देवघर में देवताओं की रचना कैसे करनी चाहिए ?

प्रश्न : पंचायतन देवताओं के विषय में देवघर में रचना कैसे करनी चाहिए ? कुलदेवता की मूर्ति की रचना करते समय क्या श्री गणेश की मूर्ति मध्य में रखना आवश्यक है ?

उत्तर : अपने यहां लोग क्या करते हैं ? कोई जब किसी गांव अथवा तीर्थक्षेत्र जाता है, तो वहां से लौटते समय सभी सगे-संबंधियों के लिए आस-पडोस में रहनेवालों के लिए चित्र व मूर्तियां ले आता है और सभी में बांटता है । हम उस मूर्ति को देवघर में रख देते हैं । यह अनुचित है ।

एक जिले में सत्संग के लिए आनेवाली एक महिला के सात घंटे केवल पूजा करने में जाते थे । उसे रात में दो बजे उठकर सब करना पडता था, तब कहीं ९ बजे तक सर्व पूर्ण होती थी । इसमें धार्मिकता, श्रद्धा, भाव कुछ भी नहीं था । हमारी दृष्टि से दो-चार भगवान ही महत्त्वपूर्ण हैं । उनकी ही प्रतिमा अथवा मूर्ति देवघर में रखनी चाहिए । कुलदेव और कुलदेवी, विवाह के समय मायके से लाई हुई अन्नपूर्णा माता की मूर्ति; कुछ कुल में हनुमानजी का विशेष महत्त्व है इसलिए एक उनकी मूर्ति । ऐसे दो-चार देवता पर्याप्त हैं । पहले की पीढी को अन्नपूर्णा माता की मूर्ति को देवघर में रखने की आवश्यकता नहीं थी; इसलिए कि अन्नपूर्णा तत्त्व है । ‘अनेक से एक में जाना’, यह साधना का पहला नियम है ।

‘मुंबई के एक डॉक्टर मित्र ने मुझे (प.पू. डॉ. जयंत आठवले को) एक बार अपने घर पर बुलाया । उनके घर पहुंचने पर मैंने कहा, ‘‘यह आपका कक्ष है न, उसके उस सिरे से कुछ बुरा-सा लग रहा है । इस पर वे बोले, ‘‘अरे डॉक्टर, ऐसे क्या कहते हैं, वहां तो हमारा देवघर है ।’’ मैंने अंदर जाकर देखा, तो उस स्थान पर २५ – ३० देवताओं की मूर्तियां और प्रतिमा रखीं थीं । जहां देवता की मूर्तियां अथवा प्रतिमा है, वहां उस देवता का ‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और शक्ति’ एकत्र होती है । हम सभी को केवल शब्द और रूप ज्ञात होता है । भगवान की हम उपासना करते गए, कि उनके दर्शन होते हैं । जिसने पदार्थ विज्ञान का अभ्यास किया है, उन्हें प्रत्येक वस्तु में विद्यमान शक्ति के बारे में पता होता है । दो शक्तियों के एकत्र आने पर उनका परिणाम होता है, और कोई नई शक्ति निर्माण होती है । उस देवघर में अनेक देवता किसी भी प्रकार रखने से उसके परिणामस्वरूप कष्टदायी शक्ति निर्माण हुई थी ।

देवघर में उपरोक्त बताए अनुसार आवश्यक देवता ही रख कर, शेष या तो समीप ही स्थित किसी मंदिर में दान दें अथवा उन्हें विसर्जन कर दें । इससे कुछ भी नहीं बिगडेगा । जिसे गुरुप्राप्ति हो चुकी हो, वे केवल गुरु का ही छायाचित्र देवघर में रखें । हम कुटुंब में रहते हैं और एक ही पूजा घर है, तो घर के अन्य सदस्यों का भी विचार करें । उनके लिए कुल मिलाकर चार-पांच देवता पूजाघर में रखें । परंतु यदि हम पर समय आया तो तुरंत सभी की पूजा करनी है । शंकराचार्य जिस काल में पंचायतन लाए, उसी काल में गणेशजी को भी लाए । पूर्व में शैव और वैष्णव संंप्रदायों में बहुत झगडे होते थे । तब उनमें समन्वय साधने हेतु शंकराचार्यजी ने शंकर और विष्णु को नहीं; अपितु पहला मान श्री गणेश को देना निश्चित किया ।

गणेशजीकी विशेषता है । हम जो बोलते हैं, वह नाद भाषा है । देवताओं की प्रकाश भाषा होती है और श्री गणेशजी को दोनों भाषाएं आती हैं; इसलिए श्री गणेश ‘दुभाषिए’ का काम करते हैं । व्यासजी को पुराण लिखना था । उस समय उन्हें विचारों के स्तर पर सूझनेवाला था, इसलिए विचारों की गति ग्रहण कर, उसी गति से लिखे जाने की आवश्यकता थी । इसके लिए उन्होंने श्री गणेशजी को चुना । मानसिक दृष्टि से पंथों का एकत्रीकरण और आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकाश और नाद भाषा का रूपांतर करना, इन दोनों बातों के कारण श्री गणेशजी को पूजाघर के मध्यभाग में स्थान दिया था । श्री गणेशजी की एक ओर पुरुषवाचक देवता, उदा. कुलदेव, हनुमान और बाएं ओर स्त्रीवाचक देवता, उदा. कुलदेवी, अन्नपूर्णा ।

पूजा के समय पुरोहित पत्नी को पति की बाईं ओर, तो कभी दाईं ओर बैठने के लिए कहते हैं । उपासना के लिए शक्ति चाहिए तो पत्नी को दाईं ओर बिठाते हैं और शक्ति विरहित पूजा करनी हो, तब पत्नी को बाएं बिठाते हैं । शक्ति संप्रदाय में पूर्णत: इसके विपरीत देवताओं की रचना होती है । हम सभी भक्तिमार्गानुसार साधना करनेवाले हैं । उसमें हमें शक्ति नहीं, अपितु हमें शक्ति को नष्ट कर शिव की अनुभूति लेनी है; इसलिए हम पुरुषवाचक देवताओं को अपने दाईं ओर रखते हैं ।

प्रश्न : घर पर भगवान के अनेक चित्र और मूर्तियां हैं । शास्त्र का इस बारे में क्या कहता है ?

उत्तर : अधिकांश लोगों के पूजाघर में आठ-दस अथवा उससे भी अधिक देवी-देवता होते हैं । मूलतः इतने देवी-देवताओं की आवश्यकता नहीं होती । इसलिए देवी-देवताओं की संख्या घटाएं । पूजाघर में कुलदेवता, श्री गणपति, कुलाचार के अनुसार बालगोपाल, हनुमान एवं श्री अन्नपूर्णा रखें । इनके अतिरिक्त अन्य देवता जैसे शिव, दुर्गा समान किसी उच्चदेवता की उपासना करते हों, तो वह रखें । इतने ही देवता पर्याप्त हैं । अतिरिक्त देवताओं के चित्र अथवा मूर्तियों का विसर्जन करें । मनुष्य जो बोेलते हैं, वह शब्दों में होता है अर्थात वह नादभाषा होती है, जबकि देवी-देवताओं की प्रकाशभाषा होती है । हमारी नादभाषा का रूपांतर देवताओं की प्रकाशभाषा में और देवताओं की प्रकाशभाषा का रूपांतर हमारी नादभाषा में करने का कार्य गणपति करते हैं; इसलिए पूजाघर में गणपति होने आवश्यक हैं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित दृश्यश्रव्य चक्रिका ‘अध्यात्मसंबंधी शंकानिरसन’

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