विवाह निश्‍चित करते समय वधु-वर की जन्मकुंडली मिलाने का महत्त्व

‘हिन्दू धर्म में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, ये चार पुरुषार्थ बताए हैं । उनमें से ‘काम’ पुरुषार्थ साध्य कर धीरे-धीरे ‘मोक्ष’ इस पुरुषार्थ की ओर जा सकें, इस उद्देश्य से विवाहसंस्कार का प्रयोजन है । स्त्री-पुरुष के जीवन में अनेक महत्त्वपूर्ण बातें विवाह से संबंधित होती हैं, उदा. स्त्री-पुरुष में आपसी प्रेम, उनके आपस में संबंध, संतती, जीवन के अन्य सुख, समाज में स्थान और जीवन में उन्नति । विवाह निश्‍चित करने से पूर्व भावी वधु-वर की जन्मकुंडली मिलती हैं क्या, यह देखना योग्य होता है । इसके लिए दोनों की जन्मपत्रिका योग्य हों और उनकी जन्मकुंडलियां मिलानेवाला ज्योतिष भी ज्ञानी हो । वधु-वर की जन्मकुंडलियां मिलाने का महत्त्व, इसके साथ ही वैवाहिक जीवन आनंदमय होने के लिए क्या करना चाहिए, इस विषय में प्रस्तुत लेख !

 

१. वधु-वर की जन्मकुंडलियां मिलाने का उद्देश्य

विवाह के उपरांत पति-पत्नी को अपना आगे का जीवन समर्थरूप से मार्गक्रमण करना हो तो उनके स्वभाव मिलना, एकदूसरे से पटना और एकदूसरे को समझकर लेना, यह भाग सबसे महत्त्वपूर्ण होता है । इसके साथ ही उनके जीवन की आर्थिक स्थिति, गृहसौख्य, संततीसौख्य, आरोग्य इत्यादि बातें महत्त्वपूर्ण होती हैं । परंतु ये सभी भविष्य की बातें होने से विवाह निश्‍चित करते समय उनका अंदाज लेना कठिन होता है । ऐसे समय पर ज्योतिषशास्त्र का आधार लिया जाता है । जन्म, विवाह और मृत्यु प्रारब्ध के अनुसार होते हैं । जन्मकुंडली अपने पूर्वसुकृत का (प्रारब्ध का) दर्पण होने से, प्रारब्धाधीन बातें उससे जान सकते हैं ।

 

२. वधु-वर की जन्मकुंडलियां मिलाते समय
गुणमिलान, ग्रहमिलान और पत्रिकामिलान का महत्त्व

२ अ. गुणमिलान

श्री. राज कर्वे

गुणमिलान का मुख्य उद्देश्य है कि वधु-वर के स्वभाव एक-दूसरे के लिए पूरक होने चाहिए । यदि पति-पत्नी एकदम विरोधी प्रकृति के होंगे, तो जीवन में कदम-कदम पर असंतोष होगा । उदा. गुणमिलान में कौन-सी राशि के व्यक्तियों की किस राशि के व्यक्ति से पटती है अथवा बिलकुल नहीं पटती, यह दिया होता है, उदा. कर्क और कुंभ इस राशि के लोगों की एक-दूसरे से नहीं पटती । कर्क राशि के व्यक्ति साधारणत: कलाप्रिय, भावनाशील और निसर्गप्रेमी होते हैं । इसके विपरीत कुंभ राशि के व्यक्ति आमतौर पर विरक्त, अपने काम के अतिरिक्त किसी अन्य में कोई रुचि न रखनेवाले, संशोधक वृत्तिवाले होते हैं । इससे उनके आचार-विचार, पसंद-नापसंद, जीवनशैली इत्यादि एकदूसरे से एकदम विपरीत होती है । इसलिए उनमें पटती नहीं । इसके विपरीत पति-पत्नी की प्रकृति एकदूसरे से अनुकूल होने से उनमें आपसी समझदारी रहती है । इसके साथ ही जीवन में कितनी भी कठिन परिस्थिति आने पर, वे एकदूसरे को समझकर, आधार दे सकते हैं ।

 

२ आ. ग्रहमिलान और पत्रिकामिलान

इसमें आर्थिक स्थिति, गृहसौख्य, संततीसौख्य, आरोग्य इत्यादि बातों का विचार कर ‘वैवाहिक जीवन कहां तक सफल होगा ?’, इसका विचार किया जाता है ।

 

३. मंगल दोष

मंगल दोष के विषय में समाज में अकारण भय और गलतधारणा दिखाई देती है । मंगल, यह दाहक ग्रह होने से वैवाहिक जीवन में अडचनें उत्पन्न करता है; परंतु पंचांग में मंगल दोष के अनेक अपवाद दिए हैं, जिस योग से लगभग ९० प्रतिशत मंगल दोष से युक्त जन्मकुंडलियों में मंगल ग्रह निर्दोष होता है । इसलिए मंगल दोष के संदर्भ में सुनी-सुनाई जानकारी पर विश्‍वास न रख, ‘कुंडली में मंगल दोष है क्या ?’ और यदि है तो ‘मंगल को निर्दोष करने का कोई उपाय ?’, इसकी निश्‍चिती ज्योतिष से करें ।

 

४. आज के विज्ञानयुग में भी वधु-वर की जन्मकुंडली का मिलान करना श्रेेयस्कर !

वर्तमान में भारतीय समाज पर पश्‍चिमी (कु)संस्कृति का प्रभाव होने से उसका अंधानुकरण किया जाता है । इसलिए एक समय पर विश्‍वगुरुपद पर विराजमान भारत की प्रत्येक क्षेत्र में अधोगति होती दिखाई देती है । विवाह के संदर्भ में इसका विचार करने पर भारत में विवाह-विच्छेद की मात्रा बहुत बढ गई है । प्रेमविवाह के संदर्भ में वधु और वर का एक-दूसरे से पहले से ही परिचय होने से ‘कुंडली देखने की आवश्यकता है क्या ?’, ऐसा प्रश्‍न अनेक लोगों के मन में उठता है । इसका उत्तर है ‘अवश्य देखेें’ । इसका कारण यह है कि ‘दूर के ढोल सुहाने लगते हैं’, अर्थात दूर से सब अच्छा लगता है । इस कथन के अनुसार ‘लडके और लडकी की आरंभ में एक-दूसरे से बनती है’,  ऐसा भले ही बाहर से दिखाई दे, तब भी प्रत्यक्ष में स्थिति भिन्न होती है । विवाह के उपरांत आनेवाली अडचनों का सामना करते समय उन्हें एकदूसरे के स्वभाव में दोष दिखाई देने लगते हैं । परिस्थिति से समझौता न कर पाने से उनमें बार-बार झडपें होने लगती हैं । इसलिए ‘हममें पटती नहीं, इसलिए हम अलग हो जाते हैं’, ऐसा निर्णय जल्दबाजी में लेने की उनकी मानसिकता रहती है । इसके साथ ही वर्तमान पीढी कई बार ‘बाह्य आकर्षण’को प्रेम मानती है । प्रेमप्रकरणों में अनेक बार धोखाधडी की संभावना होती है । इसलिए ज्योतिषों का मत लेना सदैव ही श्रेयस्कर है !

 

५. वैवाहिक जीवन आनंदमय होने के लिए साधना करें !

वर्तमान में कलियुग होने से मनुष्य के जीवन में सुख की तुलना में दुःख अधिक प्रमाण में आता है । मनुष्य की जीवनशैली निसर्ग के प्रतिकूल होने से सर्व साधन से संपन्न होते हुए भी वह ‘आनंदी’ नहीं । वैवाहिक जीवन के संदर्भ में विचार करने पर आज आनंदमय जीवनयापन करनेवाले कुटुंब अत्यधिक अल्प हैं । वैवाहिक जीवन आनंद में बीतने हेतु ‘साधना करना’ ही उत्तम मार्ग है । ‘साधना’ अर्थात ईश्‍वरप्राप्ति के लिए प्रतिदिन किए जानेवाले प्रयत्न । ईश्‍वरप्राप्ति अर्थात ईश्‍वर के गुण स्वयं में लाना और अपने दोष दूर करना । वैवाहिक जीवन में सबसे बडी अडचन है पति-पत्नी की एक-दूसरे से अपेक्षा ! प्रत्येक मनुष्य में अहंकार होने से प्रत्येक प्रसंग में वह ऐसा विचार करता है कि ‘सामनेवाला कैसे गलत है और मैं कैसे सही ।’, हम स्वयं को बदल सकते हैं; परंतु दूसरों को नहीं, यह ध्यान में रखना चाहिए । यदि पति-पत्नी सदैव यह विचार करें कि ‘हम कहां कम पडे ?, हम सामनेवाले की क्या सहायता कर सकते हैं ’, तो इससे कौटुंबिक वातावरण बहुत सुधर जाएगा । हममें विद्यमान स्वभावदोष और अहं दूर करने के लिए प्रयत्न करना ही साधना है । ‘जीवन में आनंदप्राप्ति कैसे करनी चाहिए ?’, यह विज्ञान नहीं, अपितु अध्यात्मशास्त्र सिखाता है । जीवन की प्रत्येक घटना का आध्यात्मिकीकरण करने से जीवन वास्तव में आनंदमय हो जाएगा ।’

श्री राज धनंजय कर्वे, ज्योतिष विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, गोवा. (१०.१२.२०१९)

 

पाठकों को विनम्र आवाहन !

हिन्दू  धर्म में ईश्वर के निकट हाेने के लिए मनुष्य जीवन में होनेवाले प्रमुख सोलह प्रसंग किए जानेवाले संस्कार बताए हैं । उनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण है ‘विवाहसंस्कार’ ! विवाह की धार्मिक विधियों के आधारभूत शास्त्र बताने के साथ ही विवाह में होनेवाले अपप्रकारों के साथ-साथ विवाह आदर्शपूर्ण पद्धति से कैसे करें, इसका दिशादर्शन सनातन संस्था का लघुग्रंथ ‘विवाहसंस्कार — शास्त्र एवं वर्तमान की अयोग्य प्रथाएं’ में किया है । सनातन के ग्रंथ Sanatanshop.com नामक जालस्थल पर ‘ऑनलाईन’ उपलब्ध हैं । इसका पाठक अवश्य लाभ लें !

संदर्भ : दैनिक सनातन प्रभात