भक्तिभाव वृद्धिंगत करनेवाला प्रभावी माध्यम – आरती !
उपासक के हृदय का भक्तिदीप तेजोमय करने और देवताओं के कृपाशीर्वाद ग्रहण करने का सहज सुलभ माध्यम है ‘आरती’ । संतों की संकल्पशक्ति से सिद्ध आरतियां करने से उपरोक्त उद्देश्य निःसंशय सफल होता है, परंतु तभी जब आरतियां हृदय से, अर्थात आर्तता से, लगन से और अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से उचित ढंग से गायी जाती हैं ।
कोई भी बात हमसे आर्तता से, अर्थात अंत:करण से कहने पर ही उसका महत्त्व हमारे मन पर अंकित होता है । उपासना करते समय कोई भी कृति अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से योग्य करना अत्यावश्यक होता है; कारण ऐसी कृति का ही परिपूर्ण फल मिलता है ।
आरती का महत्त्व
अ. ‘आरती, इस कलियुग में ईश्वर के दर्शन करने का सरल उपाय है; कारण यह कि कलियुग में ‘क्या भगवान हैं भी अथवा नहीं ?’, यहां से ही आरंभ होता है । आरती अर्थात भगवान को आर्तता से (अंत:करण से) पुकारना । कोई मनुष्य यदि आरती के माध्यम से उन्हें ऐसे पुकारे, तो भगवान उसे अपने रूप में अथवा प्रकाश में दर्शन देंगे ।’
– श्री गणपति (श्री. भूषण कुलकर्णी के माध्यम से, ३१.१.२००४, सायंकाल ६.१०)
आ. देवता स्तुतिप्रिय और कृपालु होने से उनकी स्तुति पर आरती कहनेवाले भक्त पर वे प्रसन्न होते हैं ।
इ. बहुतांश आरतियों की रचना संत अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत भक्तों ने की हैं । उन्नतों का संकल्प एवं आशीर्वाद होने से, आरती करने पर उपासक को ऐहिक एवं पारमार्थिक, दोनों दृष्टि से लाभ होता है ।
ई. भक्तिमार्गानुसार साधना करने में ईश्वर के प्रति भक्तिभाव निर्माण होना आवश्यक होता है । प्राथमिक अवस्था के साधक में अमूर्त अर्थात निर्गुण रूप के ईश्वर के प्रति भाव निर्माण होना कठिन होता है । इसके विपरीत मूर्त अर्थात सगुण रूप के, मानवी देह धारण किए ईश्वर के प्रति साधक को निकटता लगती है । इसलिए उनके प्रति साधक का भाव भी शीघ्र निर्माण होता है । आरती, सगुणोपासना का एक सरल-सुलभ माध्यम है ।
उ. आरती के समय साधक का देवता के प्रति भाव बढ जाने से उसे अनुभूति होती है । अनुभूति से उसकी भगवान के प्रति श्रद्धा बढने में सहायता होती है ।
ऊ. आरती के समय भगवान का तत्व अधिक मात्रा में कार्यरत होने से उस समय साधक को देवता की शक्ति और चैतन्य का अधिक लाभ होता है । इसलिए मंदिर में अन्य समय उपस्थित रहने की तुलना में आरती के समय उपस्थित रहना अधिक लाभदायक होता है ।
ए. ‘आरती से निर्माण हुई नादतरंगों से जीव के आसपास का वायुमंडल सात्त्विक बनने से परिसर की शुद्धि होती है ।’
– एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, २१.४.२००५, रात्रि ९.०२)
आरती भावपूर्ण एवं सात्त्विक होने के लिए आवश्यक घटक
अ. आरती गानेवालों का भाव
आरती गानेवालों का ईश्वर के प्रति भाव जितना अधिक, आरती उतनी ही अधिक भावपूर्ण और सात्त्विक होती है । ऐसी आरती ईश्वर तक शीघ्र पहुंचती है ।
आ. शब्दों का उच्चार और कहने की पद्धति
आरती में शब्दों का उच्चार, शब्दों की गति, शब्द जोडकर बोलना अथवा अलग-अलग कहना इत्यादि पर शब्दों से निर्माण होनेवाली सात्त्विकता और चैतन्य निर्भर करता है ।
इ. आरती का अर्थ समझकर आरती करना
बहुतांश आरतियों की रचना संत अथवा उन्नत भक्तों ने की है । उच्च स्तर के संतों द्वारा रची गई आरतियों का अर्थ समझना कई बार कठिन होता है । परंतु आरती का अर्थ समझकर आरती कहने से देवता के प्रति भावजागृति शीघ्र होने में सहायता होती है ।
देवी की आरती कैसे करें ?
अ. आरती कहने की योग्य पद्धति कौनसी है ?
‘देवी का तत्त्व, अर्थात शक्तितत्व, तारक-मारक शक्ति का संयोग है । इसलिए देवी की आरती के शब्द अल्प आघातजन्य, मध्यम वेग से और आर्त भाव से गाना इष्ट होता है ।
आ. आरती के समय कौनसे वाद्य बजाना योग्य है ?
देवीतत्त्व, शक्तितत्त्व का प्रतीक होने से देवी की आरती करते समय शक्तियुक्त तरंगें निर्माण करनेवाले चर्मवाद्य हलके हाथों से बजाएं ।
आरती करने की संपूर्ण कृति
१ अ. आरती के पहले ३ बार आगे दी गई पद्धति से शंख बजाएं ।
१ अ १. शंख बजाना प्रारंभ करते समय सिर ऊपर कर, ऊर्ध्व दिशा की ओर मन एकाग्र करें ।
१ अ २. शंख बजाते समय आंखें बंद कर, ऐसा भाव रखें कि ऊर्ध्व दिशा से आनेवाली ईश्वर की मारक तरंगों का हम आवाहन कर, उन्हें जागृत कर रहे हैं ।
१ अ ३. शंख बजाते समय संभवत: पहले श्वास पूर्णरूप से छाती में भर लें, फिर एक श्वास में बजाएं ।
१ अ ४. शंखनाद करते समय उसे धीमी से ऊंची ध्वनि की ओर ले जाएं और वहीं छोड दें ।
१ आ. शंखनाद होने के उपरांत आरती करना प्रारंभ करें ।
१ आ १. आरती इस भाव से करें जैसे सामने साक्षात भगवान हैं और मैं उन्हें आर्तता से पुकार रहा हूं ।
१ आ २. आरती के अर्थ पर ध्यान देते हुए आरती करें ।
१ आ ३. आरती करते समय शब्दोच्चार अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से योग्य हों ।
१ इ. आरती करते समय तालियां बजाएं ।
१ इ १. प्राथमिक अवस्था के साधक : सुर-ताल बनाए रखने के लिए तालियां धीरे से बजाएं ।
१ इ २. अगली अवस्था के साधक : तालियां न बजाते हुए अंतर्मुखता साधने का प्रयत्न करें ।
१ ई. आरती गाते समय तालियाें का साथ देते हुए वाद्य बजाएं ।
१ ई १. घंटा मंजुल नाद में (आवाज में) बजाएं और उसके नाद में सातत्य रखें ।
१ ई २. मंजीरा, झांज, हरमोनियम और तबला वाद्यों का भी साथ सुर-ताल बद्ध हो ।
१ उ. आरती गाते हुए भगवान की आरती उतारें ।
१ उ १. आरती भगवान के सामने घडी की सुइयों की दिशा में पूर्ण वर्तुलाकार घुमाएं ।
१ उ २. आरती उतारते समय उसे भगवान के सिर पर से न ले जाएं, अपितु भगवान के अनाहत से आज्ञा चक्र तक उतारें ।
१ ऊ. प्रार्थना
कुछ प्रांतों में ‘घालीन लोटांगण….’ यह प्रार्थना की जाती है ।
१ ए. कपूर-आरती करें ।
तत्पश्चात ‘कर्पूरगौरं करुणावतारं’ यह मंत्र कहते हुए कपूर-आरती करें ।
१ ऐ. कपूर-आरती ग्रहण करें ।
कपूर-आरती ग्रहण करें, अर्थात ज्योति पर दोनों हथेलियां रखकर फिर दायां हाथ सिर पर से पीछे की गर्दन तक ले जाएं ।
(किसी कारणवश कपूर-आरती न की हो, तो पूजा के लिए लगाए गए घी के निरांजन की ज्योति पर हाथ रखकर आरती ग्रहण करें ।)
१ ओ. भगवान को शरणागतभाव से नमस्कार करें ।
१ औ. तदुपरांत पूजक भगवान को प्रदक्षिणा लगाए ।
१ अं. तत्पश्चात दोनों हथेलियों की अंजुली में पुष्प लेकर उपास्यदेवता का (उदा. श्रीकृष्ण का ‘कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने…….’ यह) श्लोक बोलें । फिर अंजुली के पुष्प देवता के चरणों में अर्पण करें ।
१ क. आरती होने के पश्चात आगे दिए श्लोकों के माध्यम से प्रार्थना और क्षमायाचना करें ।
आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर ॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ॥
अर्थ : मुझे आपका आवाहन और अर्चना अथवा ‘आपकी पूजा कैसे करनी चाहिए ?’, कुछ भी ज्ञात नहीं । इसलिए पूजा करते समय यदि कोई चूक हो गई हो, तो मुझे क्षमा करें । हे भगवन ! मैं मंत्रहीन, क्रियाहीन और भक्तिहीन हूं । मैंने आपकी जो पूजा की है, उसे आप परिपूर्ण करवा लें । दिन-रात मुझसे जाने-अनजाने में सहस्रों अपराध हो रहे हैं । ‘मैं आपका दास हूं’, यह समझकर मुझे क्षमा करें ।
१ ख. तदुपरांत भगवान के नाम का जयघोष करें ।
१ ग. तदुपरांत दाएं हाथ की मध्यमा से अपने भ्रूमध्य पर विभूति (उदबत्ती की राख) लगाएं ।
एकारती से आरती करें अथवा पंचारती से ?
यह आरती करनेवाले के भाव अथवा उसके आध्यात्मिक स्तर पर निर्भर होता है ।
अ. पंचारती से आरती करना

पंचारती अनेकत्व का, अर्थात चंचलरूपी माया का प्रतीक है । आरती करनेवाला भले ही प्राथमिक अवस्था का साधक (५० प्रतिशत से अल्प आध्यात्मिक स्तर वाला) हो, उसे देवी की आरती पंचारती से करनी चाहिए ।
आ. एकारती से आरती करना

एकारती एकत्व का प्रतीक है । भावयुक्त और ५० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर का साधक देवी की आरती एकारती से करे ।
इ. आत्मज्योति से आरती करना
७० प्रतिशत से अधिक स्तर का और अव्यक्त भाव में प्रवेश कर चुका उन्नत जीव अपनी आत्मज्योति से ही देवी की अंतर्यामी आरती करता है । आत्मज्योति से आरती उतारना, यह एकत्व के स्थिरभाव का प्रतीक है ।
सवेरे और शाम, दो बार आरती क्यों करें ?
‘सूर्योदय के समय रात्रि के रज-तमात्मक वातावरण का लय होकर ब्रह्मांड में देवताओं की तेजतत्त्वात्मक तरंगों का आगमन होता है । उनके स्वागत के रूप में सवेरे के समय भगवान की पूजा कर आरती करें । सूर्योदय के समय जब देवताओं की तरंगों का आगमन होता है, तब प्रक्षेपित होनेवाले तारक चैतन्य का स्वागत जीव को आरती के माध्यम से करना चाहिए, जबकि सूर्यास्त के समय रज-तमात्मक तरंगों का उच्चाटन करने के लिए देवताओं के मारक चैतन्य की आवाहनात्मक आराधना जीव को आरती के माध्यम से करनी होती है । इसलिए सवेरे और शाम, दो बार आरती करें ।
शाम की आरती भी पूजक को स्नान और देवपूजा के उपरांत करनी चाहिए । जिन्हें सायंकाल स्नान कर पूजा करना संभव नहीं, वे हाथ-पैर धोकर भगवान के सामने दीप एवं उदबत्ती जलाएं । तदुपरांत आरती के स्थान पर श्लोक, स्तोत्र इत्यादि बोलें । बहुतांश श्लोक और स्तोत्र ऋषि-मुनियों अथवा संतों द्वारा रचे गए हैं, इसलिए आरती भावपूर्ण कहने से उनकी भी आरती किए समान लाभ होने में सहायता होती है ।
सूर्यास्त के समय आरती करने का अध्यात्मशास्त्र क्या है ?
सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणों में तेजतत्त्व की मात्रा घटने लगती है । इसलिए वायुमंडल के रज-तम कणों की प्रबलता बढ जाती है । कणों की प्रबलता बढ जाने से रज-तमात्मक तरंगों की निर्मिति की मात्रा भी बढ जाती है । इस अवसर का लाभ उठाकर अनिष्ट शक्तियां वातावरण में अपना संचार बढा देती हैं । ऐसे रज-तमात्मक वायुमंडल का कष्ट न हो, इसलिए आरती के माध्यम से प्रक्षेपित होनेवाली नादतरंगों से देवताओं की तरंगों का आवाहन कर, उन्हें ब्रह्मांडकक्षा में लाना आवश्यक होता है । आरती के कारण वायुमंडल में देवताओं की चैतन्यमय तरंगों की मात्रा बढकर कष्टदायक स्पंदनों की मात्रा घटती है और जीव के देह के सर्व ओर संरक्षक-कवच निर्माण होता है ।’
दीपज्योति नमोस्तुते