विक होने के लिए क्या करना चाहिए ?

विवाहपत्रिका आजकल प्रतिष्ठा का विषय बन गया है । अनेक पृष्ठों की, सुगंधित, मंहगी पत्रिकाओं को छापने की ओर समाज का झुकाव बढ गया है । ‘विवाह’ एक धार्मिक विधि होने से विवाहपत्रिका सात्त्विक हो और उससे धर्मप्रसार हो, इसके लिए प्रयास करना चाहिए । इस दृष्टि से विवाहपत्रिका के विविध घटक कैसे हाेने चाहिए, इसका विवेचन आगे किया है ।

आइए भारत में पुनः एक बार ‘रामराज्य’ की ध्वजा (गुडी) स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध हो जाएं !

रामराज्य अर्थात ऐसा राज्य, जहां आध्यात्मिक श्रद्धा सुशासन में परिवर्तित होती है । आज के समय में भी भारत में आदर्श राजा, सात्त्विक प्रजा, सुशासन एवं सुरक्षा से युक्त रामराज्य स्थापित करना ही कालानुसार सच्ची धर्मस्थापना है ।

विजयादशमी के निमित्त सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का संदेश !

सच्चा सीमोल्लंघन है, ‘विजय प्राप्त करने के लिए शत्रु की सीमा लांघकर युद्ध की चुनौती देना’, अपराजिता देवी की पूजा करने का अर्थ है, ‘विजय प्राप्त करने के लिए देवी से शक्ति मांगना’ तथा छोटे-बडों को अश्मंतक के पत्ते देने का अर्थ है ‘विजयश्री प्राप्त करने के लिए बडों का आशीर्वाद लेना’ !

देवपूजा

हिन्दू धर्म में सगुण उपासनापद्धति की नींव अर्थात ‘देवपूजा’ ! ‘नित्य की भागदौड के दिनक्रम में देवपूजा के लिए इतना समय किसे है ?’, ऐसी नकारात्मक मानसिकता आजकल काफी लोगों में पाई जाती है । केवल एक नित्यकर्म पूरा करना है इसलिए भगवान पर जल्दी-जल्दी पानी डालना है, चंदन का तिलक लगाना और फूल चढाकर उदबत्ती दिखाना, हो गई ‘देवपूजा ’!, ऐसा चित्र सर्वत्र दिखाई देता है । सभी के पालनपोषण का ध्यान रखनेवाले भगवान की पूजा इसप्रकार ‘निबटाना’, इसे देवपूजा कह सकते हैं क्या ? ऐसा करने पर भगवान हम पर क्यों कृपा करें

वास्तुशास्त्रानुसार घर में देवघर कैसे होना चाहिए ?

पूजाघर बनाते समय उसे सीधे भूमि पर न रखें । पूजाघर  संगमरमर अथवा लकडी से बना हो । कांच से बना हुआ पूजाघर टालें । पूजाघर कहां हैं, इसकी बजाय वहां पूजा नियमितरूप से और भावपूर्ण हो रही है ना, यह भी महत्वपूर्ण होता है ।

पूजा करते समय भाव कैसा रखें ?

देवता, संत अथवा गुरु को पोछते हुए वे वहां साक्षात हैं, ऐसा भाव रखें । उन्हें बताएं कि हम पोछने जा रहे हैं । तत्पश्चाच ऊपर से नीचे तक एक-एक अंग धीरे-धीरे पोछें । ठीक उसीप्रकार जैसे मां बच्चे को नहलाती है । वह बच्चे से बातें करते हुए कि अब मैं तुम्हें स्नान करवाने जा रही हूं । तुम अपनी आंखें बंद कर लो । इससे आंखों में पानी नहीं जाएगा । इसप्रकार उसका ध्यान रखते हुए स्नान करवाती है ।

ईश्वरप्राप्ति हेतु विवाहविधि अध्यात्मशास्त्र के अनुरूप ही करें !

विवाहविधि द्वारा वधु-वर सहित उपस्थितों का आनंदप्राप्ति की दिशा में मार्गक्रमण होने के लिए कैसे प्रयत्न करने चाहिए, वह इस लेख में प्रस्तुत है ।